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Mau News: विकास की राह में पेड़ों की जिंदगी भी बचेगी, कटेंगे नहीं शिफ्ट होंगे
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मऊ। सड़क विकास की रफ्तार अब वर्षों पुराने पेड़ों की कीमत पर नहीं होगी। मऊ से बलिया तक प्रस्तावित 59 किलोमीटर लंबे फोरलेन की जद में आने वाले विशालकाय पीपल, बरगद, आम समेत अन्य पुराने पेड़ों को काटने के बजाय दूसरी जगह शिफ्ट करने की तैयारी शुरू हो गई है। वन विभाग इन पेड़ों का सर्वे करा रहा है। सर्वे पूरा होने के बाद पेड़ों को सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित करने के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा जाएगा।
डीएफओ पीके पांडेय ने बताया कि पेड़ों को शिफ्ट करने में कटान की तुलना में अधिक खर्च आएगा, लेकिन इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ ही बड़ी आबादी को स्वच्छ हवा उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। सड़क, रेलवे ट्रैक और आवासीय योजनाओं के विस्तार के दौरान अक्सर वर्षों पुराने छायादार पेड़ों को विकास की बाधा मानकर काट दिया जाता है। ऐसे में मऊ-बलिया फोरलेन परियोजना में पेड़ों को बचाने की पहल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
मऊ-बलिया फोरलेन के लिए जुलाई 2025 में एनएचएआई ने पहले 1500 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी थी। बाद में रतनपुरा और रसड़ा बाजार से पहले दो बाईपास तथा दो स्थानों पर एलिवेटेड कॉरिडोर का प्रावधान बढ़ाए जाने के बाद परियोजना की लागत में 800 करोड़ रुपये की वृद्धि की गई। अब इसकी लागत बढ़कर 2300 करोड़ रुपये हो गई है। फिलहाल फोरलेन की डीपीआर तैयार करने का काम चल रहा है।
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मऊ से बलिया के बीच थलईपुर, रतनपुरा, फेफना, गढ़िया और पकवाईनार रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज प्रस्तावित हैं। मऊ में यह मार्ग आजमगढ़ की ओर से आने वाले नेशनल हाईवे-28 और बलिया की तरफ जाने वाले नेशनल हाईवे-31 को जोड़ेगा। फोरलेन बनने से जहां आवागमन सुगम होगा, वहीं स्थानीय बाजारों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। रतनपुरा ब्लॉक के प्रमुख बाजार पहसा, हलधरपुर और रतनपुरा में ट्रक, ट्रेलर और डंपरों के कारण लगने वाले जाम से भी लोगों को राहत मिलेगी। इससे क्षेत्र में व्यापार और विकास की गतिविधियों को गति मिलने की संभावना है।
डीएफओ पीके पांडेय ने बताया कि प्रस्ताव को शासन से स्वीकृति मिलने के बाद सर्वे में चिह्नित पेड़ों को शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। विशेषज्ञों की निगरानी में पेड़ों की जड़ों की सावधानीपूर्वक छंटाई की जाएगी। जड़ों को एक साथ उखाड़ने के बजाय पेड़ के आसपास चुनिंदा जड़ों की चरणबद्ध तरीके से छंटाई की जाएगी। इस प्रक्रिया का उद्देश्य पेड़ के आसपास नई बारीक जड़ों का विकास करना है, ताकि वे मिट्टी से पानी और पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से सोख सकें। ये फीडर जड़ें पेड़ के नए स्थान पर जीवित रहने और वहां के वातावरण के अनुकूल होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हालांकि, पेड़ों को शिफ्ट करने की यह प्रक्रिया लंबी और विशेषज्ञता वाली होती है।
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डीएफओ पीके पांडेय ने बताया कि पेड़ों को शिफ्ट करने में कटान की तुलना में अधिक खर्च आएगा, लेकिन इससे पर्यावरण संरक्षण के साथ ही बड़ी आबादी को स्वच्छ हवा उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी। सड़क, रेलवे ट्रैक और आवासीय योजनाओं के विस्तार के दौरान अक्सर वर्षों पुराने छायादार पेड़ों को विकास की बाधा मानकर काट दिया जाता है। ऐसे में मऊ-बलिया फोरलेन परियोजना में पेड़ों को बचाने की पहल पर्यावरण संरक्षण की दिशा में अहम कदम मानी जा रही है।
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मऊ-बलिया फोरलेन के लिए जुलाई 2025 में एनएचएआई ने पहले 1500 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी थी। बाद में रतनपुरा और रसड़ा बाजार से पहले दो बाईपास तथा दो स्थानों पर एलिवेटेड कॉरिडोर का प्रावधान बढ़ाए जाने के बाद परियोजना की लागत में 800 करोड़ रुपये की वृद्धि की गई। अब इसकी लागत बढ़कर 2300 करोड़ रुपये हो गई है। फिलहाल फोरलेन की डीपीआर तैयार करने का काम चल रहा है।
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मऊ से बलिया के बीच थलईपुर, रतनपुरा, फेफना, गढ़िया और पकवाईनार रेलवे क्रॉसिंग पर ओवरब्रिज प्रस्तावित हैं। मऊ में यह मार्ग आजमगढ़ की ओर से आने वाले नेशनल हाईवे-28 और बलिया की तरफ जाने वाले नेशनल हाईवे-31 को जोड़ेगा। फोरलेन बनने से जहां आवागमन सुगम होगा, वहीं स्थानीय बाजारों को भी बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। रतनपुरा ब्लॉक के प्रमुख बाजार पहसा, हलधरपुर और रतनपुरा में ट्रक, ट्रेलर और डंपरों के कारण लगने वाले जाम से भी लोगों को राहत मिलेगी। इससे क्षेत्र में व्यापार और विकास की गतिविधियों को गति मिलने की संभावना है।
डीएफओ पीके पांडेय ने बताया कि प्रस्ताव को शासन से स्वीकृति मिलने के बाद सर्वे में चिह्नित पेड़ों को शिफ्ट करने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। विशेषज्ञों की निगरानी में पेड़ों की जड़ों की सावधानीपूर्वक छंटाई की जाएगी। जड़ों को एक साथ उखाड़ने के बजाय पेड़ के आसपास चुनिंदा जड़ों की चरणबद्ध तरीके से छंटाई की जाएगी। इस प्रक्रिया का उद्देश्य पेड़ के आसपास नई बारीक जड़ों का विकास करना है, ताकि वे मिट्टी से पानी और पोषक तत्वों को बेहतर तरीके से सोख सकें। ये फीडर जड़ें पेड़ के नए स्थान पर जीवित रहने और वहां के वातावरण के अनुकूल होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। हालांकि, पेड़ों को शिफ्ट करने की यह प्रक्रिया लंबी और विशेषज्ञता वाली होती है।