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मासूमों को बरगलाकर बना रहे अपराधी
ब्यूरो, अमर उजाला, मऊ
Updated Thu, 23 Jun 2016 12:02 AM IST
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गुनाहों को अंजाम देने के लिए अपराधी अब मासूमों का भी सहारा लेने लगे हैं। यह खुलासा पिछले दिनों कुछ मामलों के पर्दाफाश में मासूमों के पकड़े जाने से हुआ है। पुलिस ने हाल में ही चोरी, छिनैती, रंगदारी जैसे अपराधों में मासूमों को पकड़कर बाल संप्रेक्षण गृह भेजा है। इनमें दो किशोर तो जिले के डी-नाइन गैंग से भी जुड़े हुए हैं। इसे लेकर पुलिस आैर खुफिया विभाग सतर्क हो गया है।
जनपद के कुख्यात डी-नाइन गैंग के अपराधी भी मासूमों को अपराध के दलदल में ले जाने का कार्य कर रहे हैं। इस गैंग के दो कुख्यात अपराधियों के भाई भी बाल संप्रेक्षण गृह भेजे जा चुके हैं। 22 मार्च को विनोद सेठ की हत्या के बाद पकड़े गए आरोपियों में दो मासूम भी हैं। जिन्हें गिरफ्तार कर बाल संप्रेक्षण गृह भेजा गया।
इसके अलावा हाल में ही छह जून को नगर के दक्षिणटोला थाना क्षेत्र से पकड़े गए आसिफ ने दो ऐसे मासूमों को चोरी में अपना दोस्त बनाकर लिप्त किया था, जिनकी उम्र महज आठ और दस वर्ष की थी। आरोपी बच्चों को धन एवं खिलाने पिलाने का लालच देकर अपने कार्य में इस्तेमाल कर रहा था। एसपी कार्यालय में पेश हुए इन बालकों ने बड़ी ही सादगी से अपना नाम बताया, उन्हें शायद इसका एहसास भी नहीं था कि वे अपराध के दलदल में फंस गए हैं। 10 जून को अंतर प्रांतीय गिरोह के तीन आरोपी पकड़े गए। इनमें एक की उम्र महज 15 साल की थी, जबकि दो उसके दोस्तों में एक मुख्य सरगना था। मुख्य सरगना अभिषेक पाण्डेय का नेटवर्क बिहार तक है। उसने ही गैंग में मासूम किशोरों को शामिल किया है। इसके साथ पकड़े गए एक किशोर को पुलिस ने संप्रेक्षण गृह भेजा।
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पुलिस अधीक्षक शिवहरि मीणा का कहना है कि बाल संप्रेक्षण गृह के अधीक्षक यशोदानंद तिवारी का कहना है कि बाल अपराधी दो किस्म के होते हैं। जो बच्चे परिस्थिति या गलती या संगत के कारण अपराध के दलदल में फंस जाते हैं
हें मुख्यधारा में वापस ले आने का प्रयास किया जाता है। जबकि जो जन्मजात या पारिवारिक रूप से विवश बाल अपराधी होते हैं उनमें सुधार करना मुश्किल कार्य है। ऐसे बच्चों को प्रवचन, योग आदि की शिक्षा दी जाती है। जनपद में पिछले कुछ अपराधों में बाल अपराधी प्रकाश में आए हैं। ऐसे बाल अपराधी पेशेवर अपराधियों के संपर्क में आने के बाद अपराध में लिप्त हैं। पेशेवर अपराधियों पर अंकुश लगाए जाने के साथ ही बाल अपराधियों की काउंसिलिंग कराकर उन्हें मुख्य धारा में लाए जाने की दिशा में भी पुलिस विभाग कार्य कर रहा है।
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जनपद के कुख्यात डी-नाइन गैंग के अपराधी भी मासूमों को अपराध के दलदल में ले जाने का कार्य कर रहे हैं। इस गैंग के दो कुख्यात अपराधियों के भाई भी बाल संप्रेक्षण गृह भेजे जा चुके हैं। 22 मार्च को विनोद सेठ की हत्या के बाद पकड़े गए आरोपियों में दो मासूम भी हैं। जिन्हें गिरफ्तार कर बाल संप्रेक्षण गृह भेजा गया।
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इसके अलावा हाल में ही छह जून को नगर के दक्षिणटोला थाना क्षेत्र से पकड़े गए आसिफ ने दो ऐसे मासूमों को चोरी में अपना दोस्त बनाकर लिप्त किया था, जिनकी उम्र महज आठ और दस वर्ष की थी। आरोपी बच्चों को धन एवं खिलाने पिलाने का लालच देकर अपने कार्य में इस्तेमाल कर रहा था। एसपी कार्यालय में पेश हुए इन बालकों ने बड़ी ही सादगी से अपना नाम बताया, उन्हें शायद इसका एहसास भी नहीं था कि वे अपराध के दलदल में फंस गए हैं। 10 जून को अंतर प्रांतीय गिरोह के तीन आरोपी पकड़े गए। इनमें एक की उम्र महज 15 साल की थी, जबकि दो उसके दोस्तों में एक मुख्य सरगना था। मुख्य सरगना अभिषेक पाण्डेय का नेटवर्क बिहार तक है। उसने ही गैंग में मासूम किशोरों को शामिल किया है। इसके साथ पकड़े गए एक किशोर को पुलिस ने संप्रेक्षण गृह भेजा।
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पुलिस अधीक्षक शिवहरि मीणा का कहना है कि बाल संप्रेक्षण गृह के अधीक्षक यशोदानंद तिवारी का कहना है कि बाल अपराधी दो किस्म के होते हैं। जो बच्चे परिस्थिति या गलती या संगत के कारण अपराध के दलदल में फंस जाते हैं
हें मुख्यधारा में वापस ले आने का प्रयास किया जाता है। जबकि जो जन्मजात या पारिवारिक रूप से विवश बाल अपराधी होते हैं उनमें सुधार करना मुश्किल कार्य है। ऐसे बच्चों को प्रवचन, योग आदि की शिक्षा दी जाती है। जनपद में पिछले कुछ अपराधों में बाल अपराधी प्रकाश में आए हैं। ऐसे बाल अपराधी पेशेवर अपराधियों के संपर्क में आने के बाद अपराध में लिप्त हैं। पेशेवर अपराधियों पर अंकुश लगाए जाने के साथ ही बाल अपराधियों की काउंसिलिंग कराकर उन्हें मुख्य धारा में लाए जाने की दिशा में भी पुलिस विभाग कार्य कर रहा है।