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घाघरा के तेवर देख घबरा रहे तटवर्ती
ब्यूरो, अमर उजाला, मऊ
Updated Mon, 13 Jul 2015 11:24 PM IST
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घाघरा नदी बरसात के दिनों में देवारा क्षेत्र के निवासियों के लिए मुसीबत का सबब बन गई है। नदी का तेवर देख तटवर्ती इलाकों लोग घबराए हुए हैं। दोहरीघाट में घाघरा नदी का जलस्तर लगातार बढ़ने से किसान अपनी जमीन को कटते हुए देखने के लिए विवश हैं। बीते 24 घंटे में घाघरा के जलस्तर में 35 सेंटीमीटर की वृद्धि दर्ज हुई। अगर ऐसा ही रहा तो दो दिनों में घाघरा नदी खतरे की बिंदु पार कर लेगी।
दोहरीघाट के गौरीशंकर घाट पर सोमवार को घाघरा नदी का जलस्तर 69.20 मीटर रहा। जो खतरा निशान से 70 सेंटीमीटर नीचे है। रविवार को घाघरा का जलस्तर 68.85 था। इस तरह से 24 घंटे में नदी का जलस्तर 35 सेंटीमीटर बढ़ गया। दोहरीघाट में नदी के उग्र रूप धारण करने के बाद से ही तटवर्ती इलाकों में कटान के साथ साथ भारी तबाही होती है।
वहीं, घाघरा तट पर बनाए गए मुक्तिधाम का भारत माता मंदिर पर लहरों की टक्कर से उसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। मुक्तिधाम से लेकर धनौली रामपुर तक करीब एक हजार मीटर तक की जमीन पर कटान का खतरा मंडरा रहा है। यहां पर प्रतिवर्ष सबसे ज्यादा कटाना होती है।
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अकेले रामपुर धनौली गांव में 2700 एकड़ भूमि कटकर नदी में समा चुकी है। घाघरा में अगर जलस्तर बढ़ता रहा तो अनेक ऐतिहासिक घरोहर गौरीशंकर घाट, नागा बाबा की कुटी, शिवालय, रामजानकी मंदिर आदि का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
तटवर्ती इलाकों के लोगों का कहना है कि प्रतिवर्ष घाघरा में उनकी सैकड़ों एकड़ भूमि विलीन हो जाती है, लेकिन प्रशासन बस खानापूर्ति करता है।
इस बार भी प्रशासनिक अधिकारियों ने कई बार तटवर्ती इलाकों का दौरा किया लेकिन उपाय के लिए विशेष नहीं किया गया। कटान पीड़ितों को भी बाढ़ के बाद प्रशासन से मुआवजे के नाम पर छला जाता है।
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दोहरीघाट के गौरीशंकर घाट पर सोमवार को घाघरा नदी का जलस्तर 69.20 मीटर रहा। जो खतरा निशान से 70 सेंटीमीटर नीचे है। रविवार को घाघरा का जलस्तर 68.85 था। इस तरह से 24 घंटे में नदी का जलस्तर 35 सेंटीमीटर बढ़ गया। दोहरीघाट में नदी के उग्र रूप धारण करने के बाद से ही तटवर्ती इलाकों में कटान के साथ साथ भारी तबाही होती है।
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वहीं, घाघरा तट पर बनाए गए मुक्तिधाम का भारत माता मंदिर पर लहरों की टक्कर से उसके अस्तित्व पर खतरा मंडरा रहा है। मुक्तिधाम से लेकर धनौली रामपुर तक करीब एक हजार मीटर तक की जमीन पर कटान का खतरा मंडरा रहा है। यहां पर प्रतिवर्ष सबसे ज्यादा कटाना होती है।
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अकेले रामपुर धनौली गांव में 2700 एकड़ भूमि कटकर नदी में समा चुकी है। घाघरा में अगर जलस्तर बढ़ता रहा तो अनेक ऐतिहासिक घरोहर गौरीशंकर घाट, नागा बाबा की कुटी, शिवालय, रामजानकी मंदिर आदि का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
तटवर्ती इलाकों के लोगों का कहना है कि प्रतिवर्ष घाघरा में उनकी सैकड़ों एकड़ भूमि विलीन हो जाती है, लेकिन प्रशासन बस खानापूर्ति करता है।
इस बार भी प्रशासनिक अधिकारियों ने कई बार तटवर्ती इलाकों का दौरा किया लेकिन उपाय के लिए विशेष नहीं किया गया। कटान पीड़ितों को भी बाढ़ के बाद प्रशासन से मुआवजे के नाम पर छला जाता है।