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आमदनी देख केले की खेती की ओर मुड़ गए किसान

Thu, 21 Jan 2021 11:35 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Thu, 21 Jan 2021 11:35 PM IST
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Farmers turned to banana cultivation after seeing income
कोपागंज ब्लाक के सहरोज गाँव में केले की खेती को दिखाता किसान। - फोटो : MAU
मऊ/कोपागंज। वैसे तो कोपागंज ब्लाक क्षेत्र में तमसा नदी के किनारे के क्षेत्र खरबूज और तरबूज उत्पाद के लिए प्रसिद्ध है। लेकिन अब सहरोज गांव के किसान परंपरागत खेती से हटकर केले की खेती पर जोर देने लगे हैं। इससे आमदनी के साथ ही किसानों का जीवन बदल गया। केले की खेती से जहां उनकी आय बढ़ी वहीं वह अन्य लोगों को रोजगार भी देने लगे हैं।
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सहरोज गांव के किसानों ने केले की खेती कर अपना नाम प्रगतिशील किसानों में दर्ज कराया है। शुरू में कुछ ही किसान सीमित खेतों में केले की खेती करते थे। कुछ समय पहले वहां केले पकाने वाली नया दौर कंपनी लगी, जिसके बाद अन्य किसान भी इसकी तरफ अग्रसर हो गए। अब गांव में करीब 200 बीघे में केले की खेती होती है। सहरोज गांव निवासी किसान शेषनाथ राय उर्फ बबलू राय परंपरागत खेती छोड़ अब 40 बीघा भूमि पर केले की खेती कर रहे है। उन्होंने बताया कि इस खेती में लागत कम और मुनाफा ज्यादा होता है। इसी तरह खेतों में धान, गेहूं सहित अन्य फसलों की खेती करने वाले उनके भाई इंदुशेखर भी दो वर्षों से केले की खेती करने लगे हैं। शेषनाथ राय ने बताया कि वर्तमान में 6 बीघा में केले की खेती की है, जिसमें लागत कम और मुनाफा अधिक है। इससे अन्य लोगों को रोजगार भी मिल रहा है।
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लागत का दोगुना मिल रहा लाभ
शेषनाथ के अनुसार एक मुर पर खर्च करीब 10 हजार होता है, तो आमदनी 25 हजार रुपये होती है। लेकिन श्रम ज्यादा करना होता है। किसान मनोज राय ने बताया कि केले की प्रति बीघा खेती में दवाइयों, खाद के लिए 10 हजार रुपये का खर्च आता है। बोले एक बीघा में करीब 25 से 30 क्विंटल केले उगाते हैं। एक बीघा में 150 पौधे लगाए जाते हैं। एक मुर (लाइन) में 6-6 फीट की दूरी पर पौधों को लगाया जाता है। एक फसल तैयार होने में करीब 14 माह का समय लगता है। उसके बाद फसल बाजार में पहुंचने लायक होती है। आम, अमरूद, गन्ना की तरह ही केले में तेजी से कई रोग लगते हैं। इसके लिए समय-समय पर दवाओं का छिड़काव करना होता है।
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किसान पारंपरिक खेती से हटकर फसल तो ऊगा रहे हैं, लेकिन सभी फायदों के अलावा सरकार द्वारा केले का मिनिमम मूल्य निर्धारित नहीं किया जाता, ऐसे में व्यापारी अपने हिसाब से मनचाहा मूल्य लगाते हैं।

- शेषनाथ राय और मनोज राय
केले की खेती के लिए सरकार की तरफ से बीज अनुदान में मिलता है। लेकिन फसल में रोग लगने पर कोई व्यवस्था सरकार की तरफ से नहीं की जाती, ऐसे में रोग लगने पर स्थानीय स्तर पर कृषि अधिकारी कोई सहायता नहीं कर पाते हैं।
- निधीश राय और श्री निवास यादव
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