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मनरेगा कार्य बंद होने से गांव के लोगों के समक्ष गहराया आर्थिक संकट

Sun, 23 Aug 2020 10:54 PM IST
Varanasi Bureau वाराणसी ब्यूरो
Updated Sun, 23 Aug 2020 10:54 PM IST
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Due to closure of MNREGA work, economic crisis deepens in front of village people
मऊ के दुबारी क्षेत्र के हड़ही गाँव में बाढ़ के पानी से घिरा रिहायशी मकान। अमर उजाला - फोटो : MAU
दुबारी (मऊ)। घाघरा में आई बाढ से टापू में तब्दील मधुबन तहसील से 10 किलोमीटर दूर पूर्व दक्षिण की दिशा में स्थित लौवासाथ गांव का हड़ही पुरवा में महीनों से बाढ़ का पानी जमा है। पुरवा के चारों तरफ से लगभग पांच फीट आठ फीट पानी जमा है। चारों तरफ जल जमाव होने के कारण गांव में मनरेगा का भी कार्य भी बंद चल रहा है। इससे लोगों को जीविका चलाना मुश्किल हो रहा है। यहां से तहसील तथा ब्लाक मुख्यालय पहुुंचना मुश्किल हो रहा है। लोग खानाबदोश की जिंदगी जीने को विवश है।
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शासन प्रशासन की तरफ से पहुंचाई जा रही राहत सामग्री ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रही है। फतहपुर मंडाव ब्लाक क्षेत्र के लौवासाथ गांव के हड़ही पुरवा की आबादी 800 है। गांव में निवास करने वाले अधिकांश मजदूर वर्ग के हैं। काफी समय से जलजमाव रहने से काफी संख्या में लोगों की मडाई, कच्चा मकान गिर गया है। लोग खानाबदोश की जिंदगी जीने को विवश हैं। धान, गन्ना सहित सब्जी की फसल नष्ट होने से लोगों की परेशानी बढ़ती ही जा रही है। गांव में चल रहा मनरेगा कार्य बंद होने से लोगों को कोई काम भी नहीं मिल रहा है। पुरवा के चारों तरफ से लगभग पांच फीट आठ फीट तक बाढ़ का पानी जमा होने से लोगों का गांव से आवागमन ठप हो गया है।
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रोजगार न मिलने से लोगों के समक्ष आर्थिक संकट बढ़ता ही जा रहा है। लोगों को जीविका चलाने की चिंता सताने लगी है। प्रशासन की तरफ से पर्याप्त नाव की व्यवस्था तक नहीं की जा सकी है। अमर उजाला की टीम पानी से घिरे गांव में पहुंची तो गांव के लोगों की समस्याओं से रुबरू हुई। गांव के लोगों ने बताया कि बाढ़ के पानी से फसलों के डूब जाने से अगले सीजन में चावल खरीदना पड़ेगा। मड़इयां, कच्चे मकान गिर जाने से सरकारी मदद की जरूरत है। जलजमाव के चलते मच्छरों का प्रकोप बढ़ गया है। दुर्गध उठने से एक-एक पल बिताना मुश्किल हो रहा है। लेकिन अभी तक रासायनिक दवाओं का छिड़काव नहीं किया जा सका है।
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गांव के सुरेश यादव ने कहा कि हाहा नाला की खुदाई हो जाती तो गांव में बाढ़ का पानी नहीं घुसता। गांव में जिन लोगों के मकान गिर गए हैं। जनकल्याणकारी योजनाओं के तहत मदद की जाए। फसल क्षति का आकलन कर मुआवजा दिया जाए। गांव में रासायनिक दवाओं का छिड़काव कराया जाए। वहीं महावीर राजभर ने बताया कि प्रतिवर्ष घाघरा के कहर से आर्थिक क्षति उठानी पड़ती है। महीनों से जलजमाव से रोजी रोजगार ठप हो गया है। पर्याप्त नाव की व्यवस्था न होने के चलते गांव से बाहर लोग निकल नहीं पा रहे हैं। प्रशासन की तरफ से दी जा रही राहत सामग्री ऊंट के मुंह मे जीरा साबित हो रही है। जरूरत के मुताबिक राहत सामग्री वितरित किया जाए।
यहीं के रजेंद्र राजभर ने बताया कि घाघरा प्रतिवर्ष कहर बरपाती है। नदी के कहर से बचाने के लिए बंधा के निर्माण की मांग लंबे समय से हो रही है। लेकिन शासन प्रशासन की तरफ से सुधि नहीं ली जा सकी है। बाढ़ से काफी नुकसान होने से लोगों की आर्थिक स्थिति दयनीय हो गई है। सरकार की तरफ से आर्थिक पैकेज दिया जाए।

उधर समरजीत ने बताया कि गांव के लोगों को प्रतिवर्ष बाढ़ आपदा झेलनी पड़ रही है। संपर्क मार्गो को ऊंचा करने तथा पुलिया लगाने की मांग लंबे समय से हो रही है। प्रशासनिक अधिकारियों तथा जनप्रतिनिधियों को अवगत कराया गया, लेकिन आश्वासन के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हो सका है। मनरेगा का काम नहीं मिलने से लोग बेरोजगार हो गए है। सरकार की तरफ से गांव के लोगों को रोजगार दिलाया जाए। साथ ही बाढ़ से हुए नुकसान का मुआवजा दिया जाए।- समरजीत राजभर
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