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खेती की आधुनिक तकनीक पर होगी चर्चा
mau
Updated Thu, 15 Nov 2018 12:36 AM IST
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नगर के कुशमौर स्थित एनबीएआईएम में आयोजित अतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक संगोष्ठी के दौरान लैब देखते वैज्ञानिक।
- फोटो : mau
परदहां ब्लाक क्षेत्र के कुशमौर स्थित राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्म जीव ब्यूरो के सभागार में बुधवार को तीन दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिकों की संगोष्ठी का उद्घाटन हुआ। इस दौरान भारत और यूके में फसलों में नाइट्रोजन स्थिरीकरण पर चल रही संयुक्त परियोजना के वार्षिक प्रगति पर चर्चा की गई।
संस्थान के निदेशक डॉ. अनिल कुमार सक्सेना ने कहा कि राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो 15 वर्षों से देश के विभिन्न जलवायुवीय क्षेत्रों से एकत्र सूक्ष्मजीवों के संवर्धन एवं संरक्षण का कार्य कर रहा है।
यहां के वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मजीव आधारित अनेक उत्पादों का विकास किया है जो जैव उर्वरक एंव जैव कीटनाशी के रूप में प्रयोग किए जा रहे हैं और इनके प्रयोग से मृदा स्वास्थ्य में सुधार तथा पौधों में पोषण वृद्धि के लक्ष्य को प्राप्त किया जा रहा है।
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प्रमुख रूप से विकसित बायोफार्मूलेशन, बायो-एनपीके, बायो-ग्रो, बायो-जिंक, बायो-फॉस, बायो-पोटाश आदि के प्रयोग से किसानों के फसल उत्पादन लागत में कमी आ रही है। बताया कि चने, मटर, मूंग, मसूर, लोबिया, सोयाबीन आदि से प्रभावी राइजोबियम प्रवर्धो का संकलन किया गया है।
भारतीय मृदा संस्थान भोपाल के डॉ. डीएलएन राव ने कहा कि कृषि मंत्रालय, आईसीएआर की कोआर्डिनेटेड परियोजना के माध्यम से मप्र तथा छत्तीसगढ़ में सोयाबीन के लिए किसानों को प्रतिवर्ष राइजोबियम कल्चर उपलब्ध कराया जाता है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. फिलिप साइमन पोल ने अरहर के लिए विशेषीकृत एवं अनुकूलित राइजोबियम के गुणों एवं क्रियाविधि पर प्रकाश डाला।
आगामी तीन दिनों तक संस्थान में भविष्य की शोध योजनाओं पर मंथन होगा। बताया कि इसके अलावा खेती की अाधुनिक तकीनीकियों पर भी चर्चा होगी।
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संस्थान के निदेशक डॉ. अनिल कुमार सक्सेना ने कहा कि राष्ट्रीय कृषि उपयोगी सूक्ष्मजीव ब्यूरो 15 वर्षों से देश के विभिन्न जलवायुवीय क्षेत्रों से एकत्र सूक्ष्मजीवों के संवर्धन एवं संरक्षण का कार्य कर रहा है।
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यहां के वैज्ञानिकों ने सूक्ष्मजीव आधारित अनेक उत्पादों का विकास किया है जो जैव उर्वरक एंव जैव कीटनाशी के रूप में प्रयोग किए जा रहे हैं और इनके प्रयोग से मृदा स्वास्थ्य में सुधार तथा पौधों में पोषण वृद्धि के लक्ष्य को प्राप्त किया जा रहा है।
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प्रमुख रूप से विकसित बायोफार्मूलेशन, बायो-एनपीके, बायो-ग्रो, बायो-जिंक, बायो-फॉस, बायो-पोटाश आदि के प्रयोग से किसानों के फसल उत्पादन लागत में कमी आ रही है। बताया कि चने, मटर, मूंग, मसूर, लोबिया, सोयाबीन आदि से प्रभावी राइजोबियम प्रवर्धो का संकलन किया गया है।
भारतीय मृदा संस्थान भोपाल के डॉ. डीएलएन राव ने कहा कि कृषि मंत्रालय, आईसीएआर की कोआर्डिनेटेड परियोजना के माध्यम से मप्र तथा छत्तीसगढ़ में सोयाबीन के लिए किसानों को प्रतिवर्ष राइजोबियम कल्चर उपलब्ध कराया जाता है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्रो. फिलिप साइमन पोल ने अरहर के लिए विशेषीकृत एवं अनुकूलित राइजोबियम के गुणों एवं क्रियाविधि पर प्रकाश डाला।
आगामी तीन दिनों तक संस्थान में भविष्य की शोध योजनाओं पर मंथन होगा। बताया कि इसके अलावा खेती की अाधुनिक तकीनीकियों पर भी चर्चा होगी।