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टूट गई आस, नहीं दिख रही कोई उम्मीद
ब्यूरो, मऊ, अमर उजाला
Updated Mon, 13 Apr 2015 11:03 PM IST
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परदहां ब्लाक का पिपरीडीह गांव के किसान देवनाथ की दस अप्रैल को फसल बर्बाद होने के बाद हुई मौत के गम से अभी गांव उबर नहीं पाया है। इसके बावजूद लोगों में दूसरी अनहोनी की आशंका बनी हुई है। सोमवार को गांव का दृश्य इसकी दास्तां बयान कर रहा था। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि गांव के अधिकंाश किसानों के गेहूं खेतों में ही हैं।
सोमवार को दो बजे दोपहरी में गांव के सिवान में किसान मुहम्मद अली अपनी आधी से अधिक फसल बर्बाद होने के बाद भूसे को तराजू से तौल रहे थे। वह भूसे को बेच कर उपज के घाटे को पूरा करने की जुगत में थे।
उन्होंने बताया कि गांव का कोई ऐसा किसान नहीं है जिसकी फसल बर्बाद नहीं हुई हुई हो, बल्कि पूरे जिले का यही हाल है। किसानों की लागत भी गेहूं की उपज और भूसे से नहीं निकल पाई है। मेहनत और फायदा को भूल जाइए। यह दर्द सिर्फ मुहम्मद अली का ही नहीं बल्कि सियरही और सिगाड़ी गांव जहां किसानों की मौत हो चुकी है, के साथ ही जनपद के सभी किसानों का है।
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इसके इतर सरकार की घोषणाएं और किसानों केे बर्बादी की जमीनी हकीकत में इतना अंतर है कि किसी को भी यह महसूस नहीं हो रहा है कि उन्हें उनकी फसल की क्षतिपूर्ति भी शासन प्रशासन के इस मानक से मिल भी सकेगी। उधर, बेमौसम ओलावृष्टि एवं बार बार हुई बरसात से हुई क्षति का सर्वे कागजों पर भी प्रशासन ने पूरा नहीं किया है। यहां तक कि जिस गांव में किसान की मौत हो चुकी है वहां भी कोई झांकने अभी तक नहीं गया है। मृतक देवनाथ के दो बच्चे अनाथ तो हो ही गए संयुक्त परिवार में छह भाइयों के बीच देवनाथ के मरने के बाद अकेले पंचम पर सभी का बोझ है। शेष भाइयों की मौत पहले ही हो चुकी है। घर की विधवाओं में महज मनोरमा को पेंशन मिलती है। उसके पास सरकारी सुविधाओं के नाम पर एक गरीबी रेखा से ऊपर का राशन कार्ड है जिस पर वह सिर्फ मिट्टी का तेल उठा पाती है।
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सोमवार को दो बजे दोपहरी में गांव के सिवान में किसान मुहम्मद अली अपनी आधी से अधिक फसल बर्बाद होने के बाद भूसे को तराजू से तौल रहे थे। वह भूसे को बेच कर उपज के घाटे को पूरा करने की जुगत में थे।
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उन्होंने बताया कि गांव का कोई ऐसा किसान नहीं है जिसकी फसल बर्बाद नहीं हुई हुई हो, बल्कि पूरे जिले का यही हाल है। किसानों की लागत भी गेहूं की उपज और भूसे से नहीं निकल पाई है। मेहनत और फायदा को भूल जाइए। यह दर्द सिर्फ मुहम्मद अली का ही नहीं बल्कि सियरही और सिगाड़ी गांव जहां किसानों की मौत हो चुकी है, के साथ ही जनपद के सभी किसानों का है।
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इसके इतर सरकार की घोषणाएं और किसानों केे बर्बादी की जमीनी हकीकत में इतना अंतर है कि किसी को भी यह महसूस नहीं हो रहा है कि उन्हें उनकी फसल की क्षतिपूर्ति भी शासन प्रशासन के इस मानक से मिल भी सकेगी। उधर, बेमौसम ओलावृष्टि एवं बार बार हुई बरसात से हुई क्षति का सर्वे कागजों पर भी प्रशासन ने पूरा नहीं किया है। यहां तक कि जिस गांव में किसान की मौत हो चुकी है वहां भी कोई झांकने अभी तक नहीं गया है। मृतक देवनाथ के दो बच्चे अनाथ तो हो ही गए संयुक्त परिवार में छह भाइयों के बीच देवनाथ के मरने के बाद अकेले पंचम पर सभी का बोझ है। शेष भाइयों की मौत पहले ही हो चुकी है। घर की विधवाओं में महज मनोरमा को पेंशन मिलती है। उसके पास सरकारी सुविधाओं के नाम पर एक गरीबी रेखा से ऊपर का राशन कार्ड है जिस पर वह सिर्फ मिट्टी का तेल उठा पाती है।