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घरेलू गैस से चालित वाहनों में ढो रहे मासूम
Mau
Updated Wed, 06 Aug 2014 05:30 AM IST
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मऊ। अंग्रेजी माध्यम के अधिकांश निजी स्कूलों में इस समय बच्चों को लाने ले जाने के लिए अनाधिकृत रूप से वाहन चलाए जा रहे हैं। गैर पंजीकृत खटारा वाहनों में न सिर्फ मासूमों को भूसे की तरह ठूंस कर ढोया जा रहा है, बल्कि कई स्कूलों में घरेलू गैस से चलने वाले वाहनों में भी बेरोकटोक बच्चाें को ढोया जा रहा है। जिससे कभी भी किसी बड़ी दुर्घटना से इनकार नहीं किया जा सकता है। यह बात दीगर है कि संबंधित अधिकारी इसके प्रति लापरवाह बने हुए हैं। जबकि गत सोमवार को सहारनपुर में घरेलू गैस से चलने वाली वैन के गैस किट में आग लगने से वह आग का गोला बन गई थी जिसमें तीन मासूम जिंदा जल गए थे और कई बुरी तरह झुलस कर जिंदगी मौत के बीच झूल रहे हैं।
गौरतलब है कि जिले में कुल 135 स्कूली वाहन पंजीकृत हैं। इसके अलावा ओमिनी वैन से लेकर कई वाहन ऐसे हैं, जो न सिर्फ गैर पंजीकृत हैं बल्कि घरेलू गैस से चलते हैं। ऐसे वाहनों की तादाद सैकड़ों में है। यही नहीं कई स्कूलों में तमाम ऐसे वाहन हैं, जो अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं, फिरभी स्कूल संचालक ऐसे वाहनों से स्कूली बच्चों को ढो रहे हैं। इसमें पचास से अधिक संख्या में आटो और मैजिक भी स्कूल वाहन के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। नियमत: समय समय पर परिवहन विभाग द्वारा ऐसे सभी वाहनों की मेंटीनेंस जांच होनी चाहिए, जिन पर स्कूल वाहन लिखा होना चाहिए, या फिर स्कूल का नाम लिखा हो। मगर विभाग केवल शहरी क्षेत्र के नामचीन स्कूलों के वाहनों की मेंटीनेंस जांच कर अपने दायित्वों की खानापूर्ति कर लेता है। वह उन स्कूल वैनों और अन्य छोटे स्कूल वाहनों पर हाथ नहीं लगता। विभाग यह भी जानने की कोशिश नहीं करता कि पीले रंग के स्कूल वाहन लिखे वाहन सचमुच स्कूल में चल रहा है या नहीं।
गौरतलब है कि जिले में कुल 135 स्कूली वाहन पंजीकृत हैं। इसके अलावा ओमिनी वैन से लेकर कई वाहन ऐसे हैं, जो न सिर्फ गैर पंजीकृत हैं बल्कि घरेलू गैस से चलते हैं। ऐसे वाहनों की तादाद सैकड़ों में है। यही नहीं कई स्कूलों में तमाम ऐसे वाहन हैं, जो अपनी उम्र पूरी कर चुके हैं, फिरभी स्कूल संचालक ऐसे वाहनों से स्कूली बच्चों को ढो रहे हैं। इसमें पचास से अधिक संख्या में आटो और मैजिक भी स्कूल वाहन के रूप में इस्तेमाल हो रहे हैं। नियमत: समय समय पर परिवहन विभाग द्वारा ऐसे सभी वाहनों की मेंटीनेंस जांच होनी चाहिए, जिन पर स्कूल वाहन लिखा होना चाहिए, या फिर स्कूल का नाम लिखा हो। मगर विभाग केवल शहरी क्षेत्र के नामचीन स्कूलों के वाहनों की मेंटीनेंस जांच कर अपने दायित्वों की खानापूर्ति कर लेता है। वह उन स्कूल वैनों और अन्य छोटे स्कूल वाहनों पर हाथ नहीं लगता। विभाग यह भी जानने की कोशिश नहीं करता कि पीले रंग के स्कूल वाहन लिखे वाहन सचमुच स्कूल में चल रहा है या नहीं।
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