मऊ। होली में महज सप्ताहभर बचा है। लेकिन अब होली की आहट देने वाले वहीं पुराने होली गीत के मदहोश कर देने वाली धुन और गीत सुनाई नहीं दे रहे। खास तौर से सांझ ढले जोगीरा सराररा तो अब सुनने को ही नहीं मिलता। लेकिन अब भी कहा जाए तो आजकल के अश्लील होली गीतों पर पुराने होली गीत भारी पड़ते हैं। पहले गांवों में वसंत ऋतु के आगमन से ही गांवों गिरावों में होरियारों द्वारा फाग गीतों के मस्ती भरे बोल सुनाई देने लगते थे। गांवों में चौधुर के बैठकों में होली गीत के मस्तानों की टोली आ जुटती। सांझ ढलते ही ढोलक झाल पर उत्साही गवइयों की महफिल सज जाती तो फिर रात के दस बजे कि ग्यारह ,पता ही नहीं चलता। पहले तो धार्मिक पुट लिए गाने गाए जाते और जब महफिल चरम पर पहुंच जाती तो देवर भारी, पति पत्नी, जीजा साली और अन्य मजाकिया रिश्तों को गुदगुदाते, आह्लादित करते, झिझोड़ते गीतों तक पहुंच जाते। आज बिरज में होरी रे रसिया...., होरी खेलें रघुबीरा अवध में होरी खेलें रघबीरा ..। कबीरा सररररर... जैसे पारंपरिक होली गीत अब सुनने को नहीं मिलते और न ही लोगों के घरों पर एकत्र होकर होली गीत गाने वालों के दर्शन ही होते हैं। यह परंपरा ही अब खत्म हो गई है। हां, अब उनकी जगह फूहड़ और अश्लील गाने सुनने को मिल रहे। सवारी वाहनों जीपों, टेंपो और टैक्सियों में फूहड़ गानों वाले कैसेट की भरमार हो गई। क्षेत्र के बुजुर्ग जयनारायन सिंह,जिंतन सिंह,राम अवतार ,गिरीश आदि बताते हैं कि पहले प्रतिदिन शाम को ढोल मंजीरे, झाल के साथ हम लोग टोली बना कर गांव के घर घर जाकर होली के फागुन गीत गाया करते थे। आधुनिकता के कारण पारंपरिक होली गीतों की परपंरा ही विलुप्त होती जा रही है। परंतु अब रंगों से सराबोर कर देने वाली होली में मिठास घोलने वाली जोगीरा की बोली अब खामोश हो गयी है।