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राम की चरण पादुका लेकर लौटे भरत
Updated Sat, 13 Oct 2018 11:16 PM IST
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गाजीपुर। शहर की रामलीला में शुक्रवार को भरत मिलाप का मंचन किया गया।
भरत का रथ जब अयोध्या में प्रवेश करता है तो अयोध्यावासी उनसे तिरस्कार दिखाते हैं। कहते है कि उनके राजपाट के लिए ही कैकई ने यह सब किया है, जिससे राम वन गए है और दशरथ जी की मृत्यु हुई है। तब भरत अयोध्यावासियो को लेकर अपने भाई श्रीराम को मनाने के लिए भरतध्वज मुनि के आश्रम की ओर प्रस्थान करते है। लाख मनाने के बाद राम अयोध्या नहीं लौटते हैं तब भरतजी उनकी चरण पादुका लेकर वापस अयोध्या चले आते है। इसी क्रम में रामलीला समिति धारानगर मुहम्मदाबाद की लीला में जनकपुर भ्रमण और फुलवारी का मंचन किया गया। राम बने नवनीत पांडेय और लक्ष्मण का किरदार निभा रहे सोनू पांडेय ने अपने सशक्त अभिनय की छाप छोड़ी। इससे पहले जनकपुर घूमने के बाद जब फुलवारी में राम की नजर सीता पर पड़ती है तो वह उन्हें निहारते ही रह जाते हैं। इधर सीताजी भी जब राम को देखती है तो उनकी नजर ही भगवान के चेहरे पर से नहीं हटती है। लक्ष्मण जी यह देख कर दोनों को प्रणाम करने लगते है। दशरथ के सार के रूप में सूत्रधार बताता है कि आत्मा रूपी सीता परमात्मा रूपी भगवान को पाने के लिए तड़प उठी। इस दृश्य के बाद सीताजी दोबारा मां दुर्गा के पूजन के लिए जाती है और राम को ही अपने पति के रूप में पाने की मन्नत मांगती है। इस मौके पर मुरलीधर पाठक, रामानंद पांडेय, हृदयनारायण पांडेय, धीरेन्द्र कुमार, सौदागर पांडेय आदि प्रेरणादायी बने रहे।
भरत का रथ जब अयोध्या में प्रवेश करता है तो अयोध्यावासी उनसे तिरस्कार दिखाते हैं। कहते है कि उनके राजपाट के लिए ही कैकई ने यह सब किया है, जिससे राम वन गए है और दशरथ जी की मृत्यु हुई है। तब भरत अयोध्यावासियो को लेकर अपने भाई श्रीराम को मनाने के लिए भरतध्वज मुनि के आश्रम की ओर प्रस्थान करते है। लाख मनाने के बाद राम अयोध्या नहीं लौटते हैं तब भरतजी उनकी चरण पादुका लेकर वापस अयोध्या चले आते है। इसी क्रम में रामलीला समिति धारानगर मुहम्मदाबाद की लीला में जनकपुर भ्रमण और फुलवारी का मंचन किया गया। राम बने नवनीत पांडेय और लक्ष्मण का किरदार निभा रहे सोनू पांडेय ने अपने सशक्त अभिनय की छाप छोड़ी। इससे पहले जनकपुर घूमने के बाद जब फुलवारी में राम की नजर सीता पर पड़ती है तो वह उन्हें निहारते ही रह जाते हैं। इधर सीताजी भी जब राम को देखती है तो उनकी नजर ही भगवान के चेहरे पर से नहीं हटती है। लक्ष्मण जी यह देख कर दोनों को प्रणाम करने लगते है। दशरथ के सार के रूप में सूत्रधार बताता है कि आत्मा रूपी सीता परमात्मा रूपी भगवान को पाने के लिए तड़प उठी। इस दृश्य के बाद सीताजी दोबारा मां दुर्गा के पूजन के लिए जाती है और राम को ही अपने पति के रूप में पाने की मन्नत मांगती है। इस मौके पर मुरलीधर पाठक, रामानंद पांडेय, हृदयनारायण पांडेय, धीरेन्द्र कुमार, सौदागर पांडेय आदि प्रेरणादायी बने रहे।