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28 नर्सिंग होम के पास नहीं है बायो मेडिकल वेस्टेज प्लांट

Fri, 02 Feb 2018 10:59 PM IST
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mau news Updated Fri, 02 Feb 2018 10:59 PM IST
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28 nursing homes do not have Bio-Medical Vestage Plant
एक अस्पताल के बाहर फेका पड़ा अस्पताल का कूड़ा।
मऊ। वैसे तो जिले में नर्सिंग होमों की भरमार है, लेकिन पंजीकृत 29 नर्सिंग होमों में से एक को छोड़ अन्य किसी अस्पताल में बायो मेडिकल वेस्टेज प्लांट न लगने के कारण शासन के स्वच्छता मिशन पर बट्टा लग रहा है। वैसे भी जागरुकता के अभाव में स्वच्छता अभियान मऊ जिले में फिसड्डी चल रहा है। उसमें यह सुविधा न होने से नगर क्षेत्र में गंदगी का अंबार बढ़ रहा। गुरुवार को नगर क्षेत्र के स्वदेशी काटन मिल के पास सड़क पर फेंके गए भ्रूण इस घटना की पुष्टि और स्वच्छता में दाग लगाने के लिए काफी है।
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 जिले में करीब सौ अस्पताल संचालित है, लेकिन सीएमओ कार्यालय में महज 29 नर्सिंग होम का पंजीकरण किया गया है। इसमें से फातिमा अस्पताल को छोड़ दिया जाए तो अन्य किसी नर्सिंग होम के पास अस्पताल से निकलने वाली मानव अंग और अन्य सामानों के निस्तारण के लिए कोई प्लांट नहीं लगाया गया है। इसका परिणाम है कि गुरुवार की शाम शहर के एक बड़े नर्सिंग होम के पास बाहर भ्रूण फेंका मिला, जिसके लिए कुत्तों की फौज जमा थी। कुत्तों का जमघट लगने पर लागों को फेंके गए भ्रूण के बाबत जानकारी हुई। यह घटना तो एक बानगी है, ऐसी घटनाएं मऊ शहर में आए दिन होती है, कारण पंजीकरण कराने के लिए नर्सिंग होम संचालक फार्मेल्टी पूरी करते हुए किसी बायो वेस्टेज प्लांट चलाने वाली संस्था के पैड पर अपने अस्पताल को अंडरटेकिंग दर्शाकर पंजीकरण करा लेते है। लेकिन असल में यह संस्था अस्पतालों से निकलने वाले अवशेषों को संग्रहित करने के लिए नहीं आती। ऐसे में अस्पताल संचालक अवशेष को कूड़ों पर फेंक देते हैं।
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बताते चले जिला अस्पताल को लेकर वहां से भीटी मोड़ के बीच अस्पतालों की लंबी फेहरिस्त है। इन अस्पतालों से प्रति दिन भारी मात्रा में बायो मेडिकल वेस्ट निकलते हैं। व्यवस्था न होने के कारण नगर पालिका के द्वारा लगाए गए कूड़दान में इन अस्पतालों के वेस्टेज पड़े रहते हैं। अब कोई संक्रमण फैले उससे इन अस्पताल के संचालकों का क्या लेना देना है।
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इनसेट
अस्पतालों से निकले वेस्टेज का निकलना है आवश्यक
मऊ। मेडिकल नियम के अनुसार अस्पतालों से निकलने वाले अपशिष्ट (बेकार पदार्थ) का सही प्रकार से निवारण करना आवश्यक होता है। निस्तारण न होने की दशा में इससे संक्रामक और असंक्रामक रोगों के फैलने की अशंका बनी होती है। जिससे अस्पताल के कर्मचारियों के साथ रोगी इससे प्रभावित हो सकते है। लेकिन सभी अस्पताल पंजीकरण में मानक की फार्मेल्टी पूरा कर देते हैं, इसके कारण कुछ नहीं किया जा सका।-मुख्य चिकित्साधिकारी डा. सतीशचंद्र सिंह
इनसेट मऊ। मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया ने अस्पतालों से निकलने वाले बायो मेडीकल वेस्ट के बाबत एक सर्कुलर 1998 में जारी किया है। इसका पूरा नाम बायो वेस्ट मैनेजटमेंट एंड हैंडलिंग एक्ट रखा गया। इसके तहत ऐसे बायो-मेडिकल कचरे को इकठ्ठा करने , उत्पन्न करने, प्राप्त करने में, ट्रांसपोर्ट , डिस्पोज करते हैं या उनसे संबंधित डील करते हैं। यह नियम अस्पताल, नर्सिंग होम, क्लीनिक, डिस्पेंशरी, पशु संस्थान, पैथोलोजिकल लैब और ब्लड बैंक पर लागू होता है. ऐसे संस्थानों के लिए बायो मेडिकल वेस्ट / मेडिकल कचरे को ट्रीट करने के लिए अपने संस्थानों में मशीनें और आधुनिक उपकरण लगाने होगें, या फिर इसके निकारण के लिए उचित व्यवस्था का सर्टिफिकेट होना आवश्यक है। यदि किसी नर्सिंग होम के पास यह सर्टिफिकेट उपलब्ध नहीं है तो संबंधित हॉस्पिटल का पंजीकरण रद्द किया जाता है।
इनसेट
ऐसे समझे वेस्ट मेडिकल
मऊ। देश में प्रति बेड प्रति अस्पताल में 1-2 किलोग्राम और हर क्लिनिक पर 600 ग्राम प्रतिदिन मेडिकल वेस्ट / मेडिकल कूड़ा पाया जाता है। इस तरह से अगर कोई 100 बेड का अस्पताल है ,तो हर दिन वहाँ से 100-200 किलो मेडिकल वेस्ट / मेडिकल कचरा उत्पन्न होता है। इनमें से करीब 5-10% मेडिकल वेस्ट घातक और संक्रामक होता है। जो कि 100 बेडेड अस्पतालों में करीब 5-10 किलो प्रतिदिन हो सकता है.

इनसेट
इस तरह से निस्तारित किया जाता है वेस्ट मेडिकल
मऊ। अस्पतालों से निकलने वाले मेडिकल वेस्ट को सेग्रीगेशन, डिस् इन्फेक्शन , स्टोरेज, फ़ाइनल डिस्पोजल प्रक्रिया से निस्तारित किया जा सकता है। इसमें सेग्रीगेशन प्रक्रिया के तहत मअलग अलग अवशिष्ट पदार्थों को अलग रंगों के थैलों में डाला जाता है. जिससे सबका अलग तरह से निस्तारण होता है। वहीं डिस् इन्फेक्शन प्रक्रिया से हानिकारक कीटाणुओं को हटा दिया जाता है। जबकि स्टोरेज प्रक्रिया के तहत अपशिष्टों को निश्चित जगहों पर थैलों में भरकर रखा जाता है. इन थैलों पर नाम लिखते हैं और सिक्यूरिटी गार्ड रखा जाता है. ताकि कोई बाहरी व्यक्ति या कूड़ा उठाने वाला उसे गलती से न ले जाए. बाद में अस्पताल की निश्चित गाड़ियों में रखकर इन्हें जलाने या दफनाने भेजा जाता है। वहीं फ़ाइनल डिस्पोजल प्रक्रिया के तहत जो पदार्थ संक्रामक होते हैं उन्हें जलाया जाता है। जो संक्रामक नहीं होते हैं, उन्हें फिर से रीसाइकिल करके उपयोग कर लेते हैं.
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