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भवन हैंडओवर होने के दो माह बाद भी नहीं लगी मशीनें
Updated Sun, 02 Sep 2018 11:04 PM IST
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जिला अस्पताल परिसर में 60 लाख की लागत से 10 बेड के नवनिर्मित पीडियाट्रिक आईसीयू पर ताला लटका है। कारण, दो माह से यहां अभ्ी तक मशीनें नहीं मंगाई जा सकी है। जबकि कार्यदायी संस्था ने इसे जिला अस्पताल प्रशासन को हस्तांतरित भी कर दिया है। हस्तांतरण के दूसरे दिन ही शासन से आई नोडल अधिकारी ने अस्पताल का भौतिक सत्यापन कर उसे तत्काल शुरू करने का आदेश दिया था। ऐसे में आईसीयू के शुरू न होने से जिला अस्पताल से गंभीर बच्चों को वाराणसी के लिए रेफर कर दिया रहा।
स्वास्थ्य विभाग द्वारा सदर अस्पताल में 10 बेड वेंटिलेटर युक्त पीडियाट्रिक आईसीयू भवन बनाने के लिए 2016-17 में 59 लाख 50 हजार की राशि अवमुक्त की गई थी। कार्यदायी संस्था यूपीआरएनएसएस आजमगढ़ ने इसे 15 माह में पूरा कर 23 जून 2018 को अस्पताल प्रबंधन को हस्तांतरित कर दिया। लेकिन दो माह बाद भी आईसीयू दो करोड़ की लागत से सभी बेडों पर लगनी वाली मशीनें, टीवी स्क्रीन, आक्सीजन सहित अन्य अत्याधुनिक उपकरण नहीं मंगाए जा सके हैं। जबकि शासन स्तर पर यहां के लिए दो बाल रोग विशेषज्ञ, एक लैब टेक्नीशियन और 17 स्टॉफ नर्स की तैनाती कर दी गई। उधर उपकरण न लगने के चलते जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) व एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) और दूसरी गंभीर बीमारियों से पीड़ित बच्चों को प्राथमिक उपचार के बाद वाराणसी रेफर किया जा रहा है। जबकि कई मरीजों के तीमारदार उन्हें निजी अस्पतालों में ले जाने को मजबूर हैं। ऐसे में इन निजी अस्पतालों की चांदी कट रही है।
कोट
पीडियाट्रिक आईसीयू बनकर तैयार है। वहां के लिए कुछ उपकरण आ चुके हैं। कुछ आने वाले हैं। इसी महीने आईसीयू शुरू करा दिया जाएगा।
डा. बृजकुमार, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्ताल
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स्वास्थ्य विभाग द्वारा सदर अस्पताल में 10 बेड वेंटिलेटर युक्त पीडियाट्रिक आईसीयू भवन बनाने के लिए 2016-17 में 59 लाख 50 हजार की राशि अवमुक्त की गई थी। कार्यदायी संस्था यूपीआरएनएसएस आजमगढ़ ने इसे 15 माह में पूरा कर 23 जून 2018 को अस्पताल प्रबंधन को हस्तांतरित कर दिया। लेकिन दो माह बाद भी आईसीयू दो करोड़ की लागत से सभी बेडों पर लगनी वाली मशीनें, टीवी स्क्रीन, आक्सीजन सहित अन्य अत्याधुनिक उपकरण नहीं मंगाए जा सके हैं। जबकि शासन स्तर पर यहां के लिए दो बाल रोग विशेषज्ञ, एक लैब टेक्नीशियन और 17 स्टॉफ नर्स की तैनाती कर दी गई। उधर उपकरण न लगने के चलते जापानी इंसेफेलाइटिस (जेई) व एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम (एईएस) और दूसरी गंभीर बीमारियों से पीड़ित बच्चों को प्राथमिक उपचार के बाद वाराणसी रेफर किया जा रहा है। जबकि कई मरीजों के तीमारदार उन्हें निजी अस्पतालों में ले जाने को मजबूर हैं। ऐसे में इन निजी अस्पतालों की चांदी कट रही है।
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कोट
पीडियाट्रिक आईसीयू बनकर तैयार है। वहां के लिए कुछ उपकरण आ चुके हैं। कुछ आने वाले हैं। इसी महीने आईसीयू शुरू करा दिया जाएगा।
डा. बृजकुमार, मुख्य चिकित्सा अधीक्षक, जिला अस्ताल