{"_id":"598b568e4f1c1bad518b4639","slug":"181502303886-mau-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"मूल उद्देश्यों से भटक गई मनरेगा योजना","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मूल उद्देश्यों से भटक गई मनरेगा योजना
Updated Thu, 10 Aug 2017 12:08 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मऊ। गांवों में मजदूरों को काम देकर उन्हें स्वावलंबी बनाने और शहरों की ओर उनका पलायन रोकने के उद्देश्य से संचालित मनरेगा योजना अपने मूल उद्देश्यों से भटक गई है। केंद्र सरकार की वर्तमान में की गई केंद्रीयकृत भुगतान व्यवस्था से मजदूरों को मजदूरी मिलने में दो से तीन महीने लग जा रहे हैं। इससे मजदूर गांवों में काम करने के लिए तैयार नहीं हो रहे हैं और उनका पलायन शहरों की ओर बढ़ रहा है।
मनरेगा के तहत पहले ग्राम निधि में मजदूरों का धन आता था। मरेगा के तहत कराए गए कामों के मस्टररोल के आधार पर ग्राम प्रधान मजदूरों को मजदूरी देते थे। इसमें शिकायत आने पर सरकार मस्टररोल के आधार पर मजदूरों की मजदूरी उनके बैंक खातों में भेजी जाने लगी। लेकिन अब उस व्यवस्था को भी बदल दिया गया है। अब मजदूरों के बैंक खातों में सीधे लखनऊ से मजदूरी की रकम भेजी जा रही है। केंद्रीय व्यवस्था होने के चलते मजदूरी की रकम भेजने में काफी विलंब हो रहा हैं। प्रदेश के सभी 822 ब्लाकों के विभिन्न गांवों में मजदूरों के बैंक खातों तक मजदूरी पहुंचने में दो से तीन महीने का समय लग जा रहा है। मनरेगा मजदूरों की दिनचर्या रोजाना कमाना रोजाना खाना की तर्ज पर चलती है। रोजाना नहीं तो कम से कम एक सप्ताह में उन्हें मजदूरी मिलती रहती है तो उनका राशन, दवा और अन्य दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति उधार से भी होती रहती। लेकिन अब स्थिति इसके ठीक विपरीत हो गई है। इसलिए मजदूर गांवों में मनरेगा के तहत काम करने के इच्छुक नहीं हैं क्योंकि उन्हें समय से मजदूरी नहीं मिल पा रही है।
मनेरगा मजदूूरों के लिए अब केंद्रीयकृत नई व्यवस्था के चलते मजदूरी भुगतान में दो से तीन महीने लग जा रहे हैं। मजदूरी विलंब से मिलने के चलते
विज्ञापन
मनरेगा के तहत पहले ग्राम निधि में मजदूरों का धन आता था। मरेगा के तहत कराए गए कामों के मस्टररोल के आधार पर ग्राम प्रधान मजदूरों को मजदूरी देते थे। इसमें शिकायत आने पर सरकार मस्टररोल के आधार पर मजदूरों की मजदूरी उनके बैंक खातों में भेजी जाने लगी। लेकिन अब उस व्यवस्था को भी बदल दिया गया है। अब मजदूरों के बैंक खातों में सीधे लखनऊ से मजदूरी की रकम भेजी जा रही है। केंद्रीय व्यवस्था होने के चलते मजदूरी की रकम भेजने में काफी विलंब हो रहा हैं। प्रदेश के सभी 822 ब्लाकों के विभिन्न गांवों में मजदूरों के बैंक खातों तक मजदूरी पहुंचने में दो से तीन महीने का समय लग जा रहा है। मनरेगा मजदूरों की दिनचर्या रोजाना कमाना रोजाना खाना की तर्ज पर चलती है। रोजाना नहीं तो कम से कम एक सप्ताह में उन्हें मजदूरी मिलती रहती है तो उनका राशन, दवा और अन्य दैनिक आवश्यकताओं की पूर्ति उधार से भी होती रहती। लेकिन अब स्थिति इसके ठीक विपरीत हो गई है। इसलिए मजदूर गांवों में मनरेगा के तहत काम करने के इच्छुक नहीं हैं क्योंकि उन्हें समय से मजदूरी नहीं मिल पा रही है।
विज्ञापन
मनेरगा मजदूूरों के लिए अब केंद्रीयकृत नई व्यवस्था के चलते मजदूरी भुगतान में दो से तीन महीने लग जा रहे हैं। मजदूरी विलंब से मिलने के चलते