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अब न वो जमाना रहा, ना रही वो खुमारी
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मऊ। होली को महज तीन दिन बचे हैं। फिर भी होली की रौनक और होने फगुनाहट गायब है, इसका कारण बदले परिवेश में लोगों की व्यस्त जीवनचर्या है जिसने पर्व पर खासा असर डाला है। जिसके चलते होली करीब होने के बाद भी लोगों को उसकी आहट का एहसास नहीं हो पा रहा।
रतनपुरा ब्लाक के सेमराजपुर गांव निवासी संस्कृत के प्रोफेसर सेवानिवृत्त प्राचार्य डा. जयगोविंद मिश्र ने कहा कि बदलते परिवेश में होली पर्व का दायरा सिमटता जा रहा है। एक समय था, कि जब वसंत पंचमी के दिन होलिका गाड़ी जाती थी, तभी से फागुन माह का आगाज होली ठिठोली के साथ शुरू हो जाता था। रिश्तेदारी में पहुंचने वला रिश्तेदार बिना रंग में डूबे निकल ही नहीं सकता था। जोगिरा और चैता भी जोर पकड़ लेता था। आज होली मस्ती जहां शराब में पिरो दी गई है, वहीं पहले ठंढई बना करती थी, जिसको पीकर लोग पूरे दिन होशों हवास में रहते हुए झूमते थे।
लेकिन बदलते परिवेश और बढ़ती व्यस्तता इन परंपराओं पर पूरी हावी हो चुकी है। नई पौध को बांस की पिचकारी के बारे में पता भी नहीं होगा, अब अत्याधुनिक युग में स्वचालित पिचकाकारियां आ गई हैं। पहले आपसी समरसता थी, गंगा जमुनी तहजीब में मुसलमान भी पर्व में शरीक होता था। अब तो आपसी समरसता को छोड़िए लोग पता लगाते है कि कही होली पर दंगा तो नही हुआ न। बोले होलिका दहन की रात को लोग जमकर हुड़दंग मचाना शुरू करते थे, जो होली पर्व की समाप्ति के साथ ही खत्म होती थी। लेकिन
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रतनपुरा ब्लाक के सेमराजपुर गांव निवासी संस्कृत के प्रोफेसर सेवानिवृत्त प्राचार्य डा. जयगोविंद मिश्र ने कहा कि बदलते परिवेश में होली पर्व का दायरा सिमटता जा रहा है। एक समय था, कि जब वसंत पंचमी के दिन होलिका गाड़ी जाती थी, तभी से फागुन माह का आगाज होली ठिठोली के साथ शुरू हो जाता था। रिश्तेदारी में पहुंचने वला रिश्तेदार बिना रंग में डूबे निकल ही नहीं सकता था। जोगिरा और चैता भी जोर पकड़ लेता था। आज होली मस्ती जहां शराब में पिरो दी गई है, वहीं पहले ठंढई बना करती थी, जिसको पीकर लोग पूरे दिन होशों हवास में रहते हुए झूमते थे।
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लेकिन बदलते परिवेश और बढ़ती व्यस्तता इन परंपराओं पर पूरी हावी हो चुकी है। नई पौध को बांस की पिचकारी के बारे में पता भी नहीं होगा, अब अत्याधुनिक युग में स्वचालित पिचकाकारियां आ गई हैं। पहले आपसी समरसता थी, गंगा जमुनी तहजीब में मुसलमान भी पर्व में शरीक होता था। अब तो आपसी समरसता को छोड़िए लोग पता लगाते है कि कही होली पर दंगा तो नही हुआ न। बोले होलिका दहन की रात को लोग जमकर हुड़दंग मचाना शुरू करते थे, जो होली पर्व की समाप्ति के साथ ही खत्म होती थी। लेकिन
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