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जयगुरुदेव मेले में उमड़ रहे श्रद्धालु
ब्यूरो, अमर उजाला मथुरा
Updated Mon, 18 May 2015 12:28 AM IST
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जयगुरुदेव वार्षिक भंडारा मेले के दूसरे दिन संस्था के राष्ट्रीय उपदेशक सतीष चंद्र और डा. करुणा कांत ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि इतिहास में इस बात का प्रमाण मिलता है कि जितने भी संत फकीर इस धरा पर आए दुनिया के लोगों ने उनका विरोध किया।
बाबा जयगुरुदेव का भी लोगों ने विरोध किया और भ्रामक प्रचार कराया गया, ताकि लोग इनके पास न आएं। सारे रिकार्ड तोड़ते हुए बाबा ने बीस करोड़ से ऊपर लोगों को नामदान दिया।
विद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया के समान ही संतमत में प्रवेश के लिए नामदान प्राप्त करना होता है। जिस प्रकार नाम लिख जाने के बाद बच्चे को प्रतिदिन पढ़ाई करने के लिए विद्यालय जाना पड़ता है और साल के अंत में परीक्षा होती है। उसमें उसके ज्ञान का पता चलता है।
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इसी प्रकार संतमत में नामदान लेने के बाद नित्य प्रति दुनिया के सभी काम को मेहनत-ईमानदारी से करने के बाद, शाम और सुबह नाम का अभ्यास यानी रूहानी कसरत करनी पड़ती है। इससे सुरत और मन की गांठ खुलने लगती है। ऐसे लोगों को गुरुमुख कहा जाता है। जब इंद्रियों से सेवा कार्य किया जाता है तो धीरे-धीरे इंद्रियां पवित्र व शुद्ध हो जाती हैं और ये धीरे-धीरे पूर्ण शाकाहारी हो जाएंगी। मेले में श्रद्धालुओं के आने का क्रम जारी है।
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बाबा जयगुरुदेव का भी लोगों ने विरोध किया और भ्रामक प्रचार कराया गया, ताकि लोग इनके पास न आएं। सारे रिकार्ड तोड़ते हुए बाबा ने बीस करोड़ से ऊपर लोगों को नामदान दिया।
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विद्यालय में प्रवेश प्रक्रिया के समान ही संतमत में प्रवेश के लिए नामदान प्राप्त करना होता है। जिस प्रकार नाम लिख जाने के बाद बच्चे को प्रतिदिन पढ़ाई करने के लिए विद्यालय जाना पड़ता है और साल के अंत में परीक्षा होती है। उसमें उसके ज्ञान का पता चलता है।
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इसी प्रकार संतमत में नामदान लेने के बाद नित्य प्रति दुनिया के सभी काम को मेहनत-ईमानदारी से करने के बाद, शाम और सुबह नाम का अभ्यास यानी रूहानी कसरत करनी पड़ती है। इससे सुरत और मन की गांठ खुलने लगती है। ऐसे लोगों को गुरुमुख कहा जाता है। जब इंद्रियों से सेवा कार्य किया जाता है तो धीरे-धीरे इंद्रियां पवित्र व शुद्ध हो जाती हैं और ये धीरे-धीरे पूर्ण शाकाहारी हो जाएंगी। मेले में श्रद्धालुओं के आने का क्रम जारी है।