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500 साल पहले भी यमुना में चलते थे जहाज

Sat, 20 Aug 2016 12:37 AM IST
राजीव अग्रवाल
राजीव अग्रवाल Updated Sat, 20 Aug 2016 12:37 AM IST
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yamuna was a way of water transport
डा. राजेश शर्मा - फोटो : अमर उजाला वृंदावन
केंद्र सरकार दिल्ली से आगरा तक यमुना में जहाज चलाकर नदी के पुनरोद्धार की बात कर रही है। वहीं ऐतिहासिक साक्ष्य भी बताते हैं कि यमुना मुगलकाल में जल यातायात का प्रमुख माध्यम थी। आज से करीब 500 वर्ष पहले यमुना का जलमार्ग अपने यौवन पर था।
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दिल्ली से आगरा के बीच जहाज चलते थे और वृंदावन महत्वपूर्ण बंदरगाह था। आध्यात्म का केंद्र होने के कारण विशाल मालवाहक नौकाएं वृंदावन में ठहरती थीं। व्यापारी ही नहीं मुगल बादशाह जहांगीर और यूरोपियन पर्यटक भी इसी जलमार्ग से वृंदावन आया करते थे।
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ब्रज संस्कृति विश्वकोश के सहसंपादक डा. राजेश शर्मा के अनुसार 15-16वीं शताब्दी के दौरान दिल्ली से आगरा के बीच यमुना के जलमार्ग में वृंदावन व्यापारियों के ठहराव और धार्मिक पर्यटन का बड़ा केंद्र था। प्राचीन पांडुलिपियों में मिलने वाले ऐसे दुर्लभ और अप्रकाशित संदर्भों की जानकारियां ब्रज संस्कृति विश्वकोश में समाहित की गई हैं।
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उन्होंने बताया कि 16वीं सदी के संत भगवतमुदित द्वारा रचित ग्रंथ रसिक अनन्यमाल में उल्लेखित है कि गोस्वामी हित हरिवंश महाप्रभु के वृंदावन आगमन के समय दस्यु नरवाहन यहां के जलमार्ग से गुजरने वाले व्यापारियों से चुंगी कर वसूलता था, जो बाद में महाप्रभु का शरणागत हुआ। 

तीर्थ पुरोहित पंडित सुरेशचन्द्र शर्मा बताते हैं कि हमारे पूर्वजों की यजमानी सिंध प्रांत (वर्तमान पाकिस्तान) के डेरा गाजी खां, इस्माइल खां और मुल्तान में थी। इसका उल्लेख पुश्तैनी बहियों में है। पुराने समय में व्यापारियों के अलावा यात्री भी जलमार्ग से वृंदावन आते थे। 

वृंदावन शोध संस्थान के निदेशक सतीश चंद्र दीक्षित के अनुसार संस्थान ने ब्रज के गौरवशाली अतीत से जुड़े ऐसे संदर्भों की लिखित परंपरा को विश्वकोश के अंतर्गत संरक्षित किया है। आज सरकार के प्रयासों से 500 साल बाद ब्रज एक बार फिर उसी परिदृश्य को प्राप्त करने की ओर बढ़ रहा है। यह गौरव की बात है।   

बादशाह जहांगीर तीन बार आए वृंदावन
इतिहासकार लक्ष्मीनारायण तिवारी की प्रकाशनाधीन पुस्तक ‘जहांगीर की ब्रजयात्रा’ में उल्लेख है कि मुगल बादशाह जहांगीर अपने 14 और 15वें जलूसी वर्ष (1619-1620 ईस्वी) के मध्य तीन बार यमुना के जलमार्ग से वृंदावन आए। एक यात्रा के दौरान उन्होंने यहां के मंदिर भी देखे।

मुगल सल्तनत में सत्ता का केंद्र आगरा होने के कारण जलमार्ग के लिए व्यापारियों को परमिट भी आगरा और वृंदावन से जारी होते थे। यह व्यवस्था बेगम नूरजहां के हाथ में थी। जहांगीर के शासनकाल में बनारसी दास जैन द्वारा रचित ‘अर्द्धकथानक’ जिसे हिंदी भाषा की पहली आत्मकथा माना जाता है, में भी जलमार्ग का उल्लेख है।

मदनमोहन मंदिर भी है साक्षी
बताया जाता है कि 16वीं सदी के दौरान वृंदावन में यमुना के जलमार्ग पर मुल्तान (अब पाकिस्तान में) के नमक व्यापारी रामदास कपूर की नौका यमुना की भंवर में फंस गई। संकट की इस घड़ी में व्यापारी ने द्वादिशादित्य टीले पर सनातन गोस्वामी के सेव्य विग्रह मदनमोहनजी से प्रार्थना की।


मान्यता है कि उनका संकट दूर हुआ और उन्होंने वृंदावन में भव्य मदनमोहन मंदिर का निर्माण कराया। यह वर्तमान में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की धरोहर है। वहीं ब्रिटिश शासनकाल में 1796 ईस्वी में यूरोपियन चित्रकार थामस डेनियल और उनके भतीजे विलियम डेनियल ने अपनी दिल्ली से आगरा तक की जलयात्रा के दौरान वृंदावन में रुक कर मदन मोहन मंदिर के सुंदर चित्र बनाए थे। ये चित्र आज भी लंदन के संग्रहालय में सुरक्षित हैं।  
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