{"_id":"621913f4b72e682d4952fc5d","slug":"the-moon-and-sun-also-enjoy-the-holi-of-barsana-mathura-news-mtr5137532192","type":"story","status":"publish","title_hn":"बरसाना की होली का आनंद तो चंद्रमा व सूरज भी उठाते हैं","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बरसाना की होली का आनंद तो चंद्रमा व सूरज भी उठाते हैं
विज्ञापन
बरसाना (मथुरा)। बरसाना की विश्व विख्यात लठामार होली ब्रज में निराली है। इस होली में जब श्रीजी की सखियों की प्रेमपगी लाठियां कान्हा के सखाओं पर बरसती हैं तो द्वापर की लीलाएं जीवंत हो उठती हैं। इस होली लीला को देखने के लिए देश और दुनिया के लोग लालायित रहते हैं। होली के दिन सूरज अस्त होने को होता है तो चंद्रमा का उदय होता है।
रामभरोसी गोस्वामी मुखिया बताते हैं कि होली के इस आयोजन के दौरान दिन ढलने से पहले सूर्य देवता अपने अस्त होने के समय को भूलकर गति को एकाग्र कर लेते हैं। चंद्रमा भी होली के इस आनंद की अनुभूति करने के लिए समय से पूर्व उदय हो जाते हैं। चंद्र और सूर्य आमने-सामने होकर द्वापरकालीन लठामार होली लीला का आनंद उठाते हैं। लक्ष्मण प्रसाद पांडेय का कहना है कि बरसाने में लठामार होली की परंपरा करीब पांच हजार वर्ष पुरानी है।
इस लठामार होली को रंगीली होली भी कहते हैं। द्वापरयुग में जब कान्हा नंदगांव से अपने सखाओं के साथ होली खेलने बरसाना आए तो राधाजी की सखियों ने घेरकर रंग बरसाया तो कान्हा के सखाओं ने हास परिहास के साथ सखियों के साथ प्रेमपूर्ण शरारत ठिठोली करना शुरू किया। अब ब्रज गोपी हुरियारिन के रूप में सजधजकर प्रेमपगी लाठियां बरसाती हैं।
विज्ञापन
इस दौरान हुरियारिनों की लाठियों से बचने के लिए ग्वालों पर ढाल होती है। नंदगांव के हुरियारे उन्हें छेड़ते देख घूंघट काढ़े बरसाने हुरियारिनें सकुचाती-मुस्काती हुई कभी रंगीली गली तो कभी फुलगली में घेर घेर कर प्रेमपगी लाठियां बरसाती हैं। (संवाद)
अनोखी है बरसाने की लड्डुओं की होली
महेश गौड़ ने बताया कि बरसाना की लठामार होली से पूर्व श्रीजी के निज महल से गोपाल सखी के नेतृत्व में सखियां कमोरी (मिट्टी की मटकी) में अमनियां भोग दो पान वीरी, इत्र फोहा, खीरसा प्रसाद, पुष्प मालाएं के निमंत्रण रूपी अबीर, गुलाल लेकर नंदभवन पहुंचती हैं। निमंत्रण रूपी गुलाल आदि को नंदभवन में आयोजित समाज में वितरित कर मंदिर में फाग आमंत्रण महोत्सव मनाया जाता है।
महोत्सव में सखाओं के साथ बरसाने की सखियां ब्रज की होली के रसियाओं की धूम पर नंदभवन में लोकनृत्य करते हैं। इसके बाद सखियों को बड़े आदर सत्कार के साथ बरसाने के लिए विदा किया जाता है। जब सखियां श्रीजी के निज महल में होली निमंत्रण को स्वीकार करने बात सुनाती हैं तो माहौल में रंगत आ जाती है और खुशी में महल में पांडे लीला होती है। इसके बाद होली में मिठास घोलने के लिए लठामार होली से एक दिन पूर्व फाल्गुन शुक्ल की अष्टमी को विश्व विख्यात श्री राधारानी मंदिर में सेवायत गोस्वामी समाज एवं श्रद्धालु एक-दूसरे में लड्डू मारकर लड्डू से होली खेलते हैं।
ब्रज में बरसाना की होली नारी सशक्तीकरण का प्रतीक
इंदु गौड़ का कहना है कि नारी सशक्तीकरण का संदेश श्रीराधारानी की भूमि सदियों से देश और दुनिया को देती आ रही है। यहां लठामार होली में ब्रजनारियां अपने हाथों में लाठियां थाम कर अबला से सबला होने का प्रदर्शन करती हैं। करीब पांच सौ वर्ष पूर्व मुस्लिम शासकों का सामना करने के लिए ब्रजबालाओं ने आत्मरक्षा के लिए ब्रजाचार्य नारायन भट्ट ने लाठी उठाने को कहा था। लठामार होली के बहाने महिलाओं ने कृष्णकालीन हथियार (लाठी) उठाकर अपने सम्मान की रक्षा की तैयारियां शुरू कर दीं। नारायण भट्ट की प्रेरणा से ब्रजनारियों ने हाथों में लाठियां तो उठा लीं और द्वापर की विलुप्त हो चुकी राधाकृष्ण की लठामार होली को जीवंत कर किया।
विज्ञापन
रामभरोसी गोस्वामी मुखिया बताते हैं कि होली के इस आयोजन के दौरान दिन ढलने से पहले सूर्य देवता अपने अस्त होने के समय को भूलकर गति को एकाग्र कर लेते हैं। चंद्रमा भी होली के इस आनंद की अनुभूति करने के लिए समय से पूर्व उदय हो जाते हैं। चंद्र और सूर्य आमने-सामने होकर द्वापरकालीन लठामार होली लीला का आनंद उठाते हैं। लक्ष्मण प्रसाद पांडेय का कहना है कि बरसाने में लठामार होली की परंपरा करीब पांच हजार वर्ष पुरानी है।
विज्ञापन
इस लठामार होली को रंगीली होली भी कहते हैं। द्वापरयुग में जब कान्हा नंदगांव से अपने सखाओं के साथ होली खेलने बरसाना आए तो राधाजी की सखियों ने घेरकर रंग बरसाया तो कान्हा के सखाओं ने हास परिहास के साथ सखियों के साथ प्रेमपूर्ण शरारत ठिठोली करना शुरू किया। अब ब्रज गोपी हुरियारिन के रूप में सजधजकर प्रेमपगी लाठियां बरसाती हैं।
विज्ञापन
इस दौरान हुरियारिनों की लाठियों से बचने के लिए ग्वालों पर ढाल होती है। नंदगांव के हुरियारे उन्हें छेड़ते देख घूंघट काढ़े बरसाने हुरियारिनें सकुचाती-मुस्काती हुई कभी रंगीली गली तो कभी फुलगली में घेर घेर कर प्रेमपगी लाठियां बरसाती हैं। (संवाद)
अनोखी है बरसाने की लड्डुओं की होली
महेश गौड़ ने बताया कि बरसाना की लठामार होली से पूर्व श्रीजी के निज महल से गोपाल सखी के नेतृत्व में सखियां कमोरी (मिट्टी की मटकी) में अमनियां भोग दो पान वीरी, इत्र फोहा, खीरसा प्रसाद, पुष्प मालाएं के निमंत्रण रूपी अबीर, गुलाल लेकर नंदभवन पहुंचती हैं। निमंत्रण रूपी गुलाल आदि को नंदभवन में आयोजित समाज में वितरित कर मंदिर में फाग आमंत्रण महोत्सव मनाया जाता है।
महोत्सव में सखाओं के साथ बरसाने की सखियां ब्रज की होली के रसियाओं की धूम पर नंदभवन में लोकनृत्य करते हैं। इसके बाद सखियों को बड़े आदर सत्कार के साथ बरसाने के लिए विदा किया जाता है। जब सखियां श्रीजी के निज महल में होली निमंत्रण को स्वीकार करने बात सुनाती हैं तो माहौल में रंगत आ जाती है और खुशी में महल में पांडे लीला होती है। इसके बाद होली में मिठास घोलने के लिए लठामार होली से एक दिन पूर्व फाल्गुन शुक्ल की अष्टमी को विश्व विख्यात श्री राधारानी मंदिर में सेवायत गोस्वामी समाज एवं श्रद्धालु एक-दूसरे में लड्डू मारकर लड्डू से होली खेलते हैं।
ब्रज में बरसाना की होली नारी सशक्तीकरण का प्रतीक
इंदु गौड़ का कहना है कि नारी सशक्तीकरण का संदेश श्रीराधारानी की भूमि सदियों से देश और दुनिया को देती आ रही है। यहां लठामार होली में ब्रजनारियां अपने हाथों में लाठियां थाम कर अबला से सबला होने का प्रदर्शन करती हैं। करीब पांच सौ वर्ष पूर्व मुस्लिम शासकों का सामना करने के लिए ब्रजबालाओं ने आत्मरक्षा के लिए ब्रजाचार्य नारायन भट्ट ने लाठी उठाने को कहा था। लठामार होली के बहाने महिलाओं ने कृष्णकालीन हथियार (लाठी) उठाकर अपने सम्मान की रक्षा की तैयारियां शुरू कर दीं। नारायण भट्ट की प्रेरणा से ब्रजनारियों ने हाथों में लाठियां तो उठा लीं और द्वापर की विलुप्त हो चुकी राधाकृष्ण की लठामार होली को जीवंत कर किया।