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श्रीकृष्ण जन्मस्थान: जन्मभूमि मंदिर को दादा ने बनाया और अब पौत्र बना रहे अयोध्या में श्रीराम मंदिर
Fri, 01 Sep 2023 02:05 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
Updated Fri, 01 Sep 2023 02:05 PM IST
सार
प्रभाकर सोमपुरा द्वारा इसकी डिजाइन नागर शैली में तैयार करने का उल्लेख है। नागर शैली उत्तर भारतीय हिंदू स्थापत्य कला की तीन प्रमुख शैलियों में एक है।
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श्रीकृष्ण जन्मभूमि पर की गई भव्य सजावट
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
जन-जन के आराध्य श्रीकृष्ण की जन्मस्थली पर अगले सप्ताह जन्माष्टमी पर लाखों भक्त जुटेंगे, जो नागर शैली में बने इस मंदिर की भव्यता को निहार कर आश्चर्यचकित हो जाएंगे। 1983 से भक्तों को मोहित कर रहे इस मंदिर का डिजाइन राजस्थान के प्रभाकर सोमपुरा द्वारा तैयार किया गया था। प्रभाकर सोमपुरा के पौत्र वर्तमान में अयोध्या के श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर बना रहे हैं। खास बात यह है कि उन्होंने अपने दादा द्वारा बनाए श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर की स्थापत्य कला को बारीकी से देखने के बाद श्रीराम जन्मभूमि के डिजाइन को अंतिम रूप दिया।
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श्रीकृष्ण जन्मभूमि के जनसंपर्क अधिकारी विजय बहादुर सिंह बताते हैं कि श्रीकृष्ण स्मारिका में इस मंदिर की बनावट का उल्लेख है। प्रभाकर सोमपुरा द्वारा इसकी डिजाइन नागर शैली में तैयार करने का उल्लेख है। नागर शैली उत्तर भारतीय हिंदू स्थापत्य कला की तीन प्रमुख शैलियों में एक है। वास्तुशास्त्र के अनुसार नागर शैली के मंदिरों की पहचान आधार से लेकर सर्वोच्च अंश तक चतुष्कोण होना बताया जाता है। नागर शैली की दो बड़ी विशेषताएं हैं, इसकी विशिष्ट योजना और विमान। इसकी मुख्य भूमि आयताकार होती है, जिसमें बीच के दोनों ओर क्रमिक विमान होते हैं जिनके चलते इसका पूर्ण आकार तिकोना हो जाता है। मंदिर के सबसे ऊपर शिखर होता है, जिसे रेखा शिखर भी कहते हैं। मंदिर में दो भवन भी होते हैं, एक गर्भगृह और दूसरा मंडप, मंडप श्रीकृष्ण जन्मभूमि में भागवत भवन के रूप में जाना जाता है। नागर शैली के अनुसार गर्भगृह ऊंचा होता है और मंडप छोटा होता है। गर्भगृह के ऊपर एक घंटाकार संरचना होती है ,जिससे मंदिर की ऊंचाई बढ़ जाती है, जो कि श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर पर साफ देखने को मिलती है। खास बात यह है कि इन मंदिरों में लोहे और सीमेंट का इस्तेमाल नहीं होता है। जन्मभूमि के निर्माण में भी राजस्थान के पत्थरों का इस्तेमाल किया गया।
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चार बार तोड़ा गया आराध्य का मंदिर
श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि मथुरा में कटरा केशव देव स्थान पर आज श्रीकृष्ण जन्मस्थान है, वहां पांच हजार साल पहले राजा कंस का कारागार हुआ करता था। इसी कारागार में रोहिणी नक्षत्र में आधी रात को भगवान कृष्ण ने जन्म लिया था। इतिहासकार डॉ. वासुदेव शरण अग्रवाल ने विभिन्न अध्ययनों और साक्ष्यों के आधार पर कटरा केशवदेव को जन्मभूमि माना। जनमान्यता के अनुसार, कारागार के पास सबसे पहले भगवान कृष्ण के प्रपौत्र बज्रनाभ ने अपने कुलदेवता की स्मृति में एक मंदिर बनवाया था। इतिहासकारों के अनुसार, सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य द्वारा इसका जीर्णोद्धार कराया गया। इस भव्य मंदिर पर महमूद गजनवी ने सन् 1017 ई. में आक्रमण कर इसे लूटने के बाद तोड़ दिया था। 1150 में फिर इसे राजा विजयपाल सिंह देव ने बनवाया। 1351 में फिर फिरोजशाह तुगलक ने तोड़ दिया। इसके बाद इसे स्थानीय लोगों ने बनवाया।
1488 में इसे सिकंदर लोधी ने तोड़ दिया। इसके बाद 1618 में राजा वीर सिंह बुंदेला ने इसे फिर बनवाया, लेकिन 1670 में औरंगजेब ने इस मंदिर की भव्यता से चिढ़कर इसको तोड़ा और लूटा साथ ही ईदगाह का निर्माण कराया। श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति न्यास के अध्यक्ष महेंद्र प्रताप सिंह बताते हैं कि यहां से प्राप्त अवशेषों से पता चलता है कि इस मंदिर के चारों ओर एक ऊंचा परकोटा था। मंदिर के दक्षिण-पश्चिम कोने में एक कुआं भी बनवाया गया था। इस कुएं से पानी 60 फीट की ऊंचाई तक ले जाकर मंदिर के प्रांगण में बने फव्वारे को चलाया जाता था। इस स्थान पर कुएं और बुर्ज के अवशेष अब भी मौजूद है। 5 अप्रैल 1770 में गोवर्धन बैटल हुआ, जिसमें मराठों की जीत हुई। मराठा पेशवा के अधिकारियों ने कटरा केशव देव की जमीन को नजूल यानी सरकारी भूमि घोषित कर दिया। 1803 में ईस्ट इंडिया कंपनी ने अपना कब्जा करते हुए इस जमीन को मराठों से अपने अधीन कर 1815 में नीलामी कर दी। 13400 रुपये में बनारस के राजा पटनीमल ने इसे खरीदा। राजा पटनीमल के उत्तराधिकारियों से यह जमीन जुगलकिशोर बिड़ला ने खरीदी थी।