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Mathura News: रील ने सूने कर दिए रासलीला के पंडाल
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मनमोहन पारीक
वृंदावन। सोशल मीडिया पर रील के दौर में भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी रासलीलाओं का क्रेज कम होता जा रहा है। 500 वर्षों पूर्व शुरू हुई रासलीला में लंबे कालखंड के बाद ब्रज मंडल के लीला पंडाल सूने होने लगे हैं। रासलीला विगत वर्षों में अपने आकर्षण को खोती जा रही है। नतीजा सावन माह में कभी महिलाओं-बच्चों से भरे रहने वाले रास पंडालों की रौनक अब फीकी पड़ने लगी है। इससे नई पीढ़ी रासलीलाओं की परंपरा से अनभिज्ञ होती जा रही है।
ब्रज में रासलीला की शुरुआत बरसाना के निकट गांव करहला निंबार्क संप्रदाय के रसिक संत घमंड देवाचार्य महाराज द्वारा की गई थी। इसके बाद महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुष्टि संप्रदाय, हित हरिवंश महाप्रभु, स्वामी हरिदास तथा रामानंद संप्रदाय ने भी रासलीला को आत्मसात कर इसे आगे बढ़ाया। इन्होंने अपने रास मंचन पर मुकुट-चंद्रिका मस्तक पर धारण किए रासबिहारी युगल में ही राधाकृष्ण के दर्शन का भाव जागृत किया। रासाचार्य स्वामी फतेहकृष्ण शर्मा ने बताया कि 10 वर्ष पूर्व तक वृंदावन में लगभग 6 दर्जन से अधिक रास मंडलियां थीं। जो अब घटकर लगभग डेढ़ दर्जन के आसपास रह गई हैं। संवाद
रासाचार्यों को पहचान मिली रासाचार्य स्वामी रामस्वरूप शर्मा, स्वामी हरगोविंद शर्मा को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया तो वहीं स्वामी श्रीराम शर्मा को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ब्रज के प्रमुख रासाचार्यों में शुमार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित स्वामी फतेहकृष्ण शर्मा कहते हैं कि रास हमारे आराध्य की लीला ही नहीं यह साहित्य और संगीत से समृद्ध लोककला है। उन्होंने नई पीढ़ी में भाव की कमी, साधु-संतों और धनाढ्य वर्ग का रासलीला के प्रति अनुराग कम होने, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ़ने और सरकार की ओर से आर्थिक सहयोग न मिलना रास परंपरा के अवसान के प्रमुख कारण बताए। कहा कि सावन में भी जहां जगह-जगह रासमंडल सजते थे, अब बमुश्किल कुछ ही आश्रमों में रासलीला सिमट कर रह गई है।
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दो भागों में होती हैं लीलाएं
रास में होने वाली लीलाओं को दो भागों में विभक्त किया जाता है। पहला रास पक्ष जो श्रीकृष्ण और राधा के परस्पर प्रेम तथा सखी-सहेलियों संग उनकी नित्य लीलाओं से संबद्ध है। इसमें ब्रज के रसिकाचार्यों द्वारा रचित पदावलियों का गायन शास्त्रीय शैली में किया जाता है। वहीं दूसरा पक्ष लीला का है। इसमें माखन चोरी, कालिया मर्दन, मनिहारी, चीर हरण, कंस वध, पूतना वध सहित मान लीला, दान लीला, महारास आदि शामिल होते हैं।
ये हैं प्रमुख रास स्थल
वृंदावन में परंपरागत रास के प्रमुख स्थान हैं। इनमें चार संप्रदाय आश्रम, श्रीहित बड़ा रासमंडल, उड़िया बाबा आश्रम, हिताश्रम, स्वामी रामस्वरूप शर्मा का पंडाल, स्वामी हरगोविंद का पंडाल, हरिबोल बाबा आश्रम, रामजिवाई सत्संग भवन, सुदामा कुटी, श्रीहित छोटा रासमंडल, वनचंदजी का डोल, निंबार्क कोट, फोगला आश्रम आदि।
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वृंदावन। सोशल मीडिया पर रील के दौर में भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी रासलीलाओं का क्रेज कम होता जा रहा है। 500 वर्षों पूर्व शुरू हुई रासलीला में लंबे कालखंड के बाद ब्रज मंडल के लीला पंडाल सूने होने लगे हैं। रासलीला विगत वर्षों में अपने आकर्षण को खोती जा रही है। नतीजा सावन माह में कभी महिलाओं-बच्चों से भरे रहने वाले रास पंडालों की रौनक अब फीकी पड़ने लगी है। इससे नई पीढ़ी रासलीलाओं की परंपरा से अनभिज्ञ होती जा रही है।
ब्रज में रासलीला की शुरुआत बरसाना के निकट गांव करहला निंबार्क संप्रदाय के रसिक संत घमंड देवाचार्य महाराज द्वारा की गई थी। इसके बाद महाप्रभु वल्लभाचार्य के पुष्टि संप्रदाय, हित हरिवंश महाप्रभु, स्वामी हरिदास तथा रामानंद संप्रदाय ने भी रासलीला को आत्मसात कर इसे आगे बढ़ाया। इन्होंने अपने रास मंचन पर मुकुट-चंद्रिका मस्तक पर धारण किए रासबिहारी युगल में ही राधाकृष्ण के दर्शन का भाव जागृत किया। रासाचार्य स्वामी फतेहकृष्ण शर्मा ने बताया कि 10 वर्ष पूर्व तक वृंदावन में लगभग 6 दर्जन से अधिक रास मंडलियां थीं। जो अब घटकर लगभग डेढ़ दर्जन के आसपास रह गई हैं। संवाद
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रासाचार्यों को पहचान मिली रासाचार्य स्वामी रामस्वरूप शर्मा, स्वामी हरगोविंद शर्मा को पद्मश्री पुरस्कार से नवाजा गया तो वहीं स्वामी श्रीराम शर्मा को राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। ब्रज के प्रमुख रासाचार्यों में शुमार राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित स्वामी फतेहकृष्ण शर्मा कहते हैं कि रास हमारे आराध्य की लीला ही नहीं यह साहित्य और संगीत से समृद्ध लोककला है। उन्होंने नई पीढ़ी में भाव की कमी, साधु-संतों और धनाढ्य वर्ग का रासलीला के प्रति अनुराग कम होने, पाश्चात्य संस्कृति का प्रभाव बढ़ने और सरकार की ओर से आर्थिक सहयोग न मिलना रास परंपरा के अवसान के प्रमुख कारण बताए। कहा कि सावन में भी जहां जगह-जगह रासमंडल सजते थे, अब बमुश्किल कुछ ही आश्रमों में रासलीला सिमट कर रह गई है।
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दो भागों में होती हैं लीलाएं
रास में होने वाली लीलाओं को दो भागों में विभक्त किया जाता है। पहला रास पक्ष जो श्रीकृष्ण और राधा के परस्पर प्रेम तथा सखी-सहेलियों संग उनकी नित्य लीलाओं से संबद्ध है। इसमें ब्रज के रसिकाचार्यों द्वारा रचित पदावलियों का गायन शास्त्रीय शैली में किया जाता है। वहीं दूसरा पक्ष लीला का है। इसमें माखन चोरी, कालिया मर्दन, मनिहारी, चीर हरण, कंस वध, पूतना वध सहित मान लीला, दान लीला, महारास आदि शामिल होते हैं।
ये हैं प्रमुख रास स्थल
वृंदावन में परंपरागत रास के प्रमुख स्थान हैं। इनमें चार संप्रदाय आश्रम, श्रीहित बड़ा रासमंडल, उड़िया बाबा आश्रम, हिताश्रम, स्वामी रामस्वरूप शर्मा का पंडाल, स्वामी हरगोविंद का पंडाल, हरिबोल बाबा आश्रम, रामजिवाई सत्संग भवन, सुदामा कुटी, श्रीहित छोटा रासमंडल, वनचंदजी का डोल, निंबार्क कोट, फोगला आश्रम आदि।