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41 साल बाद अब भारतीय कहलाएगी पाकिस्तान की राधा
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पाकिस्तान से आई राधाबाई अपने परिवार के साथ।
- फोटो : MATHURA
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वृंदावन (मथुरा)। वृंदावन की कुंज गलियों में 41 बसर से रह रहीं पाकिस्तान की राधारानी अब भारतीय होने जा रही हैं। 65 बरस की राधारानी को अब कान्हा की नगरी की हो जाएंगी। उनके नागरिकता संबंधी प्रस्ताव पर राज्य सरकार ने मुहर लगा दी है, जिसे जिला प्रशासन की ओर से भेजा गया था। केंद्र की स्वीकृति मिलते ही राधा पाकिस्तान की नहीं भारत की हो जाएंगी।
वृंदावन की कांशीराम कॉलोनी में रहने वाली राधा 1979 में पाकिस्तान छोड़कर भारत आई थीं। इस दौरान उनके साथ दो माह की मासूम बेटी जनता थी। पति रमेश कुमार शर्मा यहां उनसे पहले ही आ चुके थे। श्रीबांकेबिहारी की नगरी में उनके परिवार में और भी सदस्य जुड़े, जो अब सभी शादीशुदा हैं। परिवार के लोग आज भी बूढ़ी हो चुकी राधा की नागरिकता को लेकर चिंतित हैं।
राधा की बड़ी बहन तो बगैर नागरिकता के ही दुनिया से विदा हो गईं। राधा के पति रमेश शर्मा भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करते-करते दुनिया को छोड़ गए, परंतु राधा को भारतीय नागरिकता नहीं मिल सकी। उनका बड़ा बेटा संजय ने बताया कि अब उम्मीद जगी है कि मां के लिए वीजा बढ़वाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। नए कानून के तहत उसकी मां की नागरिकता का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है।
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श्रीबांकेबिहारी की नगरी में यहां रसियन बिल्डिंग के निकट ही तीन सदस्यों का एक और परिवार है, जो पाकिस्तानी नागरिकता होने पर वीजा के सहारे रह रहा है। परिवार में शामिल जया 2004 में भारत आई थीं। उनके साथ दो बेटे आनंद और ऋषिकेश भी थे। इस परिवार के नाते-रिश्तेदार भी इसी स्थिति में हैं।
हिंदुओं के लिए नहीं है पाकिस्तान
सिंध प्रांत में रहने वालीं राधारानी 41 साल पहले का दौर सोचकर सहम जाती हैं। वे बताती हैं कि वहां बड़ी लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलने देते थे। बुर्का पहने के लिए मजबूर किया जाता था। हिंदू लड़कियों से छेड़छाड़ और उनका अपहरण करा लिया जाता था। मंदिरों में पूजा के लिए नहीं जा सकती थी। इसीलिए घर, जमीन सब कुछ वहां से छोड़कर यहां आ गए थे।
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए शरणार्थियों की रिपोर्ट शासन ने मांगी थी। इसे भेज दिया है। इसमें वृंदावन के चार लोगों के नाम शामिल हैं।
-सर्वज्ञराम मिश्र, डीएम मथुरा
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वृंदावन की कांशीराम कॉलोनी में रहने वाली राधा 1979 में पाकिस्तान छोड़कर भारत आई थीं। इस दौरान उनके साथ दो माह की मासूम बेटी जनता थी। पति रमेश कुमार शर्मा यहां उनसे पहले ही आ चुके थे। श्रीबांकेबिहारी की नगरी में उनके परिवार में और भी सदस्य जुड़े, जो अब सभी शादीशुदा हैं। परिवार के लोग आज भी बूढ़ी हो चुकी राधा की नागरिकता को लेकर चिंतित हैं।
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राधा की बड़ी बहन तो बगैर नागरिकता के ही दुनिया से विदा हो गईं। राधा के पति रमेश शर्मा भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन करते-करते दुनिया को छोड़ गए, परंतु राधा को भारतीय नागरिकता नहीं मिल सकी। उनका बड़ा बेटा संजय ने बताया कि अब उम्मीद जगी है कि मां के लिए वीजा बढ़वाने की आवश्यकता नहीं रहेगी। नए कानून के तहत उसकी मां की नागरिकता का प्रस्ताव शासन को भेजा गया है।
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श्रीबांकेबिहारी की नगरी में यहां रसियन बिल्डिंग के निकट ही तीन सदस्यों का एक और परिवार है, जो पाकिस्तानी नागरिकता होने पर वीजा के सहारे रह रहा है। परिवार में शामिल जया 2004 में भारत आई थीं। उनके साथ दो बेटे आनंद और ऋषिकेश भी थे। इस परिवार के नाते-रिश्तेदार भी इसी स्थिति में हैं।
हिंदुओं के लिए नहीं है पाकिस्तान
सिंध प्रांत में रहने वालीं राधारानी 41 साल पहले का दौर सोचकर सहम जाती हैं। वे बताती हैं कि वहां बड़ी लड़कियों को घर से बाहर नहीं निकलने देते थे। बुर्का पहने के लिए मजबूर किया जाता था। हिंदू लड़कियों से छेड़छाड़ और उनका अपहरण करा लिया जाता था। मंदिरों में पूजा के लिए नहीं जा सकती थी। इसीलिए घर, जमीन सब कुछ वहां से छोड़कर यहां आ गए थे।
पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से आए शरणार्थियों की रिपोर्ट शासन ने मांगी थी। इसे भेज दिया है। इसमें वृंदावन के चार लोगों के नाम शामिल हैं।
-सर्वज्ञराम मिश्र, डीएम मथुरा