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Mathura News: ध्वजा के इशारे पर बरसने लगती हैं तड़ातड़ लाठियां
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नंदगांव में पताका के साथ नंदगांव का हुरियारा
यतेंद्र तिवारी
नंदगांव। ब्रज की लठामार होली में ध्वजा का उतना ही महत्व है, जितना श्रीकृष्ण और राधा का। यह साधारण ध्वजा नहीं, बल्कि श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक है, जिसकी रक्षा में हुरियारे पूरी ताकत लगा देते हैं। वहीं गोपियां उसे पाने के लिए ठिठोली और प्रेम भरी गालियों का सहारा लेती हैं। इसी ध्वजा के संकेत मात्र से लाठियां चलने लगती हैं, और हुरियारे ढालों से उन्हें रोकते हैं।
होली पर ध्वजा की प्रतिष्ठा का कार्य वसंत पंचमी से आरंभ हो जाता है। मंदिरों में इसे स्थापित कर विशेष पूजा की जाती है। मांगलिक रंगों के वस्त्रों से इसे सजाया जाता है। सामान्यतः इसे ही ढांडा गाढ़ना कहा जाता है। यह ध्वजा श्रीकृष्ण का प्रतीक है। इसे लठामार होली के दिन नंदगांव के हुरियारे कान्हा से स्पर्श कराके श्रद्धा के साथ समाज गायन करते हुए बरसाना पहुंचते हैं।
बरसाना की रंगीली गली में जब हुरियारे ध्वजा लेकर प्रवेश करते हैं, तो मानो युद्ध का बिगुल बज उठता है। मगर यह युद्ध प्रेम और हंसी-ठिठोली का होता है। 16 शृंगारों से सजी गोपियां ध्वजा छीनने का प्रयास करती हैं, तो हुरियारे उसे बचाने में ताकत लगा देते हैं। यह नज़ारा देखने वालों के दिलों को आनंद और भक्ति से भर देता है।
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इस दौरान ध्वजा को न तो अपवित्र स्थान पर रखा जाता और न ही इसे जमीन तक झुकने दिया जाता है। लठामार होली के बाद इसे नंदभवन में स्थापित किया जाता है। यहां यह गिडोह के हुरंगा तक विराजमान रहती है। नंदबाबा मंदिर के सेवायत मनीष गोस्वामी बताते हैं कि लठामार होली में ध्वजा का बहुत महत्व है। जगह-जगह इसका पूजन किया जाता है। संवाद
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नंदगांव। ब्रज की लठामार होली में ध्वजा का उतना ही महत्व है, जितना श्रीकृष्ण और राधा का। यह साधारण ध्वजा नहीं, बल्कि श्रद्धा और सम्मान का प्रतीक है, जिसकी रक्षा में हुरियारे पूरी ताकत लगा देते हैं। वहीं गोपियां उसे पाने के लिए ठिठोली और प्रेम भरी गालियों का सहारा लेती हैं। इसी ध्वजा के संकेत मात्र से लाठियां चलने लगती हैं, और हुरियारे ढालों से उन्हें रोकते हैं।
होली पर ध्वजा की प्रतिष्ठा का कार्य वसंत पंचमी से आरंभ हो जाता है। मंदिरों में इसे स्थापित कर विशेष पूजा की जाती है। मांगलिक रंगों के वस्त्रों से इसे सजाया जाता है। सामान्यतः इसे ही ढांडा गाढ़ना कहा जाता है। यह ध्वजा श्रीकृष्ण का प्रतीक है। इसे लठामार होली के दिन नंदगांव के हुरियारे कान्हा से स्पर्श कराके श्रद्धा के साथ समाज गायन करते हुए बरसाना पहुंचते हैं।
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बरसाना की रंगीली गली में जब हुरियारे ध्वजा लेकर प्रवेश करते हैं, तो मानो युद्ध का बिगुल बज उठता है। मगर यह युद्ध प्रेम और हंसी-ठिठोली का होता है। 16 शृंगारों से सजी गोपियां ध्वजा छीनने का प्रयास करती हैं, तो हुरियारे उसे बचाने में ताकत लगा देते हैं। यह नज़ारा देखने वालों के दिलों को आनंद और भक्ति से भर देता है।
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इस दौरान ध्वजा को न तो अपवित्र स्थान पर रखा जाता और न ही इसे जमीन तक झुकने दिया जाता है। लठामार होली के बाद इसे नंदभवन में स्थापित किया जाता है। यहां यह गिडोह के हुरंगा तक विराजमान रहती है। नंदबाबा मंदिर के सेवायत मनीष गोस्वामी बताते हैं कि लठामार होली में ध्वजा का बहुत महत्व है। जगह-जगह इसका पूजन किया जाता है। संवाद