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मथुरा : परंपरागत होली का मंदिरों में बरस रहा आनंद
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वृंदावन (मथुरा)। ब्रज में वसंत पंचमी से होली का शुभारंभ हो गया। ठाकुर बांकेबिहारी के भक्तों को आनंद प्रदान करने के लिए होली के परंपरागत रंग में सराबोर हो गए।
मंदिर के सेवायत प्रहलाद वल्लभ गोस्वामी के अनुसार होली का शुभारंभ वसंत पंचमी से हो जाता है और नित्यप्रति ठाकुरजी के समक्ष फाग के पदों का गायन किया जाता है। श्रद्धालुओं में फाग महोत्सव को लेकर खासा उत्साह रहता है। वहीं वसंत पंचमी पर ठाकुरजी के प्रसादी गुलाल का स्पर्श प्राप्त करने के लिए भक्त समुदाय लालायित रहता है। इधर, ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा ने बताया कि वसंत पंचमी के दिन होली का डाढ़ा (खूंटा) गढ़ जाता है।
विश्वविख्यात ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में प्रसाद स्वरूप अबीर-गुलाल भक्तों और दर्शनार्थियों के ऊपर उड़ाया जाता है। वृंदावन के मंदिरों में वसंत की समाज भी अद्भुत होती है वाणी साहित्य में श्यामा-श्याम के बसंत खेल का वर्णन प्रचुर मात्रा में किया गया है। इन पदों का गायन ठाकुरजी के समक्ष पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ किया जाता है। ब्रज में वसंत गायन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है।
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रसिक उपासना का केंद्र रहे वृंदावन में वसंत लीला को निकुंज लीला से जोड़कर भी देखा जाता है। हरित्रयी के नाम से विख्यात रसिक संत स्वामी श्री हरिदास जी, श्री हरिराम व्यास जी एवं श्री हित हरिवंश जी ने अपने रचित पदों में वसंत का भरपूर गान किया है। वृंदावन की देवालयी परंपरा में आज भी वसंत के इन पदों का गान किया जाता है। ब्रज में वसंत पूजन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।
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मंदिर के सेवायत प्रहलाद वल्लभ गोस्वामी के अनुसार होली का शुभारंभ वसंत पंचमी से हो जाता है और नित्यप्रति ठाकुरजी के समक्ष फाग के पदों का गायन किया जाता है। श्रद्धालुओं में फाग महोत्सव को लेकर खासा उत्साह रहता है। वहीं वसंत पंचमी पर ठाकुरजी के प्रसादी गुलाल का स्पर्श प्राप्त करने के लिए भक्त समुदाय लालायित रहता है। इधर, ब्रज संस्कृति शोध संस्थान के प्रकाशन अधिकारी गोपाल शरण शर्मा ने बताया कि वसंत पंचमी के दिन होली का डाढ़ा (खूंटा) गढ़ जाता है।
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विश्वविख्यात ठाकुर बांकेबिहारी मंदिर में प्रसाद स्वरूप अबीर-गुलाल भक्तों और दर्शनार्थियों के ऊपर उड़ाया जाता है। वृंदावन के मंदिरों में वसंत की समाज भी अद्भुत होती है वाणी साहित्य में श्यामा-श्याम के बसंत खेल का वर्णन प्रचुर मात्रा में किया गया है। इन पदों का गायन ठाकुरजी के समक्ष पारंपरिक वाद्य यंत्रों के साथ किया जाता है। ब्रज में वसंत गायन की एक सुदीर्घ परंपरा रही है।
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रसिक उपासना का केंद्र रहे वृंदावन में वसंत लीला को निकुंज लीला से जोड़कर भी देखा जाता है। हरित्रयी के नाम से विख्यात रसिक संत स्वामी श्री हरिदास जी, श्री हरिराम व्यास जी एवं श्री हित हरिवंश जी ने अपने रचित पदों में वसंत का भरपूर गान किया है। वृंदावन की देवालयी परंपरा में आज भी वसंत के इन पदों का गान किया जाता है। ब्रज में वसंत पूजन की परंपरा अत्यंत प्राचीन है।