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कुषाणकाल में पल्लवित हुई मथुरा कला:नगरकर
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वृंदावन। ब्रज संस्कृति शोध संस्थान, गोदा विहार के तत्वावधान में ‘मथुरा कला’ विषयक त्रिदिवसीय ऑनलाइन कार्यशाला के द्वितीय दिन मथुरा कला में कुषाण काल के योगदान पर चर्चा की गई। स्नेहा नगरकर ने अपनी बात रखते हुए कहा कि स्तूप और वेदिका का विकास मथुरा में स्वतंत्र रूप से हुआ।
कुषाणकालीन स्तूप पर भी इसकी स्वतंत्रता का प्रभाव देखा जा सकता है। शालभंजिका के विषय में बताते हुए उन्होंने कहा कि कुषाणकाल में वेदिका स्तंभों पर शालभंजिकाओं का अंकन किया गया है। मथुरा कला में शालभंजिका विभिन्न मुद्राओं में पाई जाती है। स्नेहा ने कहा कि मथुरा के भक्तिधर्म ने वैष्णव मूर्ति, बुद्ध मूर्ति एवं जैन मूर्ति को जन्म दिया।
हालांकि इन तीनों के तत्व अलग-अलग थे, लेकिन ये थे मथुरा के ही। संस्थान सचिव लक्ष्मीनारायण तिवारी, डॉ. दीनबंधु पांडेय, राजेश सेन, स्वाति गोयल, वर्षा तिवारी आचार्य, गोपाल शरण शर्मा, मानव मेहरा, राखी चौहान, हितांगी ब्रह्मभट्ट, योगेंद्र सिंह छौंकर, शैरिल शर्मा, कनिका उपस्थित थे। संयोजन सुरभि पांडेय एवं संचालन परिधि डेविड मैसी एवं अमनदीप वशिष्ठ ने संयुक्त रूप से किया।
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कुषाणकालीन स्तूप पर भी इसकी स्वतंत्रता का प्रभाव देखा जा सकता है। शालभंजिका के विषय में बताते हुए उन्होंने कहा कि कुषाणकाल में वेदिका स्तंभों पर शालभंजिकाओं का अंकन किया गया है। मथुरा कला में शालभंजिका विभिन्न मुद्राओं में पाई जाती है। स्नेहा ने कहा कि मथुरा के भक्तिधर्म ने वैष्णव मूर्ति, बुद्ध मूर्ति एवं जैन मूर्ति को जन्म दिया।
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हालांकि इन तीनों के तत्व अलग-अलग थे, लेकिन ये थे मथुरा के ही। संस्थान सचिव लक्ष्मीनारायण तिवारी, डॉ. दीनबंधु पांडेय, राजेश सेन, स्वाति गोयल, वर्षा तिवारी आचार्य, गोपाल शरण शर्मा, मानव मेहरा, राखी चौहान, हितांगी ब्रह्मभट्ट, योगेंद्र सिंह छौंकर, शैरिल शर्मा, कनिका उपस्थित थे। संयोजन सुरभि पांडेय एवं संचालन परिधि डेविड मैसी एवं अमनदीप वशिष्ठ ने संयुक्त रूप से किया।
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