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एल्फा कंपनी के ‘शेर’ थे मथुरा के बबलू
ब्यूरो,अमर उजाला मथुरा
Updated Mon, 01 Aug 2016 12:10 AM IST
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बबलू सिंह
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एलओसी पर आतंकियों से मुठभेड़ में शहीद हुए बबलू जाट रेजीमेंट की एल्फा कंपनी के ‘शेर’ थे। हर बड़े आपरेशन में उनकी हिस्सेदारी होती थी। जून, 2005 में जाट रेजीमेंट को ज्वाइन करने वाले बबलू ने कई दफा आतंकियों से लोहा लिया। घुसपैठ की कोशिश करने वाले दहशतगर्दों को भागने के लिए मजबूर कर दिया। जब भी गांव में आते, नौजवानों से कहते कि तैयारी करो और सेना में जाओ। वरदी पहनकर तो देखो सीना चौड़ा हो जाता है।
बबलू वर्ष 2014 से जम्मू कश्मीर में तैनात थे। मथुरा के गांव झंडीपुर निवासी इस योद्धा की कंपनी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के नौगाम सेक्टर में देश की सीमा की रखवाली कर रही है। अभी 23 जून को बबलू हफ्ते भर की छुट्टी काटकर अपनी ड्यूटी पर गए थे। परिवार वालों का कहना है कि जब वह घर पर आते थे तब जम्मू के हालात के बारे में चर्चा किया करते। किस तरह से आतंकियों के खिलाफ आपरेशन चलता है और कैसे निगरानी होती है।
बबलू के छोटे भाई सोनू का कहना है कि जब भी छुट्टी पर गांव आते, लड़कों से कहते थे कि पढ़ाई पूरी करके सेना में जाओ। सेना की वरदी पहनते ही सीना फख्र से चौड़ा हो जाता है। नौजवानों को खेलकूद के प्रति भी प्रेरित किया करते थे। क्योंकि वो खुद एक अच्छे खिलाड़ी थे। बबलू की ही कंपनी में तैनात बालाजीपुरम निवासी महेश चंद्र कहते हैं कि वह एक जांबाज सैनिक थे। हमेशा दूसरों का हौसला बढ़ाते। जब भी कोई आपरेशन शुरू होता तो पूरे जोश के साथ उसमें हिस्सा लेते थे।
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आपरेशन शुरू हो रहा है, मैं जा रहा हूं
बबलू से उनकी पत्नी और परिवार वालों की तीन जुलाई की रात को अंतिम बार बात हुई थी। भाई सोनू ने बताया कि जिस वक्त जम्मू में उनकी कंपनी आपरेशन के लिए निकल रही थी तभी उनका फोन आया था। कहा था कि वह विशेष अभियान के लिए जा रहे हैं। मोबाइल जमा हो जाएगा। लिहाजा कल ही बात हो सकेगी। लेकिन कौन जानता था कि वह अंतिम बार बात कर रहे हैं। उसके बाद घर वालों से बात ही नहीं हो पाई। इधर से परिवार वाले फोन लगाने की कोशिश करते रहे मगर फोन नहीं लगा।
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बबलू वर्ष 2014 से जम्मू कश्मीर में तैनात थे। मथुरा के गांव झंडीपुर निवासी इस योद्धा की कंपनी जम्मू-कश्मीर के कुपवाड़ा जिले के नौगाम सेक्टर में देश की सीमा की रखवाली कर रही है। अभी 23 जून को बबलू हफ्ते भर की छुट्टी काटकर अपनी ड्यूटी पर गए थे। परिवार वालों का कहना है कि जब वह घर पर आते थे तब जम्मू के हालात के बारे में चर्चा किया करते। किस तरह से आतंकियों के खिलाफ आपरेशन चलता है और कैसे निगरानी होती है।
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बबलू के छोटे भाई सोनू का कहना है कि जब भी छुट्टी पर गांव आते, लड़कों से कहते थे कि पढ़ाई पूरी करके सेना में जाओ। सेना की वरदी पहनते ही सीना फख्र से चौड़ा हो जाता है। नौजवानों को खेलकूद के प्रति भी प्रेरित किया करते थे। क्योंकि वो खुद एक अच्छे खिलाड़ी थे। बबलू की ही कंपनी में तैनात बालाजीपुरम निवासी महेश चंद्र कहते हैं कि वह एक जांबाज सैनिक थे। हमेशा दूसरों का हौसला बढ़ाते। जब भी कोई आपरेशन शुरू होता तो पूरे जोश के साथ उसमें हिस्सा लेते थे।
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बबलू से उनकी पत्नी और परिवार वालों की तीन जुलाई की रात को अंतिम बार बात हुई थी। भाई सोनू ने बताया कि जिस वक्त जम्मू में उनकी कंपनी आपरेशन के लिए निकल रही थी तभी उनका फोन आया था। कहा था कि वह विशेष अभियान के लिए जा रहे हैं। मोबाइल जमा हो जाएगा। लिहाजा कल ही बात हो सकेगी। लेकिन कौन जानता था कि वह अंतिम बार बात कर रहे हैं। उसके बाद घर वालों से बात ही नहीं हो पाई। इधर से परिवार वाले फोन लगाने की कोशिश करते रहे मगर फोन नहीं लगा।