फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Mathura News ›   Last rites of Padma Shri Sant Ramesh Baba performed in Mathura

पंचतत्व में विलीन संत रमेश बाबा: माताजी गोशाला में विदाई के लिए उमड़ा जनसमूह, श्रद्धालुओं की नम हो गईं आंखें

Wed, 07 Oct 2026 09:22 PM IST
Arun Parashar संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा
संवाद न्यूज एजेंसी, मथुरा Published by: Arun Parashar Updated Wed, 07 Oct 2026 09:22 PM IST
सार

पद्मश्री संत रमेश बाबा की अंतिम यात्रा गहवरवन से निकली तो लगा जैसे पूरा ब्रज अपने किसी आत्मीय को विदा करने उमड़ पड़ा हो। जिस ब्रज की धूल को उन्होंने माथे का चंदन माना, उसी धूल में उनकी देह आखिरकार पंचतत्व में विलीन हो गई।

विज्ञापन
Last rites of Padma Shri Sant Ramesh Baba performed in Mathura
संत रमेश बाबा का फाइल फोटो और अंतिम विदाई देने उमड़ी भीड़। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

पद्मश्री संत रमेश बाबा को बुधवार को नम आंखों से अंतिम विदाई दी गई। माताजी गोशाला में संतों, अनुयायियों और हजारों ब्रजवासियों की मौजूदगी में राज बाबा ने रमेश बाबा को मुखाग्नि दी। इस दौरान वहां मौजूद श्रद्धालुओं की आंखें छलक उठीं।
विज्ञापन


बुधवार को गहवरवन स्थित रस मंडप से रमेश बाबा की अंतिम यात्रा शुरू हुई। अंतिम डोले को फूलों से सजाया गया था। जैसे ही डोला गहवरवन से बाहर निकला, मार्ग के दोनों ओर बड़ी संख्या में ब्रजवासी और श्रद्धालु हाथ जोड़े खड़े नजर आए। बाबा के अंतिम दर्शन के लिए लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। हर किसी की आंखें नम थीं। अंतिम डोला ब्रह्माचल की परिक्रमा के लिए निकला तो रास्ते में किसी के हाथ में फूल थे तो कोई माला लेकर खड़ा था। डोला सामने आते ही श्रद्धालुओं ने भावुक होकर संत को पुष्प अर्पित किए। डोला माताजी गोशाला पहुंचा। यहां बाबा को मुखाग्नि दी गई। रमेश बाबा ने मान मंदिर को साधना स्थली बना गोसेवा की। उन्हें वर्ष 2019 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया था।
विज्ञापन


ब्रज की धूल माथे से लगाई, उसी धूल में मिल गए बाबा
संत रमेश बाबा की अंतिम यात्रा गहवरवन से निकली तो लगा जैसे पूरा ब्रज अपनेकिसी आत्मीय को विदा करने उमड़ पड़ा हो। जिस ब्रज की धूल को उन्होंने माथे का चंदन माना, उसी धूल में उनकी देह आखिरकार पंचतत्व में विलीन हो गई। वर्ष 1938 में तीर्थराज प्रयाग में जन्मे रमेश बाबा के पिता बलदेव प्रसाद शुक्ल विख्यात ज्योतिषाचार्य थे और माता हेमेश्वरी देवी गृहिणीं थीं। बचपन से ही उनके भीतर आध्यात्मिक चेतना थी। गृहस्थ जीवन से विरक्त होकर ब्रज पहुंचे रमेश बाबा ने बरसाना के ब्रह्माचल पर्वत स्थित मान मंदिर को अपनी साधना स्थली बना लिया। यहीं से उनकी छह दशक लंबी ब्रज सेवा यात्रा शुरू हुई। गहवरवन के संरक्षण से लेकर ब्रज की पहाड़ियों को खनन से बचाने तक उन्होंने आवाज उठाई। प्राचीन कुंडों और सरोवरों के जीर्णोद्धार के प्रयास किए। यमुना की स्थिति को लेकर जनजागरण किया। वर्ष 2007 में दो गोवंश के साथ माताजी गोशाला की शुरुआत हुई। आज यहां हजारों गोवंश का संरक्षण हो रहा है। बुधवार को उनकी अंतिम यात्रा भी इसी गोशाला तक पहुंची। 
विज्ञापन
विज्ञापन


 
Trending Videos

Last rites of Padma Shri Sant Ramesh Baba performed in Mathura
संत रमेश बाबा का अंतिम संस्कार। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
अंतिम संस्कार में दी श्रद्धांजलि
पद्मश्री रमेश बाबा के अंतिम संस्कार में संत समाज, जनप्रतिनिधि, पर्यावरणविद और उनके अनुयायी शामिल हुए। रमेश बाबा को अंतिम विदाई देने के लिए कैबिनेट मंत्री चौधरी लक्ष्मीनारायण भी पहुंचे। जिलाधिकारी और वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की। गहवरवन बचाओ आंदोलन के संस्थापक एवं माने पर्यावरणविद् बंशीधर अग्रवाल ने भी बाबा को अंतिम प्रणाम किया। अंतिम संस्कार में गीता मनीषी स्वामी ज्ञानानंद, विपिन बिहारी दास, कोटवन के मौनी बाबा, मलूक पीठ के डॉक्टर राजेंद्र दास बाबा, विनोद बाबा, पंडित बाबा, प्रेम सरोवर के रामरज दास महाराज, गिरधर गोपाल बाबा सहित अनेक संत-महंत मौजूद रहे। भजन गायक चित्र-विचित्र और साध्वी पूर्णिमा ने भी पहुंचकर श्रद्धांजलि अर्पित की। रंगीली महल की ओर से अजय त्रिपाठी और नितिन गुप्ता तथा पूर्व जेल विजिटर लक्ष्म प्रसाद शर्मा ने भी श्रद्धांजलि दी। संवाद

सीएम योगी, केशव मौर्य और प्रियंका चतुर्वेदी ने जताया शोक
मानगढ़ की मिट्टी में आज केवल एक संत की देह पंचतत्व में विलीन नहीं हुई, बल्कि हजारों भक्तों का सहारा भी छिन गया। अंतिम विदाई के बाद लौटती साध्वियों की आंखों में आंसू और कंठ में बाबा के बिछोह का दर्द था। गहवर वन और मानगढ़ की कुंजों में अब भी भजन गूंजेंगे, राधारानी का नाम लिया जाएगा, रस मंडप में नृत्य भी होगा लेकिन बाबा का आशीर्वाद देने वाली वह उपस्थिति नहीं होगी।

भव्य मंदिर का सपना अधूरा रह गया
मानगढ़ की जिस छोटी सी गुफा में रमेश बाबा ने वर्षों तक साधना की, उसी तपोभूमि पर उनके जीवन का एक बड़ा सपना आकार ले रहा था। मान बिहारी लाल के भव्य मंदिर का निर्माण शुरू हुआ तो बाबा की आंखों के सामने पत्थर जुड़ने लगे और उनकी साधना भूमि नया स्वरूप लेने लगी। मगर मंदिर पूर्ण होने से पहले ही बाबा ब्रह्मलीन हो गए। बाबा के लिए यह केवल मंदिर निर्माण नहीं था, बल्कि उनकी साधना यात्रा का विस्तार था। जिस गुफा में रहकर उन्होंने राधारानी की भक्ति में अपना जीवन समर्पित किया, उसी स्थान पर भव्य मंदिर में मान बिहारी लाल को विराजमान कराने का संकल्प उनके हृदय के बेहद करीब था। मंदिर का निर्माण भी अनूठे तरीके से किया जा रहा है। पत्थर की गेंदों पर मंदिर को खड़ा करने की योजना है। बजरी और सीमेंट के बजाय पाषाण से निर्माण किया जा रहा है। गर्भगृह के लिए सफेद संगमरमर और पत्थरों को जोड़ने के लिए पाषाण पिन का इस्तेमाल हो रहा है।

 

रमेश बाबा की साधना से 30 हजार गांवों तक पहुंचा ‘राधे-राधे’ का नाम
मानगढ़ की तपोभूमि से उठी राधा नाम संकीर्तन की वह ध्वनि, जिसे पद्मश्री रमेश बाबा ने अपना जीवन समर्पित किया, आज हजारों गांवों तक पहुंच चुकी है। मान मंदिर सेवा संस्थान से जुड़े सूत्रों के अनुसार करीब 30 हजार गांवों में 35 हजार से अधिक भगवान नाम प्रभात फेरियां शुरू हो चुकी हैं। गांवों की सुबह ‘राधे-राधे’ के जयघोष से हो, यही रमेश बाबा के जीवन की बड़ी साधनाओं में शामिल रहा।

ब्रज की छवि खोजते बरसाना आए थे रामेश्वर
जिस ब्रज को देखने की चाह एक किशोर को प्रयाग से खींच लाई थी, उसी ब्रज की उजड़ी तस्वीर ने उसकी पूरी जिंदगी बदल दी। रामेश्वर प्रसाद शुक्ल आंखों में हरियाली और सुंदर वन की छवि लेकर बरसाना पहुंचे थे। सामने गहवरवन की सिमटती हरियाली और प्रकृति की पीड़ा थी। वह दृश्य आंखों से नहीं, सीधे मन में उतर गया। परिवार उन्हें वापस ले गया, मगर रामेश्वर का मन बरसाना में ही रह गया। वह फिर लौटे और इस बार लौटने वाला किशोर ब्रज को देखने नहीं, ब्रज के लिए जीने आया था। गहवरवन की पहाड़ी उनकी साधना बनी और धीरे-धीरे रामेश्वर का अपना जीवन पीछे छूटता गया। ब्रज ही उनका घर बना, ब्रज ही साधना और ब्रज की सेवा ही जीवन। यहीं से शुरू हुई रामेश्वर से रमेश बाबा बनने की यात्रा।

जब 22 हजार ब्रजयात्रियों के कदमों से हिल गई थी सरकार
ब्रज के पर्वत केवल पत्थरों की पहाड़ियां नहीं हैं। इनसे ब्रज की धार्मिक आस्था, पौराणिक स्मृतियां और चौरासी कोस की परिक्रमा की परंपरा जुड़ी है। इन्हीं पर्वतों को खनन से बचाने के लिए करीब 19 वर्षों तक चले संघर्ष की कहानी उस संत के संकल्प की कहानी है, जिसने कभी प्रशासन के सामने तो कभी सरकार के सामने अपनी बात रखी और जरूरत पड़ी तो दिल्ली के जंतर-मंतर तक ब्रज की आवाज पहुंचाई। 11 नवंबर 2007 की सुबह कामां में अचानक माहौल बदल गया। बरसाना के संत रमेश बाबा के आह्वान पर करीब 22 हजार ब्रजयात्री एसडीएम कार्यालय की ओर महापड़ाव के लिए कूच कर गए। इतनी बड़ी संख्या में ब्रजयात्रियों के पहुंचने से स्थानीय प्रशासन से लेकर जिला प्रशासन और राज्य सरकार तक हलचल मच गई। मांग एक ही थी ब्रज चौरासी कोस परिक्रमा मार्ग में आने वाले कामां और डीग क्षेत्र के पौराणिक पर्वतों को खनन से मुक्त किया जाए। बाद में ब्रज क्षेत्र के लगभग 5,253 हेक्टेयर पहाड़ी भूभाग को आरक्षित वन क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया।


 
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed