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Mathura News: डांटें नहीं, बच्चों का उत्साहवर्धन करें
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मथुरा। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की दसवीं की परीक्षा में कम अंक लाने वाले विद्यार्थियों पर अभिभावकों को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। साथियों की तुलना में कम अंक आने के कारण वह निराश हो सकते हैं। ऐसे में उन्हें सबसे ज्यादा परिवार के मदद की आवश्यकता होती है।
जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. स्तुति सिरीन ने बताया कि सीबीएसई हाईस्कूल का परिणाम आने के बाद विद्यार्थियों के परिजन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। कम अंक लाने वाले बच्चों के अवसाद में जाने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अभिभावक अपने बच्चों की तुलना दूसरों से न करें। उन्हें नकारात्मक विचारों से प्रभावित होने के बचाना परिजन की जिम्मेदारी है। परिणाम आने के बाद परिजन खुद के इमोशन पर काबू रखें। बच्चे के साथ बैठकर गलती का आंकलन करें और उसे अच्छा करने के लिए प्रेरित करें। परिणाम को लेकर शिक्षक से फीडबैक लें, बच्चों पर आरोप न लगाएं।
डॉ. स्तुति सिरीन ने कहा कि बच्चों के साथ सामान्य व्यवहार करें। उनकी गतिविधियों पर ध्यान रखें। कम अंक आने के कारण वह चिड़चिड़े होकर कमरे में बंद हो जाता है या फिर ज्यादा सोता है तो मनोचिकित्सक की मदद से काउंसलिंग कराएं। जिस विषय में बच्चे के अच्छे नंबर आए हैं उसे ही कैरियर के रूप में विकसित करने के लिए प्रेरित करें। प्रत्येक बच्चे की क्षमता अलग होती है।
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जिला अस्पताल की मनोचिकित्सक डॉ. स्तुति सिरीन ने बताया कि सीबीएसई हाईस्कूल का परिणाम आने के बाद विद्यार्थियों के परिजन की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। कम अंक लाने वाले बच्चों के अवसाद में जाने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए अभिभावक अपने बच्चों की तुलना दूसरों से न करें। उन्हें नकारात्मक विचारों से प्रभावित होने के बचाना परिजन की जिम्मेदारी है। परिणाम आने के बाद परिजन खुद के इमोशन पर काबू रखें। बच्चे के साथ बैठकर गलती का आंकलन करें और उसे अच्छा करने के लिए प्रेरित करें। परिणाम को लेकर शिक्षक से फीडबैक लें, बच्चों पर आरोप न लगाएं।
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डॉ. स्तुति सिरीन ने कहा कि बच्चों के साथ सामान्य व्यवहार करें। उनकी गतिविधियों पर ध्यान रखें। कम अंक आने के कारण वह चिड़चिड़े होकर कमरे में बंद हो जाता है या फिर ज्यादा सोता है तो मनोचिकित्सक की मदद से काउंसलिंग कराएं। जिस विषय में बच्चे के अच्छे नंबर आए हैं उसे ही कैरियर के रूप में विकसित करने के लिए प्रेरित करें। प्रत्येक बच्चे की क्षमता अलग होती है।
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