{"_id":"5f46a70a8ebc3e4ad50e505e","slug":"cultural-mathura-news-agr4565215134","type":"story","status":"publish","title_hn":"मोहन स्वरूप भाटियाजी की खबर","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मोहन स्वरूप भाटियाजी की खबर
विज्ञापन
वृंदावन में लाला बाबू मंदिर
- फोटो : MATHURA
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मथुरा। हमारे आसपास आज भी इतिहास के ऐसे अनेक पृष्ठ हैं, जो प्रेरणा प्रदान कर किसी का हृदय और जीवन बदलने में समर्थ हैं, किंतु अब उन्हें विस्मृत किया जा रहा है। राधा-श्रीकृष्ण की जन्मभूमि होने के कारण मथुरा की महत्ता है, साथ ही इस भूमि के प्रति आकर्षित होकर देश-विदेश से यहां आने वाले अनेक लोगों ने इतिहास रचा है। ऐसी ही एक हस्ती थी, जिन्हें यहां का बच्चा-बच्चा ‘लाला बाबू’ के नाम से जानता था।
लाला बाबू का वास्तविक नाम कृष्ण चंद्र सिंह था। उनके पिता बाबू मुरली मोहन सिंह और पूर्वज हरीकृष्ण सिंह बंगाल राज्य के कांदी (मुर्शिदाबाद) निवासी थे। धनी व्यापारी परिवार में जन्मे लाला बाबू ने पहले वर्दवान और फिर उड़ीसा में अपने कार्यालय स्थापित कर अपार संपति अर्जित की। लाला बाबू जब सांसारिक सुखों और ऐश्वर्य का भोग कर रहे थे, तभी उनके जीवन में घटी घटना ने उन्हें झकझोर दिया। मात्र 30 वर्ष की अवस्था में लाला बाबू सुख-संपत्ति त्यागकर राधा-कृष्ण की लीला भूमि वृंदावन आ गए। यह घटना तब की है, जब वह गंगा तट पर टहल रहे थे। उन्होंने सुना कि एक धोबी अपनी पत्नी से कह रहा है कि दिन गेलो, वासनाय आगुन दाउ (दिन निकल गया, वासना (कपड़े धोने के लिए केले को जला कर बनाया गया क्षार) में आग लगा दे।) यह सुनते ही उन्होंने सांसारिक वासना को भस्मीभूत कर शेष जीवन ईश्वर भक्ति में समर्पित करने का निर्णय ले लिया और वृंदावन आ गए।
लाला बाबू ने ब्रजभूमि के प्राचीन महत्व के अनेकानेक धार्मिक महत्व के स्थलों को खरीदा और बताया कि इन्हें खरीदे जाने का उद्देश्य इन स्थलों का संरक्षण और साधु-संतों, मोर, बंदरों की सेवा करना है। इस क्रम में उन्होंने वर्ष 1811 में राधा की लीलास्थली बरसाना गांव को मात्र 602 रुपये में और कृष्ण की बाल लीलास्थली नंदगांव को मात्र 900 रुपये में, बरसाना व नंदगांव के बीच बसे संकेत गांव को 800 रुपये में और रासलीला के उद्गम स्थल करहला को मात्र 500 रुपये में खरीदा।
विज्ञापन
लाला बाबू ने जाव, गढ़ी, हाथिया, जैंत, महोली, नवीपुर, चामरगढ़ी, धीमरी, गुलालपुर और मथुरा-वृंदावन के कई अन्य गांव भी बहुत कम मूल्य में खरीद डाले थे। बाद में उन्होंने मथुरा जनपद में अपार संपत्ति खरीदी। ये संपत्ति इतनी अधिक थी कि धीरे-धीरे हर संपत्ति के बारे में यह कहा जाने लगा कि वह लाला बाबू की है। यही नहीं, जिस संपत्ति के वास्तविक मालिक का पता नहीं लगता था, उसे यह माना जाने लगा कि जिसका कोई मालिक नहीं, उसके मालिक लाला बाबू।
विज्ञापन
लाला बाबू का वास्तविक नाम कृष्ण चंद्र सिंह था। उनके पिता बाबू मुरली मोहन सिंह और पूर्वज हरीकृष्ण सिंह बंगाल राज्य के कांदी (मुर्शिदाबाद) निवासी थे। धनी व्यापारी परिवार में जन्मे लाला बाबू ने पहले वर्दवान और फिर उड़ीसा में अपने कार्यालय स्थापित कर अपार संपति अर्जित की। लाला बाबू जब सांसारिक सुखों और ऐश्वर्य का भोग कर रहे थे, तभी उनके जीवन में घटी घटना ने उन्हें झकझोर दिया। मात्र 30 वर्ष की अवस्था में लाला बाबू सुख-संपत्ति त्यागकर राधा-कृष्ण की लीला भूमि वृंदावन आ गए। यह घटना तब की है, जब वह गंगा तट पर टहल रहे थे। उन्होंने सुना कि एक धोबी अपनी पत्नी से कह रहा है कि दिन गेलो, वासनाय आगुन दाउ (दिन निकल गया, वासना (कपड़े धोने के लिए केले को जला कर बनाया गया क्षार) में आग लगा दे।) यह सुनते ही उन्होंने सांसारिक वासना को भस्मीभूत कर शेष जीवन ईश्वर भक्ति में समर्पित करने का निर्णय ले लिया और वृंदावन आ गए।
विज्ञापन
लाला बाबू ने ब्रजभूमि के प्राचीन महत्व के अनेकानेक धार्मिक महत्व के स्थलों को खरीदा और बताया कि इन्हें खरीदे जाने का उद्देश्य इन स्थलों का संरक्षण और साधु-संतों, मोर, बंदरों की सेवा करना है। इस क्रम में उन्होंने वर्ष 1811 में राधा की लीलास्थली बरसाना गांव को मात्र 602 रुपये में और कृष्ण की बाल लीलास्थली नंदगांव को मात्र 900 रुपये में, बरसाना व नंदगांव के बीच बसे संकेत गांव को 800 रुपये में और रासलीला के उद्गम स्थल करहला को मात्र 500 रुपये में खरीदा।
विज्ञापन
लाला बाबू ने जाव, गढ़ी, हाथिया, जैंत, महोली, नवीपुर, चामरगढ़ी, धीमरी, गुलालपुर और मथुरा-वृंदावन के कई अन्य गांव भी बहुत कम मूल्य में खरीद डाले थे। बाद में उन्होंने मथुरा जनपद में अपार संपत्ति खरीदी। ये संपत्ति इतनी अधिक थी कि धीरे-धीरे हर संपत्ति के बारे में यह कहा जाने लगा कि वह लाला बाबू की है। यही नहीं, जिस संपत्ति के वास्तविक मालिक का पता नहीं लगता था, उसे यह माना जाने लगा कि जिसका कोई मालिक नहीं, उसके मालिक लाला बाबू।