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इच्छा पूरी करने के लिए धूनी रमा कर बैठ गए भोलेनाथ
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मथुरा (नंदगांव)। कान्हा की लीला स्थली नंदगांव से भगवान भोलेनाथ का गहरा लगाव रहा है। इसी लगाव के चलते आज भी भोलेनाथ नंदगांव में विराजमान हैं। नंदबाबा द्वारा बसाई नंद नगरी में बाल कृष्ण के दर्शनों की आस (इच्छा) लेकर भगवान शंकर कैलाश पर्वत से नंदगांव पहुंचे थे। आसेश्वर नामक वन में कृष्ण के दर्शन की भगवान शंकर की इच्छा पूरी हुई थी।
महंत जयराम दास ने बताया कि मान्यता है कि द्वापर में कृष्ण जन्म के बाद सभी देवी-देवता बाल कृष्ण के दर्शनों के लिए नंदबाबा के द्वार पहुंचे थे। भगवान शंकर भी साधु का भेष रखकर कैलाश पर्वत से नंदमहल पहुंचे। इस दौरान उन्होंने यशोदा मइया से कन्हैया के दर्शनों की इच्छा प्रकट की। यशोदा ने धन, धान्य, सोना, चांदी आदि भिक्षा में लेकर जाने की बात कही, लेकिन कान्हा के दर्शन कराने से मना कर दिया। साधु वेषधारी महादेव, कान्हा के दर्शनों का प्रण लेकर नंदमहल से दूर आसेश्वर वन में जाकर धूनी रमाकर बैठ गए।
इधर, नंदमहल में विष्णु के अवतार कृष्ण जोर-जोर से रोने लगे। क्योंकि भगवान शंकर के दर्शन कान्हा को भी करने थे। काफी देर रुदन के बाद नंदमहल में आसपास की गोपियां एकत्रित हो गईं और मइया से रुदन का कारण पूछा। मइया ने साधु का सारा वृतांत सुना दिया। इसके बाद भोलेनाथ को कान्हा के दर्शनों का आश्वासन देकर वन से नंदमहल लाया गया।
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शंकर जी को देखकर बाल कृष्ण खिल खिलाकर हंस पड़े। भगवान शंकर ने जी भरकर उनके दर्शन किए। मइया यशोदा ने शंकर जी से कान्हा की नजर उतारने के लिए नंदमहल में ही रहने का निवेदन किया। आज भी भगवान शंकर मइया के निवेदन पर नंदीश्वर महादेव के रूप में नंदमहल में विराजमान हैं।
जिस वन में शंकर जी ने धूनी रमाई, वहां भी शंकर भगवान का प्राकटॺ शिवलिंग है जो आसेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है। भगवान शंकर की इच्छा इसी स्थान पर पूरी हुई थी। इसलिए इसका नाम आसेश्वर महादेव पड़ा। आज भी देश के कोने-कोने से कान्हा और शिव के भक्त यहां आकर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। मनोकामना पूरी होने पर दाल-बाटी से भंडारा करते हैं।
काफी अच्छी जगह है। यहां आकर मन को शांति मिलती है। भोलेनाथ और बालकृष्ण की लीला सुन आनंद आ गया।
- मनीषा पचौरी, अमृतसर श्रद्धालु
यहां बार-बार आने का दिल करता है। अमृतसर से ब्रज में आने पर में श्रीकृष्ण और भोलेनाथ के इस पवित्र स्थान के दर्शन जरूर करता हूं।
- रिशु मेहरा, अमृतसर श्रद्धालु
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महंत जयराम दास ने बताया कि मान्यता है कि द्वापर में कृष्ण जन्म के बाद सभी देवी-देवता बाल कृष्ण के दर्शनों के लिए नंदबाबा के द्वार पहुंचे थे। भगवान शंकर भी साधु का भेष रखकर कैलाश पर्वत से नंदमहल पहुंचे। इस दौरान उन्होंने यशोदा मइया से कन्हैया के दर्शनों की इच्छा प्रकट की। यशोदा ने धन, धान्य, सोना, चांदी आदि भिक्षा में लेकर जाने की बात कही, लेकिन कान्हा के दर्शन कराने से मना कर दिया। साधु वेषधारी महादेव, कान्हा के दर्शनों का प्रण लेकर नंदमहल से दूर आसेश्वर वन में जाकर धूनी रमाकर बैठ गए।
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इधर, नंदमहल में विष्णु के अवतार कृष्ण जोर-जोर से रोने लगे। क्योंकि भगवान शंकर के दर्शन कान्हा को भी करने थे। काफी देर रुदन के बाद नंदमहल में आसपास की गोपियां एकत्रित हो गईं और मइया से रुदन का कारण पूछा। मइया ने साधु का सारा वृतांत सुना दिया। इसके बाद भोलेनाथ को कान्हा के दर्शनों का आश्वासन देकर वन से नंदमहल लाया गया।
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शंकर जी को देखकर बाल कृष्ण खिल खिलाकर हंस पड़े। भगवान शंकर ने जी भरकर उनके दर्शन किए। मइया यशोदा ने शंकर जी से कान्हा की नजर उतारने के लिए नंदमहल में ही रहने का निवेदन किया। आज भी भगवान शंकर मइया के निवेदन पर नंदीश्वर महादेव के रूप में नंदमहल में विराजमान हैं।
जिस वन में शंकर जी ने धूनी रमाई, वहां भी शंकर भगवान का प्राकटॺ शिवलिंग है जो आसेश्वर महादेव के नाम से विख्यात है। भगवान शंकर की इच्छा इसी स्थान पर पूरी हुई थी। इसलिए इसका नाम आसेश्वर महादेव पड़ा। आज भी देश के कोने-कोने से कान्हा और शिव के भक्त यहां आकर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। मनोकामना पूरी होने पर दाल-बाटी से भंडारा करते हैं।
काफी अच्छी जगह है। यहां आकर मन को शांति मिलती है। भोलेनाथ और बालकृष्ण की लीला सुन आनंद आ गया।
- मनीषा पचौरी, अमृतसर श्रद्धालु
यहां बार-बार आने का दिल करता है। अमृतसर से ब्रज में आने पर में श्रीकृष्ण और भोलेनाथ के इस पवित्र स्थान के दर्शन जरूर करता हूं।
- रिशु मेहरा, अमृतसर श्रद्धालु