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हे राम, हे राम...कहते हुए दशरथ ने त्यागे प्राण
Mathura
Updated Fri, 11 Oct 2013 05:37 AM IST
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कोसीकलां। भरत मिलाप मेले के अंर्तगत बुधवार को राम, लक्ष्मण और जानकी की वनवासी वेश में सवारी निकाली गई। आराध्य को विदा करने को श्रद्धालु उमड़ पड़े। रामलीला मैदान में चित्रकूट मिलन, दशरथ मरण और केवट संवाद लीला का मंचन किया गया। निर्देशन सत्यनरायण शर्मा ने किया।
रामलीला में वन के लिए जा रहे श्रीराम भ्राता लक्ष्मण और पत्नी सीता सहित सरयू तट पर पहुंचे। केवट से सरयू पार कराने के लिए कहा। केवट बोला कि वह इस शर्त पर ही पार ले जा सकता है जब प्रभु राम उसे अपने चरण पखारने दें। यह उसकी उतराई होगी।
श्रीराम कहते हैं कि उसे चरण छूने से क्या मिलेगा। केवट बोला कि वह जानता है कि वह साक्षात हरि हैं। जब केवट ने हठ नहीं छोड़ा तो श्रीराम को उसकी बात माननी पड़ी। चरण पखारने के बाद केवट ने श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को सरयू के पार उतारा। यहां निषादराज से मुलाकात हुई। राम को पहचान कर निषादराज शरणागत हो जाते हैं।
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उधर राम के वनवास जाने के बाद वियोग में राजा दशरथ शैया पर पहुंच जाते हैं। वह बार-बार राम का नाम लेकर याद करते हैं। तब उन्हें श्रवण कुमार के माता-पिता का शाप याद आता है जो उन्हें शिकार के दौरान दिया था। इसी को ध्यान करते हुए दशरथ हे राम, हे राम कहते हुए अपने प्राण त्याग देते हैं।
इससे पूर्व गयालाल स्मृति भवन से शाम सात बजे राम, लक्ष्मण और जानकी की वनवासी वेश में पैदल सवारी निकाली गई। सवारी में आगे-आगे केवट के राम, लक्ष्मण, सीता को नदी पार कराने, श्रवण कुमार और उनके माता-पिता की झांकियां निकाली गईं। सवारी में पीछे-पीछे अयोध्यावासी भगवान राम से अयोध्या वापस लौट जाने का आग्रह करते हुए चल रहे थे। इस मौके पर मेला आचार्य नन्नूमल शास्त्री, अखिल जैन, अनिल जैन, राधेलाल अगरारिया, अजय गोयका उपस्थित रहे।
भरत मिलाप मेले में गुरुवार को शाम छह बजे गयालाल स्मृति भवन से सीताहरण और रात 8 बजे तोताराम मंदिर से खर दूषण की सवारी का नगर भ्रमण होगा। रात में रामलीला का मंचन होगा।
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रामलीला में वन के लिए जा रहे श्रीराम भ्राता लक्ष्मण और पत्नी सीता सहित सरयू तट पर पहुंचे। केवट से सरयू पार कराने के लिए कहा। केवट बोला कि वह इस शर्त पर ही पार ले जा सकता है जब प्रभु राम उसे अपने चरण पखारने दें। यह उसकी उतराई होगी।
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श्रीराम कहते हैं कि उसे चरण छूने से क्या मिलेगा। केवट बोला कि वह जानता है कि वह साक्षात हरि हैं। जब केवट ने हठ नहीं छोड़ा तो श्रीराम को उसकी बात माननी पड़ी। चरण पखारने के बाद केवट ने श्रीराम, लक्ष्मण और सीता को सरयू के पार उतारा। यहां निषादराज से मुलाकात हुई। राम को पहचान कर निषादराज शरणागत हो जाते हैं।
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उधर राम के वनवास जाने के बाद वियोग में राजा दशरथ शैया पर पहुंच जाते हैं। वह बार-बार राम का नाम लेकर याद करते हैं। तब उन्हें श्रवण कुमार के माता-पिता का शाप याद आता है जो उन्हें शिकार के दौरान दिया था। इसी को ध्यान करते हुए दशरथ हे राम, हे राम कहते हुए अपने प्राण त्याग देते हैं।
इससे पूर्व गयालाल स्मृति भवन से शाम सात बजे राम, लक्ष्मण और जानकी की वनवासी वेश में पैदल सवारी निकाली गई। सवारी में आगे-आगे केवट के राम, लक्ष्मण, सीता को नदी पार कराने, श्रवण कुमार और उनके माता-पिता की झांकियां निकाली गईं। सवारी में पीछे-पीछे अयोध्यावासी भगवान राम से अयोध्या वापस लौट जाने का आग्रह करते हुए चल रहे थे। इस मौके पर मेला आचार्य नन्नूमल शास्त्री, अखिल जैन, अनिल जैन, राधेलाल अगरारिया, अजय गोयका उपस्थित रहे।
भरत मिलाप मेले में गुरुवार को शाम छह बजे गयालाल स्मृति भवन से सीताहरण और रात 8 बजे तोताराम मंदिर से खर दूषण की सवारी का नगर भ्रमण होगा। रात में रामलीला का मंचन होगा।