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विधायक बनने को छोड़ी थी सफाईकर्मी की नौकरी
पंकज मिश्रा
Updated Tue, 14 Feb 2017 11:49 PM IST
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अतीत के झरोखे से
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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विधायक बनने के लिए सफाई कर्मी की नौकरी छोड़ने वाले पूर्व विधायक रामेश्वर दयाल ने पहला चुनाव मात्र पांच हजार रुपये में ही लड़ा था। लगातार तीन बार किशनी सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके रामेश्वर की सादगी आज भी लोग याद करते हैं।
नगर के मोहल्ला दरीबा निवासी साधारण परिवार में जन्मे इंटर पास पूर्व विधायक राजनीति से कोसों दूर थे। सफाई कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद जुझारू तेवरों के चलते वह पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के संपर्क में आए। उनकी प्रतिभा परखने के बाद चरण सिंह ने मुलायम सिंह यादव से कहकर उन्हेें टिकट दिलाई। वर्ष 1985 में पहली बार किशनी सीट से चुनाव लड़े मगर हार गए। हारने के बाद वह क्षेत्र में सक्रिय रहे। वर्ष 1989 में जनता दल की टिकट पर चुनाव लड़े। समाज के लोगों ने मिलकर उन्हें चुनाव लड़ाया। सोनेलाल वाल्मीकि बताते हैँ कि पूरा चुनाव वह मात्र 10000 रुपये में ही लडे़ और जीते भी। वह कभी भी प्रचार के दौरान घर नहीं आए। रात को क्षेत्र में ही रुकना उनकी आदत में शामिल था। जब उनको पहली बार टिकट मिली तो पार्टी के तत्कालीन जिला स्तरीय कद्दावर नेता पूर्व मंत्री बाबूराम यादव, पूर्व विधायक रामऔतार शाक्य, उर्मिला यादव, प्रोफेसर सीएल बघेल, सुरेंद्र यादव ने उनका चुनावी मार्गदर्शन किया। वर्ष 1993 और 1996 में सपा की टिकट पर चुनाव जीते। प्रचार के दौरान वह तामझाम से दूर रहते थे। प्रचार में भी केवल सात-आठ लोग ही उनके साथ रहते थे। वर्ष 2002 के चुनाव में जब सपा ने टिकट नहीं दिया तो उन्होंने पार्टी से बगावत कर कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा। उनके समर्थन में राहुल गांधी ने कुसमरा के मैदान में मीटिंग तक की थी मगर वह चुनाव हार गए। चुनाव हारने के बाद उन्होंने फिर सपा का दामन थामा और अंत तक सपा की राजनीति में सक्रिय रहे।
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नगर के मोहल्ला दरीबा निवासी साधारण परिवार में जन्मे इंटर पास पूर्व विधायक राजनीति से कोसों दूर थे। सफाई कर्मचारी संघ के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद जुझारू तेवरों के चलते वह पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के संपर्क में आए। उनकी प्रतिभा परखने के बाद चरण सिंह ने मुलायम सिंह यादव से कहकर उन्हेें टिकट दिलाई। वर्ष 1985 में पहली बार किशनी सीट से चुनाव लड़े मगर हार गए। हारने के बाद वह क्षेत्र में सक्रिय रहे। वर्ष 1989 में जनता दल की टिकट पर चुनाव लड़े। समाज के लोगों ने मिलकर उन्हें चुनाव लड़ाया। सोनेलाल वाल्मीकि बताते हैँ कि पूरा चुनाव वह मात्र 10000 रुपये में ही लडे़ और जीते भी। वह कभी भी प्रचार के दौरान घर नहीं आए। रात को क्षेत्र में ही रुकना उनकी आदत में शामिल था। जब उनको पहली बार टिकट मिली तो पार्टी के तत्कालीन जिला स्तरीय कद्दावर नेता पूर्व मंत्री बाबूराम यादव, पूर्व विधायक रामऔतार शाक्य, उर्मिला यादव, प्रोफेसर सीएल बघेल, सुरेंद्र यादव ने उनका चुनावी मार्गदर्शन किया। वर्ष 1993 और 1996 में सपा की टिकट पर चुनाव जीते। प्रचार के दौरान वह तामझाम से दूर रहते थे। प्रचार में भी केवल सात-आठ लोग ही उनके साथ रहते थे। वर्ष 2002 के चुनाव में जब सपा ने टिकट नहीं दिया तो उन्होंने पार्टी से बगावत कर कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ा। उनके समर्थन में राहुल गांधी ने कुसमरा के मैदान में मीटिंग तक की थी मगर वह चुनाव हार गए। चुनाव हारने के बाद उन्होंने फिर सपा का दामन थामा और अंत तक सपा की राजनीति में सक्रिय रहे।
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