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सपा के गढ़ में पहली बार नहीं गूंजी मुलायम की आवाज

Fri, 17 Feb 2017 11:37 PM IST
अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी
अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी Updated Fri, 17 Feb 2017 11:37 PM IST
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sapa ke gadh mein pahalee baar nahin goonjee mulaayam kee aavaaj
मुलायम ‌सिंह यादव - फोटो : amar ujala
समाजवादी पार्टी के गढ़ में इस बार पहली बार चुनाव में मुलायम सिंह यादव की आवाज सुनाई नहीं पड़ी है। तीन दशकों में पहली बार उन्होंने चुनाव प्रचार से दूरी बनाए रखी है। मुलायम के मार्मिक भाषणों को सुनकर पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में वोट देने का मन बनाने वाले लोग असमंजस में हैं। पहली बार बिना मुलायम के प्रचार हुआ है।
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जिले को सपा का गढ़ माना जाता है। यहां की चारों विधानसभा सीटों पर भी सपा दो बार कब्जा कर चुकी है। सपा के संरक्षक मुलायम सिंह यादव हर चुनाव में मैनपुरी आकर सपा प्रत्याशियों के समर्थन में प्रचार करते रहे हैं। चुनाव चाहे लोकसभा का हो या विधानसभा का, प्रत्याशियों को भी मुलायम के आने का इंतजार रहता था। तीन दशक में यह पहला चुनाव है जब उन्होंने अपनी कर्मभूमि में ही खुद को प्रचार से दूर रखा है। एक सप्ताह पूर्व उनका कार्यक्रम तो लगा मगर दूसरे दिन ही उसे निरस्त कर दिया गया। राजनीतिक हल्कों में माना जा रहा है कि पार्टी में चले घमासान और उसमें स्थानीय नेताओं की सक्रिय भूमिका से मुलायम आहत हैं। पिछले तीन दशक में जिले के सभी विधानसभा क्षेत्रों में प्रचार के दौरान मार्मिक अपील करके प्रत्याशियों की स्थिति को मजबूत करते रहे हैं। प्रचार के दौरान मुलायम एक वाक्य हर सभा में कहते थे, प्रत्याशी से चाहे खूब नाराज रहना पर मेरी सरकार बनवाने के लिए जिता जरूर देना। जनता की नहीं सुनने वाले प्रत्याशियों को मैं खुद ही सबक सिखा दूंगा।
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पड़रिया चौराहा भी पड़ा रहा सूना
मैनपुरी (ब्यूरो)। तीन दशक में पहली बार पड़रिया चौराहा सूना रहा है। यहां पर मुलायम की होने वाली सभा का सपाइयों को ही नहीं बल्कि विरोधियों को भी इंतजार रहता था। बन्नदल क्षेत्र में तो मुलायम की छवि किसी मसीहा से कम नहीं होती है। आज वही बन्नदल क्षेत्र सपा नेताओं को अपने बगावती तेवरों से परेशान किए हैं।
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भीड़ में अपनों को पहचानने की कला
मैनपुरी (ब्यूरो)। मुलायम सिंह में भीड़ के बीच अपनों को पहचानने की कला है। हर मीटिंग में वह भीड़ के बीच बैठे पुराने समाजवादी नेता का नाम पुकारते और उससे ही अपने संघर्ष के दौर की पुष्टि कराते थे। उनकी इस कला की आज भी पुराने लोग चर्चा करते नहीं थकते हैं।
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