{"_id":"5831e0494f1c1bb604b39a64","slug":"sahaalag-ke-baajaar-par-notabandee-ka-grahan","type":"story","status":"publish","title_hn":"सहालग के बाजार पर नोटबंदी का ग्रहण","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
सहालग के बाजार पर नोटबंदी का ग्रहण
अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी
Updated Sun, 20 Nov 2016 11:27 PM IST
विज्ञापन
खाली बैठा दुकानदार
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
सहालग पर भी 500-1000 के पुराने नोट का चलन बंद होने का ग्रहण लग गया है। हालत यह है कि सराफा, कपड़ा, किराना, बर्तन की बिक्री करने वाले दुकानदार भी पुराने नोटों का चलन बंद होने से परेशान हैं। शादी वाले घरों में तो और भी बुरा हाल है। रिश्तेदारों की मदद से ही शादी का खर्चा निकाला जा रहा है।
शादी का सीजन चल रहा है लेकिन 500-1000 के पुराने नोट का चलन बंद होने से लोग परेशान हैं। शादियों की खरीदारी नहीं हो पा रही है। जेवर, कपड़ा हर चीज की खरीदारी जरूरत के हिसाब से पूरी नहीं हो पा रही है।
सराफ रमेशचंद्र वर्मा का कहना है चढ़ावा के नाम पर अब केवल बिछिया, पायलें और अंगूठी ही लोग खरीद रहे हैं। अन्य जेवर तो दूर की बात लोग जंजीर बनवाने तक की सोच तक नहीं रहे हैं। शादी वाले घरों में पुराने जेवरों को ही चढ़ावा के तौर चढ़ाया जा रहा है। सराफा कारोबार सहालग में पिछले सीजन की अपेक्षा 25 प्रतिशत ही रह गया है।
विज्ञापन
कपड़ा कारोबारी संजय भारद्वाज का कहना है इस बार तो सहालग मालूम ही नहीं पड़ रहा है। पहले तो लोग 11 और 21 साड़ियां चढ़ावा में खरीदते थे। अब तो लोग केवल कम रेट वाली पांच या सात साड़ियों से ही चढ़ावा बना रहे हैं। दुल्हन दूल्हे के भी सस्ते कपड़े खरीदे जा रहे हैं। पिछले सीजन की अपेक्षा व्यापार 40 प्रतिशत भी नहीं रह गया है। किराना व्यापारी नेकसे गुप्ता का कहना है शादी में दावत देना जरूरी और मजबूरी है। दावत में खर्च होने वाले किराना का सामान शादी वाले घरों में बहुत कम खरीदा जा रहा है। एक नियमित ग्राहक ने पिछले सीजन में 65 हजार का सामान खरीदा था। इस बार दूसरी बेटी की शादी के लिए 30 हजार का भी सामान नहीं खरीदा है। उस पर भी पांच हजार उधार किए हैं।
बर्तन व्यापारी प्रेम मोहन का कहना है कि इस बार तो नोटबंदी का असर हुआ है। दरवाजे के बर्तन तक खरीदने में लोग कंजूसी कर रहे हैं। लगुन में अब पीतल की बड़ी नहीं छोटी परात ही खरीदी जा रही है। टंकी और कलश तो बिक ही नहीं रहे हैं। पीतल की बजाए स्टील के वह भी केवल नाम के बर्तन बिक रहे हैं। पुराने नोट चल नहीं रहे हैं। नए नोट बाजार में उपलब्ध नहीं हैं।
अजीतगंज निवासी सरजू दयाल मिश्रा के घर में 24 नवंबर को बेटी की बरात आनी है। पुराने नोटों से खरीदारी नहीं होने के कारण उन्होंने दूसरों से पैसे लेकर शादी की तैयारियां की हैं। उनका कहना है नोटबंदी ने तो शादी का मजा ही फीका कर दिया है। राजा का बाग निवासी तरुण दीक्षित के घर में 23 को बहन की बरात आनी है। नोटबंदी के बाद कुछ दुकानों पर चेक देकर खरीदारी की है। कुछ से व्यवहार के चलते कुछ पेमेंट कर कुछ सामान उधार लिया है। उनके रिश्तेदारों ने भी मदद की है।
विज्ञापन
शादी का सीजन चल रहा है लेकिन 500-1000 के पुराने नोट का चलन बंद होने से लोग परेशान हैं। शादियों की खरीदारी नहीं हो पा रही है। जेवर, कपड़ा हर चीज की खरीदारी जरूरत के हिसाब से पूरी नहीं हो पा रही है।
विज्ञापन
सराफ रमेशचंद्र वर्मा का कहना है चढ़ावा के नाम पर अब केवल बिछिया, पायलें और अंगूठी ही लोग खरीद रहे हैं। अन्य जेवर तो दूर की बात लोग जंजीर बनवाने तक की सोच तक नहीं रहे हैं। शादी वाले घरों में पुराने जेवरों को ही चढ़ावा के तौर चढ़ाया जा रहा है। सराफा कारोबार सहालग में पिछले सीजन की अपेक्षा 25 प्रतिशत ही रह गया है।
विज्ञापन
कपड़ा कारोबारी संजय भारद्वाज का कहना है इस बार तो सहालग मालूम ही नहीं पड़ रहा है। पहले तो लोग 11 और 21 साड़ियां चढ़ावा में खरीदते थे। अब तो लोग केवल कम रेट वाली पांच या सात साड़ियों से ही चढ़ावा बना रहे हैं। दुल्हन दूल्हे के भी सस्ते कपड़े खरीदे जा रहे हैं। पिछले सीजन की अपेक्षा व्यापार 40 प्रतिशत भी नहीं रह गया है। किराना व्यापारी नेकसे गुप्ता का कहना है शादी में दावत देना जरूरी और मजबूरी है। दावत में खर्च होने वाले किराना का सामान शादी वाले घरों में बहुत कम खरीदा जा रहा है। एक नियमित ग्राहक ने पिछले सीजन में 65 हजार का सामान खरीदा था। इस बार दूसरी बेटी की शादी के लिए 30 हजार का भी सामान नहीं खरीदा है। उस पर भी पांच हजार उधार किए हैं।
बर्तन व्यापारी प्रेम मोहन का कहना है कि इस बार तो नोटबंदी का असर हुआ है। दरवाजे के बर्तन तक खरीदने में लोग कंजूसी कर रहे हैं। लगुन में अब पीतल की बड़ी नहीं छोटी परात ही खरीदी जा रही है। टंकी और कलश तो बिक ही नहीं रहे हैं। पीतल की बजाए स्टील के वह भी केवल नाम के बर्तन बिक रहे हैं। पुराने नोट चल नहीं रहे हैं। नए नोट बाजार में उपलब्ध नहीं हैं।
अजीतगंज निवासी सरजू दयाल मिश्रा के घर में 24 नवंबर को बेटी की बरात आनी है। पुराने नोटों से खरीदारी नहीं होने के कारण उन्होंने दूसरों से पैसे लेकर शादी की तैयारियां की हैं। उनका कहना है नोटबंदी ने तो शादी का मजा ही फीका कर दिया है। राजा का बाग निवासी तरुण दीक्षित के घर में 23 को बहन की बरात आनी है। नोटबंदी के बाद कुछ दुकानों पर चेक देकर खरीदारी की है। कुछ से व्यवहार के चलते कुछ पेमेंट कर कुछ सामान उधार लिया है। उनके रिश्तेदारों ने भी मदद की है।