{"_id":"57a735464f1c1b26112b90af","slug":"mustache-obese-chef-who-would-sit-in-the-temple-shankar","type":"story","status":"publish","title_hn":"मोटे महाराज मंदिर में विराजे हैं मूंछों वाले शंकरजी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
मोटे महाराज मंदिर में विराजे हैं मूंछों वाले शंकरजी
अमर उजाला ब्यूरो, मैनपुरी
Updated Sun, 07 Aug 2016 10:52 PM IST
विज्ञापन
मंदिर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
शहर का प्राचीन मोटे महाराज मंदिर में यूं तो सावन के सोमवार को भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है पर पूरे साल ही शिव भक्त हर सोमवार को वहां पूजा करने के लिए आते हैं। सावन के सोमवार को वहां मेला भी लगता है।
किवदंती के अनुसार महाराजा तेजसिंह के पूर्वजों ने वर्ण व्यवस्था के आधार पर लगभग 350 साल पहले आगरा रोड पर शिव मंदिर बनवाया था। मंदिर में मूंछों वाले भगवान शंकर की प्रतिमा स्थापित कराई गई थी। ऐसी प्रतिमा आसपास के किसी जिले में नहीं है। मंदिर बनाने के साथ ही वहां दलित समाज का पुजारी पूजा करने के लिए रखा गया था। पुजारी ही मंदिर की देखभाल करता था। 1952 से पहले दलित समाज के 13 लोगों की कमेटी मंदिर की देखभाल करती थी। 1952 में कमेटी ने तहसीलदार कोर्ट में मंदिर की देखभाल करने के लिए राजाराम अंबेश को मंदिर का सरवराकार बना दिया था। उसके बाद से मंदिर की देखभाल, रखरखाव, जीर्णोद्धार सरवराकार की देखरेख में ही किया जाता है।
मंदिर के पुजारी बाबा कैलाश बताते हैं कि शिव मंदिर को मोटे महाराज मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर में अब हर सोमवार को समाज के सभी वर्गों के लोग पूजा करने के लिए आते हैं। मन्नत पूरी होने पर मंदिर का सुंदरीकरण भी कराते हैं। सावन के सोमवार को मंदिर पर मेला भी लगता है। पुजारी बताते हैं कि बुजुर्गों के अनुसार अंग्रेजों से लड़ने के लिए जाते समय राजा तेज सिंह इस मंदिर पर भी पूजा करने आए थे। अंग्रेजों से युद्ध करने से पहले और युद्ध के बाद भी वह मंदिर पर आना कभी नहीं भूले।
विज्ञापन
विज्ञापन
किवदंती के अनुसार महाराजा तेजसिंह के पूर्वजों ने वर्ण व्यवस्था के आधार पर लगभग 350 साल पहले आगरा रोड पर शिव मंदिर बनवाया था। मंदिर में मूंछों वाले भगवान शंकर की प्रतिमा स्थापित कराई गई थी। ऐसी प्रतिमा आसपास के किसी जिले में नहीं है। मंदिर बनाने के साथ ही वहां दलित समाज का पुजारी पूजा करने के लिए रखा गया था। पुजारी ही मंदिर की देखभाल करता था। 1952 से पहले दलित समाज के 13 लोगों की कमेटी मंदिर की देखभाल करती थी। 1952 में कमेटी ने तहसीलदार कोर्ट में मंदिर की देखभाल करने के लिए राजाराम अंबेश को मंदिर का सरवराकार बना दिया था। उसके बाद से मंदिर की देखभाल, रखरखाव, जीर्णोद्धार सरवराकार की देखरेख में ही किया जाता है।
विज्ञापन
मंदिर के पुजारी बाबा कैलाश बताते हैं कि शिव मंदिर को मोटे महाराज मंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर में अब हर सोमवार को समाज के सभी वर्गों के लोग पूजा करने के लिए आते हैं। मन्नत पूरी होने पर मंदिर का सुंदरीकरण भी कराते हैं। सावन के सोमवार को मंदिर पर मेला भी लगता है। पुजारी बताते हैं कि बुजुर्गों के अनुसार अंग्रेजों से लड़ने के लिए जाते समय राजा तेज सिंह इस मंदिर पर भी पूजा करने आए थे। अंग्रेजों से युद्ध करने से पहले और युद्ध के बाद भी वह मंदिर पर आना कभी नहीं भूले।
विज्ञापन