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मौसम में मस्ती तो बाजार में होली में रौनक
अमर उजाला ब्यूरो मैनपुरी
Updated Thu, 09 Mar 2017 11:32 PM IST
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मौसम में मस्ती तो बाजार में होली में रौनक
- फोटो : अमर उजाला
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कृत्रिम रंगों की तड़क-भड़क ने पारंपरिक रंगों की फागुनी रंगत को फीका कर दिया है। होली के मौके पर बिकने वाले लाल, हरे, पीले, नीले, गुलाबी, सफेद रसायनिक रंगों से एक-दूसरे को रंगने की धुन में लोग सेहत के लिए सुरक्षित रंगों को भी भूल गए हैं। अब होली पर न तो टेसू के फूलों का पारंपरिक बसंती रंग नजर आता है और न ही कुसुम की लालिमा ही दिखाई पड़ती है।
होली रंगों का पर्व है। एक-दूसरे को रंगने के बाद न कोई छोटा होता है और न कोई बड़ा। पिछले समय में होली के अवसर पर लगाने वाले रंगों की शरीर में उपयोगिता होती थी। वह रंग शरीर के लिए फायदेमंद होता था लेकिन बदलते वक्त ने प्रकृति के मनमोहक रंगों को नकार दिया है। आज अनेक दुष्प्रभावों के बावजूद विषैले रसायन वाले रंगों और पेंटों का होली पर भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है।
परंपरागत तौर पर टेसू के फूल के बसंती रंग को ही होली का पर्याय माना जाता रहा है। इससे बना रंग त्वचा को रोगों से बचाता है।
कृषि वैज्ञानिक डाक्टर जगदीश मिश्रा के अनुसार टेसू के फूल में व्यूटीन नामक पिगमेंट पाया जाता है जो शरीर की सुंदरता में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा गेंदा, कुसुम, मेंहदी, चुकंदर, हल्दी, हरसिंगार जैसे पौधों की फूल पत्तियों से बने शोख रंग भी किसी न किसी रूप में शरीर के लिए लाभदायक होते हैं लेकिन आज यह सब गुजरे जमाने की बात हो चले हैं। होली के लिए रसायनिक पदार्थों से बने रंगों की बिक्री जोरों पर हो रही है। बाजार में सस्ते और महंगे दोनों तरह के रंग मौजूद हैं, किंतु सस्ते कीमत के रंगों की बिक्री अधिक हो रही है। सूत्रों की मानें तो होली के रंग भी मिलावट से नहीं बचे हैं। सस्ते रंगों में कुछ ऐसे रसायनों का प्रयोग किया जाता है जो त्वचा के लिए बेहद हानिकारक होते हैं।
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होली रंगों का पर्व है। एक-दूसरे को रंगने के बाद न कोई छोटा होता है और न कोई बड़ा। पिछले समय में होली के अवसर पर लगाने वाले रंगों की शरीर में उपयोगिता होती थी। वह रंग शरीर के लिए फायदेमंद होता था लेकिन बदलते वक्त ने प्रकृति के मनमोहक रंगों को नकार दिया है। आज अनेक दुष्प्रभावों के बावजूद विषैले रसायन वाले रंगों और पेंटों का होली पर भरपूर इस्तेमाल किया जा रहा है।
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परंपरागत तौर पर टेसू के फूल के बसंती रंग को ही होली का पर्याय माना जाता रहा है। इससे बना रंग त्वचा को रोगों से बचाता है।
कृषि वैज्ञानिक डाक्टर जगदीश मिश्रा के अनुसार टेसू के फूल में व्यूटीन नामक पिगमेंट पाया जाता है जो शरीर की सुंदरता में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा गेंदा, कुसुम, मेंहदी, चुकंदर, हल्दी, हरसिंगार जैसे पौधों की फूल पत्तियों से बने शोख रंग भी किसी न किसी रूप में शरीर के लिए लाभदायक होते हैं लेकिन आज यह सब गुजरे जमाने की बात हो चले हैं। होली के लिए रसायनिक पदार्थों से बने रंगों की बिक्री जोरों पर हो रही है। बाजार में सस्ते और महंगे दोनों तरह के रंग मौजूद हैं, किंतु सस्ते कीमत के रंगों की बिक्री अधिक हो रही है। सूत्रों की मानें तो होली के रंग भी मिलावट से नहीं बचे हैं। सस्ते रंगों में कुछ ऐसे रसायनों का प्रयोग किया जाता है जो त्वचा के लिए बेहद हानिकारक होते हैं।
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