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दिहुली नरसंहार: 24 दलितों की हत्या...ढाई घंटे तक चला खूनी खेल, ये था गिरोह का सरगना; जिसके नाम का रहा डंका
Thu, 13 Mar 2025 01:50 PM IST
धीरेन्द्र सिंह
राहुल दक्ष, संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी
राहुल दक्ष, संवाद न्यूज एजेंसी, मैनपुरी
Published by: धीरेन्द्र सिंह
Updated Thu, 13 Mar 2025 01:50 PM IST
सार
दिहुली नरसंहार में 24 दलितों के कत्ल करने वाले गिरोह का सरगना संतोष उर्फ संतोषा था। उसे राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त था। संतोष को 1988 में घिरोर का ब्लॉक प्रमुख बनाने के तत्कालीन सांसद बलराम सिंह यादव ने खड़ा किया था।
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firozabad dihuli massacre
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
दिहुली गांव में 1981 में 24 दलितों की हत्या करने वाले डकैत गिरोह के सरगना संतोष उर्फ संतोषा को राजनीतिक संरक्षण भी प्राप्त था। कांग्रेस मैनपुरी जिले में उसके लिए दो फाड़ हो गई थी। 1988 में ब्लॉक प्रमुखी का चुनाव संतोष ने तब विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे सदर विधायक रघुवीर सिंह यादव के बेटे सतीश चंद्र यादव के खिलाफ लड़ा था। इस चुनाव में तत्कालीन सांसद और बलराम सिंह यादव (पूर्व केंद्रीय मंत्री) ने संतोष को अपना वोट दिया था।
राजनीति के पुराने जानकार बताते हैं कि 1988 में मैनपुरी के सांसद कांग्रेस के बलराम सिंह यादव थे। उनके पास कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष का भी दायित्व था। इधर, सदर विधानसभा से रघुवीर सिंह यादव कांग्रेस के विधायक थे और प्रदेश में कैबिनेट मंत्री भी थे। रघुवीर सिंह यादव और बलराम सिंह यादव में यादव समाज का नेता बनने के लिए राजनीतिक अदावत भी भीतरखाने रहती थी।
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राजनीति के पुराने जानकार बताते हैं कि 1988 में मैनपुरी के सांसद कांग्रेस के बलराम सिंह यादव थे। उनके पास कांग्रेस के उत्तर प्रदेश अध्यक्ष का भी दायित्व था। इधर, सदर विधानसभा से रघुवीर सिंह यादव कांग्रेस के विधायक थे और प्रदेश में कैबिनेट मंत्री भी थे। रघुवीर सिंह यादव और बलराम सिंह यादव में यादव समाज का नेता बनने के लिए राजनीतिक अदावत भी भीतरखाने रहती थी।
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रघुवीर सिंह यादव ने अपने बेटे सतीश चंद्र यादव को घिरोर ब्लॉक प्रमुख के पद पर खड़ा किया था। इसी बीच बलराम सिंह यादव ने डकैत संतोष को अपना समर्थन दे दिया और उसे सतीश चंद्र यादव के सामने खड़ा कर दिया। वर्तमान में दीवानी में वकालत करने वाले सतीश चंद्र यादव बताते हैं कि वोटिंग के दिन बलराम सिंह यादव ने अपना वोट भी संतोष को दिया। इस चुनाव में 90 वोट पड़े थे, जिनमें से 88 वोट उन्हें और 2 वोट संतोष को प्राप्त हुए थे। डकैत संतोष को वोट देने के चलते बलराम सिंह यादव की उस समय काफी फजीहत भी हुई थी। कांग्रेस में दो फाड़ होने की खबर सुर्खियाें में रही थी।
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संतोष के सामने कोई नहीं भरता था प्रधानी का पर्चा
दिहुली कांड को अंजाम देने वाले संतोष ने कुछ ही समय में राजनीति के क्षेत्र में भी कदम रख लिया था। मूलरूप से फिरोजाबाद के जसराना थाना क्षेत्र के गांव नवादा का रहने वाला संतोष उर्फ संतोषा की ननिहाल घिरोर विकास खंड की ग्राम पंचायत नगला कंचन के गांव जाख में थी। इसके चलते उसका बचपन से ही आना-जाना था। संतोष ने कम उम्र में ही अपराध का रास्ता चुना लिया और धीरे-धीरे अपने गैंग का विस्तार करते हुए लूट-डकैती की वारदातों को अंजाम देने लगा। उसका खौफ क्षेत्र में बढ़ने लगा। दिहुली कांड के बाद जब पुलिस ने उसे जेल भेजा तो जेल से ही उसने प्रधानी चुनाव का पर्चा भरा था और निर्विरोध जीत दर्ज की थी। इसके बाद वह लगातार कई चुनाव जीता। नगला कंचन के वर्तमान प्रधान धीरी सिंह कठेरिया बताते हैं कि संतोष के अलावा उसकी पत्नी कमला भी दो बार प्रधान चुनी गईं। संतोष का खौफ इस कदर था कि उसके सामने 80 से लेकर 2000 के दशक तक नगला कंचन में कोई भी व्यक्ति प्रधानी पद पर दावेदारी पेश नहीं करता था।
दिहुली कांड को अंजाम देने वाले संतोष ने कुछ ही समय में राजनीति के क्षेत्र में भी कदम रख लिया था। मूलरूप से फिरोजाबाद के जसराना थाना क्षेत्र के गांव नवादा का रहने वाला संतोष उर्फ संतोषा की ननिहाल घिरोर विकास खंड की ग्राम पंचायत नगला कंचन के गांव जाख में थी। इसके चलते उसका बचपन से ही आना-जाना था। संतोष ने कम उम्र में ही अपराध का रास्ता चुना लिया और धीरे-धीरे अपने गैंग का विस्तार करते हुए लूट-डकैती की वारदातों को अंजाम देने लगा। उसका खौफ क्षेत्र में बढ़ने लगा। दिहुली कांड के बाद जब पुलिस ने उसे जेल भेजा तो जेल से ही उसने प्रधानी चुनाव का पर्चा भरा था और निर्विरोध जीत दर्ज की थी। इसके बाद वह लगातार कई चुनाव जीता। नगला कंचन के वर्तमान प्रधान धीरी सिंह कठेरिया बताते हैं कि संतोष के अलावा उसकी पत्नी कमला भी दो बार प्रधान चुनी गईं। संतोष का खौफ इस कदर था कि उसके सामने 80 से लेकर 2000 के दशक तक नगला कंचन में कोई भी व्यक्ति प्रधानी पद पर दावेदारी पेश नहीं करता था।