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पांडवों ने की थी भगवान भीमसेन की पूजा
अमर उजाला ब्यूरो, मैनपुरी
Updated Sun, 31 Jul 2016 10:22 PM IST
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मंदिर
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो
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शहर के प्राचीन श्री भीमसेन मंदिर अपने आगोश में तमाम पौराणिक गाथाएं समेटे है। यूं तो मंदिर में प्रत्येक सोमवार को भक्तों का सैलाब उमड़ता है लेकिन महाशिवरात्रि और श्रावण मास के सोमवार में तो मेले जैसा नजारा होता है। कहा जाता है कि यहां अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने भगवान भीमसेन की पूजा की थी। महर्षि मार्कंडेय ने भी भगवान भीमसेन की साधना की थी। इन दिनों मंदिर में जहां भक्ति रसधारा बह रही है, वहीं हजारों श्रद्धालु भगवान शिव की पूजा-अर्चना के लिए उमड़ रहे हैं।
भगवान भीमसेन का वर्तमान मंदिर तो 12वीं शताब्दी में अपने स्वरूप में आया लेकिन भगवान भीमसेन का विग्रह पौराणिक काल का बताया जाता है। शहर के ईशान कोंण में जहां मां शीतला देवी का मंदिर है वहीं आग्नेय कोंण में भगवान भीमसेन विराजमान हैं। कहा जाता है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बीच इस पावन नगरी की रक्षा के लिए शिवा और शिव को विराजमान किया गया है।
तीर्थस्थल बटेश्वर की भांति यहां भी भगवान शिव की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में है। विग्रह में बड़े-बड़े जटा जूट से अलंकृत चंद्रकला को मस्तक पर धारण करने वाले एवं बड़ी-बड़ी मूंछों से सुशोभित शिव का रूपांकन किया गया है। श्री भीमसेन मंदिर के बारे में किवदंती है कि अज्ञातवास के दौरान इच्छु नदी (वर्तमान में ईशन) के किनारे-किनारे बिठूर जाते समय पांडव यहां रुके थे। पांडवों ने भगवान भीमसेन की यहां पूजा अर्चना की थी।
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संत गुलाब खां की मजार की भी होती है पूजा
बुजुर्गों के अनुसार करीब 200 वर्ष पूर्व भीमसेन मंदिर में महाशिवरात्रि पर भंडारा चल रहा था। इसी दौरान मुस्लिम संत गुलाब खां आए और अपने कमंडल में खीर परोसने को कहा। खीर परोसने वाले कमंडल में खीर डालते रहे लेकिन कमंडल नहीं भरा। जब यह बात पुजारी नरोत्तमदास तक पहुंची तो वह स्वयं अपने कमंडल से खीर परोसने लगे लेकिन लोग यह देख कर दंग रह गए कि न तो गुलाब खां का कमंडल ही भर रहा है और न ही नरोत्तमदास जी के कमंडल से खीर की धार टूट रही है। कहा जाता है कि दोनों संत गले मिले और संत गुलाब खां भी भीमसेन मंदिर में ही रहने लगे। मंदिर परिसर में गुलाब खां की मजार आज भी बनी हुई है। श्रद्धालु मजार की भी पूजा अर्चना करते हैं।
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भगवान भीमसेन का वर्तमान मंदिर तो 12वीं शताब्दी में अपने स्वरूप में आया लेकिन भगवान भीमसेन का विग्रह पौराणिक काल का बताया जाता है। शहर के ईशान कोंण में जहां मां शीतला देवी का मंदिर है वहीं आग्नेय कोंण में भगवान भीमसेन विराजमान हैं। कहा जाता है कि उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों के बीच इस पावन नगरी की रक्षा के लिए शिवा और शिव को विराजमान किया गया है।
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तीर्थस्थल बटेश्वर की भांति यहां भी भगवान शिव की प्रतिमा पद्मासन मुद्रा में है। विग्रह में बड़े-बड़े जटा जूट से अलंकृत चंद्रकला को मस्तक पर धारण करने वाले एवं बड़ी-बड़ी मूंछों से सुशोभित शिव का रूपांकन किया गया है। श्री भीमसेन मंदिर के बारे में किवदंती है कि अज्ञातवास के दौरान इच्छु नदी (वर्तमान में ईशन) के किनारे-किनारे बिठूर जाते समय पांडव यहां रुके थे। पांडवों ने भगवान भीमसेन की यहां पूजा अर्चना की थी।
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संत गुलाब खां की मजार की भी होती है पूजा
बुजुर्गों के अनुसार करीब 200 वर्ष पूर्व भीमसेन मंदिर में महाशिवरात्रि पर भंडारा चल रहा था। इसी दौरान मुस्लिम संत गुलाब खां आए और अपने कमंडल में खीर परोसने को कहा। खीर परोसने वाले कमंडल में खीर डालते रहे लेकिन कमंडल नहीं भरा। जब यह बात पुजारी नरोत्तमदास तक पहुंची तो वह स्वयं अपने कमंडल से खीर परोसने लगे लेकिन लोग यह देख कर दंग रह गए कि न तो गुलाब खां का कमंडल ही भर रहा है और न ही नरोत्तमदास जी के कमंडल से खीर की धार टूट रही है। कहा जाता है कि दोनों संत गले मिले और संत गुलाब खां भी भीमसेन मंदिर में ही रहने लगे। मंदिर परिसर में गुलाब खां की मजार आज भी बनी हुई है। श्रद्धालु मजार की भी पूजा अर्चना करते हैं।