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अनदेखी के चलते खत्म होते जा रहे प्राचीन कुएं
अमर उजाला महाोबा
Updated Fri, 10 Jul 2015 11:31 PM IST
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महोबा। बुंदेलखंड के पठारी क्षेत्र में अब कुएं खत्म होते जा रहे है। कुओं की लगातार हो रही अनदेखी के चलते जहां तमान कुएं जर्जर हो गए हैं, वहीं कई कुओं की सफाई न होने से पानी के स्रोत बंद हो गए हैं। कई कुएं देखरेख के अभाव में जमीदोज हो गए हैं। पिछले साल बारिश के दगा दे जाने से तालाबों, कुओं ने भी जवाब दे दिया है, जिससे अब लोगों को पेयजल के परंपरागत स्रोत कुओं की याद सताने लगी है। पानी की समस्या बढ़ती जा रही है। इतना ही नहीं प्राचीन कुएं भी लोगाें की प्यास नहीं बुझा पा रहे हैं।
गौरतलब है कि चार दशक पहले जिले के नगरीय और ग्रामीण अंचलों में पेयजल आपूर्ति के लिए पाइप लाइनें नहीं होती थी। तब लोग कुओं और हैंडपंपों से आश्रित रहते थे। हर साल गर्मी के दिनों में लोग एकजुट होकर कुओं में नीचे उतरकर उसकी सफाई करते थे, जिससे साल भर तक पानी बिना फिटकरी व दवा डाले साफ सुथरा रहता था। कुओं की हर साल साफ सफाई के अलावा मरम्मत भी कराई जाती थी, जिससे गर्मी के दिनों में भी पानी का संकट नहीं रहता था। कुओं के सूखने से अब उनकी जगह घर-घर में लगे जेट पंप, सबमर्सिबल पंप और पाइप लाइनों ने ले ली है। जिससे लोगों ने कुओं की तरफ रुख करना बंद कर दिया है। देखरेख के अभाव में कुएं खंडहर होते चले गए और उनका जल स्रोत भी खत्म हो गया।
उपेक्षा के चलते तमाम कुओं का नहीं मिलता नामोनिशान
प्रशासनिक उदासीनता के चलते जिले के तमाम कुएं खत्म हो गए हैं। कुछ कुओं के ऊपर से सड़कें निकल गई हैं। अफसरों की अनदेखी के चलते वर्षाें से राहगीरों और आसपास के लोगों की प्यास बुझा रहे तमाम कुओं का अता पता तक नहीं है, जिससे पाइप लाइन में पानी न आने पर लोग कुओं की तलाश करते हैं।
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हैंडपंप बने सहारा
जिले में बढ़ती पानी कि किल्लत के चलते हैंडपंप लोगों के लिए सहारा बन गए। कारण, कुओं की उपेक्षा से जल स्रोत खत्म हो गए, जिससे अब मात्र हैंडपंप ही लोगाें की प्यास बुझा रहे हैं। जिला प्रशासन ने भी बढ़ते पेयजल संकट के प्रति फिलहाल कोई योजना नहीं बनाई। यदि समय से बारिश नहीं हुई तो पानी को लेकर स्थिति गंभीर हो सकती है।
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गौरतलब है कि चार दशक पहले जिले के नगरीय और ग्रामीण अंचलों में पेयजल आपूर्ति के लिए पाइप लाइनें नहीं होती थी। तब लोग कुओं और हैंडपंपों से आश्रित रहते थे। हर साल गर्मी के दिनों में लोग एकजुट होकर कुओं में नीचे उतरकर उसकी सफाई करते थे, जिससे साल भर तक पानी बिना फिटकरी व दवा डाले साफ सुथरा रहता था। कुओं की हर साल साफ सफाई के अलावा मरम्मत भी कराई जाती थी, जिससे गर्मी के दिनों में भी पानी का संकट नहीं रहता था। कुओं के सूखने से अब उनकी जगह घर-घर में लगे जेट पंप, सबमर्सिबल पंप और पाइप लाइनों ने ले ली है। जिससे लोगों ने कुओं की तरफ रुख करना बंद कर दिया है। देखरेख के अभाव में कुएं खंडहर होते चले गए और उनका जल स्रोत भी खत्म हो गया।
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उपेक्षा के चलते तमाम कुओं का नहीं मिलता नामोनिशान
प्रशासनिक उदासीनता के चलते जिले के तमाम कुएं खत्म हो गए हैं। कुछ कुओं के ऊपर से सड़कें निकल गई हैं। अफसरों की अनदेखी के चलते वर्षाें से राहगीरों और आसपास के लोगों की प्यास बुझा रहे तमाम कुओं का अता पता तक नहीं है, जिससे पाइप लाइन में पानी न आने पर लोग कुओं की तलाश करते हैं।
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हैंडपंप बने सहारा
जिले में बढ़ती पानी कि किल्लत के चलते हैंडपंप लोगों के लिए सहारा बन गए। कारण, कुओं की उपेक्षा से जल स्रोत खत्म हो गए, जिससे अब मात्र हैंडपंप ही लोगाें की प्यास बुझा रहे हैं। जिला प्रशासन ने भी बढ़ते पेयजल संकट के प्रति फिलहाल कोई योजना नहीं बनाई। यदि समय से बारिश नहीं हुई तो पानी को लेकर स्थिति गंभीर हो सकती है।