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भारत छोड़ो आंदोलन के सिपाही ने ली अंतिम सांस
अमर उजाला ब्यूरो, महोबा
Updated Sun, 27 Mar 2016 11:22 PM IST
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तिरंगे में लिपटा आजादी के सिपाही का पार्थिव शरीर
- फोटो : अमर उजाला
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थाना महोबकंठ के ग्राम पहाड़िया में शनिवार की रात को गांव के अंतिम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धनीराम की सांसें थम गईं। यह 107 वर्ष के थे। भारत छोड़ो आंदोलन में शिरकत करने वाले धनीराम को अंग्रेजी हुकूमत ने तीन माह कैद की सजा दी थी। रविवार को राजकीय सम्मान के साथ स्वतंत्रता संग्राम के सिपाही का अंतिम संस्कार किया गया।
ग्राम पहाड़िया के जांबाजों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। गांव के सात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत से जमकर लोहा लिया था। इनमें से बैजनाथ सक्सेना, मातादीन, सीताराम, सुखलाल, परीक्षत, घासीराम का निधन हो चुका है। गांव के अंतिम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धनीराम (107) पुत्र सुल्ला ने शनिवार की रात अंतिम सांस ली।
सेनानी के निधन से गांव का माहौल गमगीन हो गया। गार्ड अॅाफ अॅानर के बाद सेनानी के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेट कर राजकीय सम्मान के साथ गांव में अंतिम संस्कार किया गया। प्रशासनिक अमले ने गांव पहुंचकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को पांच हजार रुपये की राशि भेंट की। सेनानी क ी अंतिम यात्रा में भारी भीड़ रही।
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रिहाई के बाद फिर लड़ी लड़ाई
धनीराम ने 1941 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था। अंग्रेजी हुकूमत की मुखालफत में इन्हें आठ अप्रैल 1941 को तीन माह की जेल की सजा के साथ ही 25 रुपये जुर्माना किया गया। जेल से रिहा होने के बाद यह दोबारा आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। सेनानी को शासन से 12 हजार रुपये मासिक पेंशन मिल रही थी।
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ग्राम पहाड़िया के जांबाजों ने आजादी की लड़ाई में हिस्सा लिया था। गांव के सात स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों ने अंग्रेजी हुकूमत से जमकर लोहा लिया था। इनमें से बैजनाथ सक्सेना, मातादीन, सीताराम, सुखलाल, परीक्षत, घासीराम का निधन हो चुका है। गांव के अंतिम स्वतंत्रता संग्राम सेनानी धनीराम (107) पुत्र सुल्ला ने शनिवार की रात अंतिम सांस ली।
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सेनानी के निधन से गांव का माहौल गमगीन हो गया। गार्ड अॅाफ अॅानर के बाद सेनानी के पार्थिव शरीर को तिरंगे में लपेट कर राजकीय सम्मान के साथ गांव में अंतिम संस्कार किया गया। प्रशासनिक अमले ने गांव पहुंचकर स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के अंतिम संस्कार के लिए परिजनों को पांच हजार रुपये की राशि भेंट की। सेनानी क ी अंतिम यात्रा में भारी भीड़ रही।
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रिहाई के बाद फिर लड़ी लड़ाई
धनीराम ने 1941 में अंग्रेजों भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लिया था। अंग्रेजी हुकूमत की मुखालफत में इन्हें आठ अप्रैल 1941 को तीन माह की जेल की सजा के साथ ही 25 रुपये जुर्माना किया गया। जेल से रिहा होने के बाद यह दोबारा आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। सेनानी को शासन से 12 हजार रुपये मासिक पेंशन मिल रही थी।