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महोबा: शौर्य और पराक्रम से लक्ष्मीबाई ने बढ़ाया बुंदेलखंड का गौरव: पाटकर

Fri, 20 Nov 2020 12:00 AM IST
Kanpur	 Bureau कानपुर ब्यूरो
Updated Fri, 20 Nov 2020 12:00 AM IST
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Laxmibai increased the pride of Bundelkhand with bravery and might
जयंती पर वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई को नमन करते बुंदेले - फोटो : MAHOBA
महोबा। प्रथम स्वाधीनता संग्राम की महान वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की 192वीं जयंती पर गुरुवार को बुंदेली समाज ने कार्यक्रम आयोजित कर उनके अविस्मरणीय संघर्ष को नमन किया। इस मौके पर बुंदेली समाज के संयोजक तारा पाटकर ने कहा कि रानी लक्ष्मीबाई ने अपने शौर्य और पराक्रम से न केवल बुंदेलखंड का गौरव दुनिया भर में बढ़ाया, बल्कि वे नारी शक्ति के अदम्य साहस की प्रतीक बन गईं। उन्होंने हमें अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाया। कहा कि पिछले साल राष्ट्रीय पुरस्कार हासिल करने वाली फिल्म मणिकर्णिका-झांसी की रानी की शूटिंग बुंदेलखंड में न होना दुर्भाग्यपूर्ण था।
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गोरखगिरी स्थित सीता रसोई में रानी लक्ष्मीबाई की जयंती मनाई गई। इस दौरान आयोजित कार्यक्रम में बुंदेली समाज के संयोजक ने कहा कि बुंदेलखंड में न केवल खूबसूरत किलों की कमी है और न ही शूटिंग के लिए जरूरी अन्य चीजों की। पुष्पेंद्र अरजरिया ने कहा कि लक्ष्मी बाई का असली नाम मणिकर्णिका था। उनका जन्म 19 नवंबर 1828 को वाराणसी में मराठा ब्राह्मण मोरोपंत तांबे के घर हुआ, लेकिन 4 वर्ष की उम्र में ही उनकी मां भागीरथी का निधन हो गया था।
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14 वर्ष में उनकी शादी झांसी नरेश गंगाधर राव से हो गई और वे रानी लक्ष्मीबाई बन गईं। उनको प्यार से सभी मनु व छबीली भी कहते थे। सिद्ध गोपाल सेन ने कहा कि सेना में महिलाओं की भर्ती सबसे पहले उन्होंने ही की थी। दुर्गा दल बनाकर उनको युद्ध का प्रशिक्षण दिया। अपनी हमशक्ल झलकारी बाई को सेनापति बनाया।
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सुधीर दुबे ने कहा कि आजादी की लड़ाई में अवंती बाई लोधी पहली शहीद वीरांगना थीं, तो रानी लक्ष्मीबाई दूसरी शहीद वीरांगना थीं। वे अंग्रेजों से लड़ते-लड़ते 29 वर्ष की आयु ग्वालियर के कोटा की सराय में शहीद हुई थीं। इस मौके पर पवित्र पाटकर, अवधेश गुप्ता, रामदास महाराज व ग्यासी लाल समेत अन्य मौजूद रहे।
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