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महोबाः गांधीजी के नेतृत्व में बुंदेलों ने लड़ी थी आजादी की लड़ाई
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आजादी की लड़ाई में योगदान करने क्रांतिकारियों की फाइल फोटो
- फोटो : MAHOBA
कुलपहाड़ (महोबा)। देश की आजादी के लिए लड़ी गई लड़ाई में कुलपहाड़ का भी विशेष योगदान रहा है। बुंदेलों ने गांधीजी के नेतृत्व में आजादी की लड़ाई लड़ी थी। यहां 1921 में भगदान दास बालेंदु की मौजूदगी में विदेशी वस्रों की होली जलाकर आंदोलन की शुरूआत की गई थी। बालेंदु के साथ अनेक युवाओं ने आजीवन खादी पहनने का संकल्प लेकर कांग्रेस की सदस्यता ग्रहण की थी। इनके साथ टेलर मास्टर मूलचंद्र और अब्दुल रज्जाक ने भी आंदोलन में हिस्सा लिया था।
वर्ष 1923 में कुलपहाड़ में प्रथम खादी भंडार की स्थापना की गई। वर्ष 1926 में जवाहरलाल नेहरू व आचार्य कृपलानी सुबह चार बजे मानिकपुर-झांसी ट्रेन से कुलपहाड़ रेलवे स्टेशन आए। स्टेशन से पैदल ही जंगल के बीच से होते हुए कुलपहाड़ पहुंचे। वहां पर खादी भंडार देखने के बाद 26 मील दूर राठ खादी भंडार तक पैदल रास्ता तय किया।
डिस्ट्रिक बोर्ड के सदस्य मोटरसाइकिल से राठ जा रहे थे। अध्यक्ष ने धनीराम अरजरिया के निवेदन पर नेहरू जी को बाइक पर बैठा लिया और डरते-डरते राठ ले गए। वर्ष 1928 में बालेंदु कोंग्रेस के कलकत्ता में आयोजित अधिवेशन में शामिल होने गए थे। वहां पर महात्मा गांधी को कुलपहाड़ आने का निमंत्रण दिया था।
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नवंबर 1929 में गांधी जी कुलपहाड़ आए। यहां जनसभा की। कुलपहाड़ में आज भी गांधी चबूतरा बना है। गांधी जी ने कुलपहाड़ के खादी भंडार में रात गुजारी थी। गांधी जी के नेतृत्व में ही आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंका गया और देश को आजादी दिलाने के बाद ही समाप्त हुआ।
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वर्ष 1923 में कुलपहाड़ में प्रथम खादी भंडार की स्थापना की गई। वर्ष 1926 में जवाहरलाल नेहरू व आचार्य कृपलानी सुबह चार बजे मानिकपुर-झांसी ट्रेन से कुलपहाड़ रेलवे स्टेशन आए। स्टेशन से पैदल ही जंगल के बीच से होते हुए कुलपहाड़ पहुंचे। वहां पर खादी भंडार देखने के बाद 26 मील दूर राठ खादी भंडार तक पैदल रास्ता तय किया।
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डिस्ट्रिक बोर्ड के सदस्य मोटरसाइकिल से राठ जा रहे थे। अध्यक्ष ने धनीराम अरजरिया के निवेदन पर नेहरू जी को बाइक पर बैठा लिया और डरते-डरते राठ ले गए। वर्ष 1928 में बालेंदु कोंग्रेस के कलकत्ता में आयोजित अधिवेशन में शामिल होने गए थे। वहां पर महात्मा गांधी को कुलपहाड़ आने का निमंत्रण दिया था।
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नवंबर 1929 में गांधी जी कुलपहाड़ आए। यहां जनसभा की। कुलपहाड़ में आज भी गांधी चबूतरा बना है। गांधी जी ने कुलपहाड़ के खादी भंडार में रात गुजारी थी। गांधी जी के नेतृत्व में ही आजादी की लड़ाई का बिगुल फूंका गया और देश को आजादी दिलाने के बाद ही समाप्त हुआ।