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डीएम के गोद लिए गांव में दम तोड़ रहीं उम्मीदें
अमर उजाला ब्यूरो महोबा
Updated Sun, 12 Apr 2015 11:58 PM IST
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ओलावृष्टि और बारिश से हुई तबाही के बाद विकासखंड जैतपुर के ग्राम महुआ बांध में हर ओर बेबसी नजर आ रही है। पिछले वर्ष भी प्रकृति की मार झेल चुके किसानाें के चेहरे इस बार भी फसलें बर्बाद हो जाने से मायूस है। 80 फीसदी फसल बर्बाद हो जाने से दाने-दाने को मोहताज हुए किसान अब बीमा क्लेम और क्षतिपूर्ति धनराशि की बाट जोह रहे हैं।
भले ही जिलाधिकारी ने महुआ बांध गांव को गोद लिया हो। लेकिन प्रकृति की मार से बर्बाद हुए किसानाें के आंसू पोंछने और उनका दुख दर्द जानने की भी जहमत नहीं उठाई। जिससे किसानों को आज भी गांव में जिलाधिकारी के पहुंचने का इंतजार है। वहीं तमाम किसान परिवार के भरण पोषण और बेटियाें की शादी को पैसा जुटाने के लिए महानगरों की ओर पलायन की तैयारी में जुट गए हैं। जब जिलाधिकारी द्वारा गोद लिए गए गांव की यह दशा है तो अन्य गांवाें में बर्बादी से किसानों को कितने जख्म मिले और उनके जख्मों पर प्रशासन ने कितना मरहम लगाया, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
माह जनवरी 2015 में समाजवादी पेंशन की खुली बैठक में जाने के बाद जिलाधिकारी आज तक महुआ बांध गांव नहीं पहुंचे। प्रकृति की मार से उनके गोद लिए गए गांव में फसलाें का कितना नुकसान हुआ और वहां के किसानों तक कितनी मदद पहुंची, इसका डीएम ने स्थलीय निरीक्षण भी नहीं किया। डीएम के गांव न पहुंचने से किसानों में खासी निराशा है। खेतों में अन्न की पैदावार न होेने और खेती की लागत तक न निकल पाने से किसान अब रोटी के लिए मोहताज है। दो वक्त के भोजन की जुगाड़ करने के लिए या तो किसान मजदूरी का मन बना रहे हैं या फिर पलायन का। बच्चों की पढ़ाई और परवरिश से लेकर बेटियाें की शादी के अरमान संजोए किसान अब निराश हो चुके हैं।
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टूटे घराें में बसर कर रहे जिंदगी
ओलावृष्टि और बारिश से बर्बाद हुए किसानों की बदहाल दशा अब किसी से छिपी नहीं है। बीमा क्लेम और मुआवजे के दिए जा रहे आश्वासन अब किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं। गांव के किसान बाबू पुत्र चन्ना ने बताया कि उसने इस बार तीन बीघा खेत में चना और गेहूं की फसल बोई थी। गेहूं की फसल में तो लागत भी नहीं निकली। वहीं चने में दाना न होने पर उसे काटने के बजाए पशुआें को चरने के लिए छोड़ दिया है। फसल चौपट हो जाने से टूटे पड़े मकान की मरम्मत के लिए पैसा नहीं है। जिससे पत्नी और चार बेटों के साथ वह एक कच्ची अटारी में गुजर बसर कर रहा है। अब फसल की पुन: बुवाई की चिंता उसे खाए जा रही है।
मजदूरी कर करेंगे बेटियों की शादी
बेटियाें की शादी के लिए फसल से उम्मीद लगाए बैठे किसानों को मायूसी ही मिली। अब बेटियों की शादी के लिए किसान महानगरों की ओर पलायन कर मेहनत मजदूरी कर पैसा जुटाने की सोच रहे हैं। गांव के मधुसूदन की दो बेटियां हैं। वह कहता है कि बेटियां शादी के लायक हो गई हैं। अब खेती का कोई भरोसा नहीं है। इसलिए वह दिल्ली जाकर मेहनत मजदूरी कर बेटियों की शादी के लिए पैसा एकत्र करेगा। वहीं सरमन और शौकीलाल भी पलायन की तैयारी में लगे हैं।
कम पैदावार के चलते नहीं बनाए खलिहान
प्रकृति की मार से तबाह हुए किसानों को खेती लागत भी नसीब नहीं हुई। कभी अच्छी पैदावार देने वाले खेत इन दिनों दुर्दशा की कहानी बयां कर रहे हैं। गांव की लछिया कहती है कि उसने चार बीघा में चना और चार बीघा में गेहूं बोया था। चना केवल तीन बोरी निकला और एक बीघा में चार क्विंटल होने वाला गेहूं इस बार नौ क्विंटल ही निकला। वहीं फसलाें में कुछ न हासिल होने से तमाम किसानों ने खलिहान भी नहीं बनाए। किसानों का कहना है कि इतनी पैदावार ही नहीं हुई तो खलिहान बनाकर क्या करेंगे। इसलिए वे अपने घराें में ही फसल की मड़ाई कर रहे हैं।
सात किसानाें को मिला बीमे का लाभ
ग्राम महुआ बांध में किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने के बाद फसल बीमा का प्रीमियम कटवाने के बाद भी किसान खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। फसल में पैदावार न होने से निराश हुए किसान अब फसल बीमा का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि केसीसी बनवाने वाले गांव के 1300 किसानों में से अब तक सात किसानाें को ही फसल बीमा की धनराशि प्राप्त हुई है। वहीं बर्बाद हुई फसल का सर्वे करने के लिए अभी न तो बीमा कंपनी और न ही राजस्व विभाग की टीम आई है।
गांव पर एक नजर
आबादी- 4,444
किसान- 3,217
कृषि क्षेत्रफल - 4,600 एकड़
फसल का नुकसान- 80 फीसदी
बर्बाद फसलें- दलहन, तिलहन और गेहूं।
चुनाव की व्यस्तता के चलते गांव जाने का मौका नहीं मिला। अब चुनाव की व्यस्तता भी खत्म हो गई है। जिससे अब जल्द से जल्द गांव का दौरा कर किसानों का हाल चाल लेने जाऊंगा। किसानों को क्षतिपूर्ति धनराशि वितरित कराई जा रही है।
वीरेश्वर सिंह, जिलाधिकारी।
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भले ही जिलाधिकारी ने महुआ बांध गांव को गोद लिया हो। लेकिन प्रकृति की मार से बर्बाद हुए किसानाें के आंसू पोंछने और उनका दुख दर्द जानने की भी जहमत नहीं उठाई। जिससे किसानों को आज भी गांव में जिलाधिकारी के पहुंचने का इंतजार है। वहीं तमाम किसान परिवार के भरण पोषण और बेटियाें की शादी को पैसा जुटाने के लिए महानगरों की ओर पलायन की तैयारी में जुट गए हैं। जब जिलाधिकारी द्वारा गोद लिए गए गांव की यह दशा है तो अन्य गांवाें में बर्बादी से किसानों को कितने जख्म मिले और उनके जख्मों पर प्रशासन ने कितना मरहम लगाया, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
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माह जनवरी 2015 में समाजवादी पेंशन की खुली बैठक में जाने के बाद जिलाधिकारी आज तक महुआ बांध गांव नहीं पहुंचे। प्रकृति की मार से उनके गोद लिए गए गांव में फसलाें का कितना नुकसान हुआ और वहां के किसानों तक कितनी मदद पहुंची, इसका डीएम ने स्थलीय निरीक्षण भी नहीं किया। डीएम के गांव न पहुंचने से किसानों में खासी निराशा है। खेतों में अन्न की पैदावार न होेने और खेती की लागत तक न निकल पाने से किसान अब रोटी के लिए मोहताज है। दो वक्त के भोजन की जुगाड़ करने के लिए या तो किसान मजदूरी का मन बना रहे हैं या फिर पलायन का। बच्चों की पढ़ाई और परवरिश से लेकर बेटियाें की शादी के अरमान संजोए किसान अब निराश हो चुके हैं।
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टूटे घराें में बसर कर रहे जिंदगी
ओलावृष्टि और बारिश से बर्बाद हुए किसानों की बदहाल दशा अब किसी से छिपी नहीं है। बीमा क्लेम और मुआवजे के दिए जा रहे आश्वासन अब किसानों के जख्मों पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं। गांव के किसान बाबू पुत्र चन्ना ने बताया कि उसने इस बार तीन बीघा खेत में चना और गेहूं की फसल बोई थी। गेहूं की फसल में तो लागत भी नहीं निकली। वहीं चने में दाना न होने पर उसे काटने के बजाए पशुआें को चरने के लिए छोड़ दिया है। फसल चौपट हो जाने से टूटे पड़े मकान की मरम्मत के लिए पैसा नहीं है। जिससे पत्नी और चार बेटों के साथ वह एक कच्ची अटारी में गुजर बसर कर रहा है। अब फसल की पुन: बुवाई की चिंता उसे खाए जा रही है।
मजदूरी कर करेंगे बेटियों की शादी
बेटियाें की शादी के लिए फसल से उम्मीद लगाए बैठे किसानों को मायूसी ही मिली। अब बेटियों की शादी के लिए किसान महानगरों की ओर पलायन कर मेहनत मजदूरी कर पैसा जुटाने की सोच रहे हैं। गांव के मधुसूदन की दो बेटियां हैं। वह कहता है कि बेटियां शादी के लायक हो गई हैं। अब खेती का कोई भरोसा नहीं है। इसलिए वह दिल्ली जाकर मेहनत मजदूरी कर बेटियों की शादी के लिए पैसा एकत्र करेगा। वहीं सरमन और शौकीलाल भी पलायन की तैयारी में लगे हैं।
कम पैदावार के चलते नहीं बनाए खलिहान
प्रकृति की मार से तबाह हुए किसानों को खेती लागत भी नसीब नहीं हुई। कभी अच्छी पैदावार देने वाले खेत इन दिनों दुर्दशा की कहानी बयां कर रहे हैं। गांव की लछिया कहती है कि उसने चार बीघा में चना और चार बीघा में गेहूं बोया था। चना केवल तीन बोरी निकला और एक बीघा में चार क्विंटल होने वाला गेहूं इस बार नौ क्विंटल ही निकला। वहीं फसलाें में कुछ न हासिल होने से तमाम किसानों ने खलिहान भी नहीं बनाए। किसानों का कहना है कि इतनी पैदावार ही नहीं हुई तो खलिहान बनाकर क्या करेंगे। इसलिए वे अपने घराें में ही फसल की मड़ाई कर रहे हैं।
सात किसानाें को मिला बीमे का लाभ
ग्राम महुआ बांध में किसान क्रेडिट कार्ड बनवाने के बाद फसल बीमा का प्रीमियम कटवाने के बाद भी किसान खुद को ठगा सा महसूस कर रहे हैं। फसल में पैदावार न होने से निराश हुए किसान अब फसल बीमा का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन हकीकत यह है कि केसीसी बनवाने वाले गांव के 1300 किसानों में से अब तक सात किसानाें को ही फसल बीमा की धनराशि प्राप्त हुई है। वहीं बर्बाद हुई फसल का सर्वे करने के लिए अभी न तो बीमा कंपनी और न ही राजस्व विभाग की टीम आई है।
गांव पर एक नजर
आबादी- 4,444
किसान- 3,217
कृषि क्षेत्रफल - 4,600 एकड़
फसल का नुकसान- 80 फीसदी
बर्बाद फसलें- दलहन, तिलहन और गेहूं।
चुनाव की व्यस्तता के चलते गांव जाने का मौका नहीं मिला। अब चुनाव की व्यस्तता भी खत्म हो गई है। जिससे अब जल्द से जल्द गांव का दौरा कर किसानों का हाल चाल लेने जाऊंगा। किसानों को क्षतिपूर्ति धनराशि वितरित कराई जा रही है।
वीरेश्वर सिंह, जिलाधिकारी।