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डॉक्टरों का टोटा, स्वास्थ्य सेवाएं चरमराईं
ब्यूरो/ अमर उजाला, महोबा।
Updated Sun, 19 Apr 2015 12:06 AM IST
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उत्तर प्रदेश की सपा सरकार जिलों में बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने के लिए
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तरह-तरह के संसाधन और सुविधाएं देने की घोषणाएं कर रही हैं पर हकीकत में
ये सुविधाएं रोगी तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। जिला अस्पताल खुद ही अपनी
बीमारी से जूझ रहा है।
हालांकि यहां बेड की संख्या बढ़ाकर इसकी क्षमता 100 कर दी गई है लेकिन डॉक्टरों का अभी भी टोटा है।आज भी डॉक्टरों के पद खाली हैं। मैन पावर की कमी से जूझ रहे जिला अस्पताल के मरीजों को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
जिला अस्पताल है लेकिन यहां सुविधाएं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की भी नहीं हैं। एनेस्थीसिया का डॉक्टर न होने से जिला अस्पताल में दो-दो सर्जन हैं पर ऑपरेशन नहीं हो पाते हैं। मानक के अनुसार जिला अस्पताल में चिकित्सकाें के 25 पद स्वीकृत हैं।
जिसमें महज 14 डॉक्टर हैं। दो चिकित्सक अनुपस्थित चल रहे हैं। जबकि नौ चिकित्सकाें के पद खाली हैं। इसी प्रकार मानक के अनुसार फार्मासिस्ट के आठ पद होने चाहिए लेकिन केवल तीन फार्मासिस्ट हैं।
छह बैड पर एक नर्स होनी चाहिए लेकिन सौ बेड के जिला अस्पताल में महज तीन स्टाफ नर्स हैं। जबकि कम से कम 16 स्टाफ नर्स होना जरूरी है।
दस वार्ड ब्वाय के बजाय दो से काम चलाया जा रहा है। कुल मिलाकर चिकित्सकों, फार्मासिस्टों और स्टाफ नर्सों की भारी कमी से रोगियों को दिक्कत हो रही है। गंभीर मरीजाें को मेडिकल कॉलेज झांसी रेफर कर दिया जाता है।
अस्पताल में नाक, कान, गले के डॉक्टर भी न होने से छोटे मोटे ऑपरेशन नहीं हो रहे हैं। मरीजाें को मामूली ऑपरेशन या उपचार के लिए पड़ोसी राज्य के छतरपुर या फिर झांसी व कानपुर जाना पड़ता है। इसी तरह चर्म रोग का डॉक्टर नहीं है। जिससे यहां के लोगों को जन और धन का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
जिला अस्पताल की ध्वस्त स्वास्थ्य सेवा के चलते निजी क्लीनिक चला रहे संचालक इसका फायदा उठा रहे हैं। मरीज भारी धनराशि खर्च कर प्राइवेट चिकित्सकाें से उपचार करा रहे हैं। आए दिन प्राइवेट क्लीनिकाें में रोगियाें के अच्छी संख्या में पहुंचने से प्राइवेट चिकित्सकाें की चांदी है।
डॉ. उदयबीर सिंह, सीएमएस ने कहा कि जिला अस्पताल में चिकित्सकों की कमी और सीमित संसाधनों की वजह से मजबूरी में काम चलाया जा रहा है। शासन से चिकित्सकाें के रिक्त पदों को न भरे जाने से यह समस्या है। फिर भी कम चिकित्सकों से ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने का प्रयास कर रहे हैं।
हालांकि यहां बेड की संख्या बढ़ाकर इसकी क्षमता 100 कर दी गई है लेकिन डॉक्टरों का अभी भी टोटा है।आज भी डॉक्टरों के पद खाली हैं। मैन पावर की कमी से जूझ रहे जिला अस्पताल के मरीजों को पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
जिला अस्पताल है लेकिन यहां सुविधाएं सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र की भी नहीं हैं। एनेस्थीसिया का डॉक्टर न होने से जिला अस्पताल में दो-दो सर्जन हैं पर ऑपरेशन नहीं हो पाते हैं। मानक के अनुसार जिला अस्पताल में चिकित्सकाें के 25 पद स्वीकृत हैं।
जिसमें महज 14 डॉक्टर हैं। दो चिकित्सक अनुपस्थित चल रहे हैं। जबकि नौ चिकित्सकाें के पद खाली हैं। इसी प्रकार मानक के अनुसार फार्मासिस्ट के आठ पद होने चाहिए लेकिन केवल तीन फार्मासिस्ट हैं।
छह बैड पर एक नर्स होनी चाहिए लेकिन सौ बेड के जिला अस्पताल में महज तीन स्टाफ नर्स हैं। जबकि कम से कम 16 स्टाफ नर्स होना जरूरी है।
दस वार्ड ब्वाय के बजाय दो से काम चलाया जा रहा है। कुल मिलाकर चिकित्सकों, फार्मासिस्टों और स्टाफ नर्सों की भारी कमी से रोगियों को दिक्कत हो रही है। गंभीर मरीजाें को मेडिकल कॉलेज झांसी रेफर कर दिया जाता है।
अस्पताल में नाक, कान, गले के डॉक्टर भी न होने से छोटे मोटे ऑपरेशन नहीं हो रहे हैं। मरीजाें को मामूली ऑपरेशन या उपचार के लिए पड़ोसी राज्य के छतरपुर या फिर झांसी व कानपुर जाना पड़ता है। इसी तरह चर्म रोग का डॉक्टर नहीं है। जिससे यहां के लोगों को जन और धन का नुकसान उठाना पड़ रहा है।
जिला अस्पताल की ध्वस्त स्वास्थ्य सेवा के चलते निजी क्लीनिक चला रहे संचालक इसका फायदा उठा रहे हैं। मरीज भारी धनराशि खर्च कर प्राइवेट चिकित्सकाें से उपचार करा रहे हैं। आए दिन प्राइवेट क्लीनिकाें में रोगियाें के अच्छी संख्या में पहुंचने से प्राइवेट चिकित्सकाें की चांदी है।
डॉ. उदयबीर सिंह, सीएमएस ने कहा कि जिला अस्पताल में चिकित्सकों की कमी और सीमित संसाधनों की वजह से मजबूरी में काम चलाया जा रहा है। शासन से चिकित्सकाें के रिक्त पदों को न भरे जाने से यह समस्या है। फिर भी कम चिकित्सकों से ही बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं देने का प्रयास कर रहे हैं।