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गांव लौटे श्रमिक अस्पताल के काट रहे चक्कर, जागरूक लोगों के खौफ से घरों में नहीं घुस पा रहे
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जिला अस्पताल में जांच के लिए लगी श्रमिकों की लंबी कतार
- फोटो : MAHOBA
खरेला (महोबा)। कोरोना के कारण गांव लौटे सैकड़ों श्रमिक जांच के लिए परेशान हैं। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और थाने के चक्कर लगा रहे हैं। पीएचसी स्तर पर जांच की सुविधा न होने से मुख्यालय जाने के लिए लॉकडाउन की समस्या आड़े आ रही है। वहीं जागरूक लोगों के खौफ से घरों में नहीं घुस पा रहे हैं।
खरेला में कस्बा और 22 गांव के करीब तीन सौ से अधिक श्रमिक गांव की सीमा तक आ गए हैं, लेकिन जांच के पचड़े में फंसकर घरों में नहीं घुस पा रहे है। सीमा पर तैनात पुलिस ने रविवार को उनकी सूची बनाकर सोमवार को जांच कराने की बात कहकर जाने को कहा।
ग्राम बारी, पड़ोरा, कुआं, खरेला आदि गांवों के श्रमिकों के पहुंचते ही जागरूक लोगों ने रोक लिया और गांव के बाहर ही उनके रुकने की व्यवस्था कराई। सोमवार की सुबह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खरेला पहुंचे श्रमिकों को जांच की कोई व्यवस्था नहीं मिली। तब उन्हें जिला अस्पताल जाने की बात कही गई। वाहन न मिलने से श्रमिक जांच के लिए इधर उधर भटकते रहे।
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अस्पताल में लगी 200 मीटर लंबी लाइन
महोबा। महानगरों से लौटे श्रमिकों को जांच कराने के लिए भारी दिक्कत हो रही है। जिला अस्पताल में जांच के लिए सुबह से ही लंबी कतार लग रही है। एक एक मीटर के फासले में खड़े श्रमिकों की लाइन रोडवेज बस स्टैंड तक लगी रही। घंटों इंतजार के बाद श्रमिकों का जांच के लिए नंबर आ सका। इस दौरान कुछ समाजसेवियों ने भूखे प्यासे जांच के लिए लगे लोगों को लंच पैकेट व पानी की व्यवस्था कराई। तीखी धूप के बीच लोग जांच कराने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते रहे।
सपने में नहीं सोचा था इतना मुश्किल होगा लौटना
महोबा। पूरे देश में चल रहे लॉकडाउन और वाहन न मिलने पर घरों के लिए पैदल निकले लोगों से बात करने पर वह नाराज हो जाते हैं। पांच-पांच दिन से भूखे पैदल चल रहे श्रमिकों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जहां वह दो वक्त की रोटी कमाने के लिए जा रहे हैं। वहां से लौटना इतना कठिन होगा। कुछ ऐसी ही दुश्वारियों के बीच दिल्ली से पैदल चलकर घर लौटे बालेंद्र ने दास्तां बताई तो उसकी आंखें भर आईं।
कालीपहाड़ी गांव निवासी बालेंद्र कुमार मेहनत-मजदूरी की तलाश में दिल्ली गया था। तीन माह तक काम किया। 10 दिन पहले कोरोना के संक्रमण को लेकर लॉकडाउन हुआ। घर से दिन में कई बार फोन आते रहे कि देश में महामारी फैल रही है जल्दी घर आओ लेकिन कोई साधन नहीं मिला। जब कुछ लोगों को पैदल जाते देखा तो खुद भी पैदल चलने की ठानी। जीवन में पहली बार कभी इतना पैदल चला। 100 किमी तक पैदल चलने के बाद कुछ भी नहीं खाया। रास्ते में किसी ने जलपान तो किसी ने पैकेट मुहैया कराया तो शरीर में कुछ ऊर्जा आई। फिर आगे के लिए चल दिए। सात दिन तक सोया नहीं। बस आंखों के सामने घर कब पहुंचेंगे, यही चिंता रही। महोबा आकर सुकून मिला, अब एक कदम रखना भी भारी पड़ रहा है।
रिवाई गांव निवासी भुवानीदीन छह माह पहले दिल्ली मजदूरी करने गया था। लॉकडाउन होने के बाद कामधाम न मिलने पर वह घर आने के लिए परेशान हो गया। कोई वाहन न मिलने पर दिल्ली से कुछ साथियों के साथ पैदल निकल पड़ा। एक सप्ताह तक लगातार पैदल चलने के बाद वह पूरी तरह थक गया। पैर लाल पड़ गए। भूखे-प्यासे दिनरात चलने के बाद थोड़ा बहुत उसे रास्ते में लंच पैकेट मिला। इसके बाद फिर रफ्तार बढ़ाई। महोबा के नजदीक आने के बाद कुछ भी पूछने पर झल्ला उठे। काफी कुरेदने के बाद बोला 550 किमी चलने के बाद पूरा शरीर जवाब दे गया है। नाराजगी के कारण भकुवानीदीन के साथ आ रहे किसी भी लोगों ने भोजन नहीं किया। उनका कहना है कि छोटे-छोटे बच्चों का रोना और चीखना-चिल्लाना बर्दाश्त नहीं हुआ, लेकिन किसी को रहम नहीं आया।
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खरेला में कस्बा और 22 गांव के करीब तीन सौ से अधिक श्रमिक गांव की सीमा तक आ गए हैं, लेकिन जांच के पचड़े में फंसकर घरों में नहीं घुस पा रहे है। सीमा पर तैनात पुलिस ने रविवार को उनकी सूची बनाकर सोमवार को जांच कराने की बात कहकर जाने को कहा।
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ग्राम बारी, पड़ोरा, कुआं, खरेला आदि गांवों के श्रमिकों के पहुंचते ही जागरूक लोगों ने रोक लिया और गांव के बाहर ही उनके रुकने की व्यवस्था कराई। सोमवार की सुबह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र खरेला पहुंचे श्रमिकों को जांच की कोई व्यवस्था नहीं मिली। तब उन्हें जिला अस्पताल जाने की बात कही गई। वाहन न मिलने से श्रमिक जांच के लिए इधर उधर भटकते रहे।
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अस्पताल में लगी 200 मीटर लंबी लाइन
महोबा। महानगरों से लौटे श्रमिकों को जांच कराने के लिए भारी दिक्कत हो रही है। जिला अस्पताल में जांच के लिए सुबह से ही लंबी कतार लग रही है। एक एक मीटर के फासले में खड़े श्रमिकों की लाइन रोडवेज बस स्टैंड तक लगी रही। घंटों इंतजार के बाद श्रमिकों का जांच के लिए नंबर आ सका। इस दौरान कुछ समाजसेवियों ने भूखे प्यासे जांच के लिए लगे लोगों को लंच पैकेट व पानी की व्यवस्था कराई। तीखी धूप के बीच लोग जांच कराने के लिए अपनी बारी का इंतजार करते रहे।
सपने में नहीं सोचा था इतना मुश्किल होगा लौटना
महोबा। पूरे देश में चल रहे लॉकडाउन और वाहन न मिलने पर घरों के लिए पैदल निकले लोगों से बात करने पर वह नाराज हो जाते हैं। पांच-पांच दिन से भूखे पैदल चल रहे श्रमिकों ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि जहां वह दो वक्त की रोटी कमाने के लिए जा रहे हैं। वहां से लौटना इतना कठिन होगा। कुछ ऐसी ही दुश्वारियों के बीच दिल्ली से पैदल चलकर घर लौटे बालेंद्र ने दास्तां बताई तो उसकी आंखें भर आईं।
कालीपहाड़ी गांव निवासी बालेंद्र कुमार मेहनत-मजदूरी की तलाश में दिल्ली गया था। तीन माह तक काम किया। 10 दिन पहले कोरोना के संक्रमण को लेकर लॉकडाउन हुआ। घर से दिन में कई बार फोन आते रहे कि देश में महामारी फैल रही है जल्दी घर आओ लेकिन कोई साधन नहीं मिला। जब कुछ लोगों को पैदल जाते देखा तो खुद भी पैदल चलने की ठानी। जीवन में पहली बार कभी इतना पैदल चला। 100 किमी तक पैदल चलने के बाद कुछ भी नहीं खाया। रास्ते में किसी ने जलपान तो किसी ने पैकेट मुहैया कराया तो शरीर में कुछ ऊर्जा आई। फिर आगे के लिए चल दिए। सात दिन तक सोया नहीं। बस आंखों के सामने घर कब पहुंचेंगे, यही चिंता रही। महोबा आकर सुकून मिला, अब एक कदम रखना भी भारी पड़ रहा है।
रिवाई गांव निवासी भुवानीदीन छह माह पहले दिल्ली मजदूरी करने गया था। लॉकडाउन होने के बाद कामधाम न मिलने पर वह घर आने के लिए परेशान हो गया। कोई वाहन न मिलने पर दिल्ली से कुछ साथियों के साथ पैदल निकल पड़ा। एक सप्ताह तक लगातार पैदल चलने के बाद वह पूरी तरह थक गया। पैर लाल पड़ गए। भूखे-प्यासे दिनरात चलने के बाद थोड़ा बहुत उसे रास्ते में लंच पैकेट मिला। इसके बाद फिर रफ्तार बढ़ाई। महोबा के नजदीक आने के बाद कुछ भी पूछने पर झल्ला उठे। काफी कुरेदने के बाद बोला 550 किमी चलने के बाद पूरा शरीर जवाब दे गया है। नाराजगी के कारण भकुवानीदीन के साथ आ रहे किसी भी लोगों ने भोजन नहीं किया। उनका कहना है कि छोटे-छोटे बच्चों का रोना और चीखना-चिल्लाना बर्दाश्त नहीं हुआ, लेकिन किसी को रहम नहीं आया।