खाली पड़े खेतों में तुलसी की खेती करें किसान- अनीस

Mahoba Updated Fri, 04 May 2012 12:00 PM IST
महोबा। जिला उद्यान अधिकारी अनीस कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि जिले के किसानों द्वारा आलसी पृवत्ति और जागरूकता के अभाव में उन्नत तकनीक की फसलें न लेने के कारण खेती किसानी से मोह भंग होता जा रहा है जबकि कम समय और कम लागत में जिले का किसान तीन माह में ही खुशहाल हो सकता है बशर्ते वह पूर्णतय: खेती किसानी के प्रति समर्पण भाव के साथ काम करे।
गुरुवार को श्री श्रीवास्तव विकास भवन में ग्रामीण क्षेत्रों से आए किसानों की टीम को रबी की फसल के बाद खाली पड़े खेतों के उपयोग के बारे में आयोजित बैठक में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि जिले के किसान भी पंजाब और हरियाणा की तरह कम लागत और कम समय में खाली पड़े खेतों का सही उपयोग कर मात्र तीन माह में ही प्रति एकड़ 25 हजार रुपए तक कमा सकते हैं। बशर्ते उसके अंदर काम के प्रति समर्पण की भावना हो और समय-समय पर फसल की देखरेख कर सके। उन्होंने कहा कि इस समय खेत खाली पड़े हैं। किसानों को चाहिए कि एक एकड़ में तुलसी के सौ ग्राम बीज डालकर तीन माह में फसल को तैयार करें। इसमें केवल एक पानी की ही जरूरत है। जुलाई में बरसात होने पर दोबारा पानी नहीं देना पड़ता। तुलसी की पत्ती और तेल की बिक्री से 25 हजार रुपए का लाभ किसान को होता है। खेत से ही मशहूर कंपनी आरगैनिक इंडिया पत्ती खरीदती है तो डाबर कंपनी इसका तेल खरीदती है। इसमें बहुत कम लागत आती है। पनवाड़ी विकास खंड के ग्राम दिदवारा में इसका प्लांट भी लगा है। इसी प्रकार जून से सितंबर के बीच सूरजमुखी की खेती यहां आसानी से हो सकती है। इसकी लागत भी अन्य फसलों से बहुत ही कम होती है। इससे एक एकड़ में 40-50 हजार रुपए तक कमा सकते हैं।
बिना लागत के औषधीय कच्चे माल के संग्रहण के बारे में जिला उद्यान अधिकारी ने बताया कि आजकल नीम की निबौली बहुत अधिक निकल रही है। खाली समय में किसान यदि केवल इन नीम की निबौलियों का संग्रहण ही कर ले तो इसे नौ सौ रुपए प्रति कुंतल में बेंचा जा सकता है। इसी प्रकार अकौआ के फल हर जंगल और सड़क किनारे फालतू जमीन पर गर्मियों में मिल जाते हैं। इन्हें तोड़कर बेचने से अच्छा लाभ कमाया जा सकता है। डाबर कंपनी अकौआ के फल प्रति वर्ष लोगों से पचास टन खरीदती है और इस कंपनी के प्रतिनिधि घर से ही निबौली भी खरीद कर ले जाते हैं। पिपरमिंट की खेती के बारे में उन्होंने बताया कि यह फसल यहां की जलवायु के हिसाब से उपयुक्त नहीं है साथ ही खेत की उर्वरा शक्ति भी समाप्त हो जाती है ऐसी स्थिति में इसकी खेती से हमें बचना चाहिए जहां पानी की बहुतायत मात्रा होती है वहीं पिपरमिंट की खेती संभव होती है। इस मौके पर किसान नीरज उपाध्याय, भारत सिंह, मुकेश पाठक, रवींद्र, कुलदीप महराज, मूरत पाठक, महीपत आदि मौजूद रहे।

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