{"_id":"6a29c29edc7e65aa66091774","slug":"tourism-prospects-soar-following-the-identification-of-the-kushan-era-khadkhoda-mound-maharajganj-news-c-206-1-go11002-179001-2026-06-11","type":"story","status":"publish","title_hn":"Maharajganj News: कुषाणकालीन खड़खोड़ा टीले को मिले पहचान से पर्यटन भावनाओं को लगे पंख","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
Maharajganj News: कुषाणकालीन खड़खोड़ा टीले को मिले पहचान से पर्यटन भावनाओं को लगे पंख
विज्ञापन
बृजमनगंज ब्लॉक स्थित टीले पर 26 वर्ष पहले पड़ी थी प्रशासन की नजर
2025 में उत्खनन के आधार पर कुषाण कालीन साबित हुआ टीला
महराजगंज। बौद्ध सर्किट में शामिल जिलों के बीच कुषाणकालीन खड़खोड़ा टीले को पुरातत्व प्रमाण मिलने के बाद उक्त क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाओं का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर अभी इस दिशा में कोई तैयारी नहीं है। जबकि खड़खोड़ा के आसपास वन्य क्षेत्र का विस्तृत दायरा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मजबूत आधार बन सकता है।
सिद्धार्थनगर, लुंबिनी, सारनाथ और कुशीनगर बौद्ध सर्किट में शामिल प्रमुख जिले हैं। इनके बीच स्थित जनपद महराजगंज भी विशिष्टता समेटे हुए, लेकिन इस जनपद को बौद्ध सर्किट में शामिल अन्य जनपदों की तरह खास तवज्जो नहीं मिल सका, जबकि यह बुद्ध का ननिहाल माना जाता है। यहां चौक रेंज क्षेत्र में आने वाले रामग्राम स्तूप के बारे में लोगों की धारणा है कि बुद्ध के अस्थियों का कुछ भाग इस स्तूप में संरक्षित है। हालांकि मौजूदा समय में यहां कुछ पर्यटकीय सुविधाएं बढ़ रही हैं।
बृजमनगंज के खड़खोड़ा टीले की बात करें तो यह आद्रवन से सटे घोघी नदी व सिद्धार्थनगर के लोटन से सटा है। आद्रवन को पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा माना जाता। जवाहर लाल नेहरू पीजी कालेज के प्राचार्य प्रोफेसर अजय कुमार मिश्रा ने बताया कि पांडवों ने वनवास के दौरान का अज्ञातवास आद्रवर्षा वन में बिताया था। आद्रवन यही नेपाली हिमालय तलहटी का वन्य क्षेत्र है। ऐसे में यह वन्य क्षेत्र स्वत: ही पर्यटन के दृष्टिकोण से अपार संभावनाओं से भरा पड़ा है।
विज्ञापन
2025 में पुरातत्व विभाग ने कराया उत्खनन
बृजमनगंज ब्लॉक का खड़खोड़ा टीला सदियों से भीमकाय शिवलिंगों से आच्छादित था, लेकिन पहली बार प्रशासन की नजर इस टीले पर एसपी विजय कुमार के समय में गई। 2002-2003 के आसपास तैनात रहे पुलिस अधीक्षक विजय कुमार ने इस टीले का महत्व पहचाना और पुरातत्व विभाग को सूचना भेजी। अगले 20 वर्ष तक कभी-कभार अलग-अलग टीमों ने निरीक्षण किया। अगस्त 2025 में निदेशालय पुरातत्व टीम ने यहां पहुंचकर आसपास उत्खनन व शिवलिंग की कार्बन डेटिंग प्रक्रिया पूरी कराई जिससे शिवलिंग 11 वीं शताब्दी व मिला मृदभांड कुषाण काल का साबित करते हुए विभाग ने इस टीले को संरक्षण सूची का हिस्सा बनाने की कवायद शुरू की। टीले की इस विशिष्ट पहचान मिल जाने पर पर्यटन दृष्टिकोण से तमाम विकास कार्य कराए जा सकते, लेकिन फिलहाल अभी इस दिशा में कोई सार्थक कदम स्थानीय प्रशासन की तरफ से नहीं उठाया गया और न ही ऐसी कोई तैयारी ही है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी किताब में किया है जिक्र
पीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर अजय कुमार मिश्रा के मुताबिक हर्षवर्धन के शासन काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत की यात्रा की। 630 ईस्वी में वह पैदल चलकर भारत आया और 645 ईस्वी में वापस लौटा। इसने अपनी यात्रा वृत्त किताब सी-यू-की जिसे पश्चिम का वृत्तांत कहा जाता उसमें इस आद्रवन का उल्लेख है। ऐसे में महराजगंज जनपद विविधताओं व ऐतिहासिकता को समेटे पर्यटन की अपार संभावना का जनपद है।
स्पीकअप
खड़खोड़ा टीला की जब विशिष्ट पहचान तय हो गई तो इसे संरक्षित कर पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन को प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से स्थानीय क्षेत्र में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ेगी और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
-मंजेश कुमार सिंह, निवासी खड़खोड़ा।
खड़खोड़ा टीला आबादी से दूर है इसलिए यहां आवाजाही विशेष नहीं रहती है। दिन में कभी कभार चरवाहे ही जाते हैं। टीले के आसपास सांप इत्यादि दिखते रहते हैं। ऐसे में टीला जैसे पहले था उसी तरह आज भी बरकरार है। टीले के आसपास सिलापट्ट लगाकर पर्यटन बढ़ावा देने से युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे।
-सुनील सिंह, खड़खोड़ा।
-- -- -- -- -- -- -
खड़खोड़ा क्षेत्र में पर्यटन के लिहाज से क्या कुछ हो सकता इसकी रिपोर्ट तब तैयार होगी जब टीला पुरातत्व विभाग अपने संरक्षण में लेने की प्रक्रिया पूरी कर लेगा। अभी संरक्षित कराना ही प्राथमिकता है।
-महेन्द्र कुमार सिंह, सीडीओ, महराजगंज।
-- -- -- -
खड़खोड़ा टीला विभागीय संरक्षण में लिया जाएगा। शीघ्र ही स्थानीय प्रशासन से संपर्क करते हुए टीले का सीमांकन व बाउंड्री इत्यादि निर्मित कराकर सुरक्षा दायरा मजबूत किया जाएगा। पर्यटन विकास स्थानीय प्रशासन का विषय है।
-कृष्ण मोहन दुबे, सहायक क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी गोरखपुर
विज्ञापन
2025 में उत्खनन के आधार पर कुषाण कालीन साबित हुआ टीला
महराजगंज। बौद्ध सर्किट में शामिल जिलों के बीच कुषाणकालीन खड़खोड़ा टीले को पुरातत्व प्रमाण मिलने के बाद उक्त क्षेत्र में पर्यटन की अपार संभावनाओं का रास्ता साफ हुआ है। हालांकि प्रशासनिक स्तर पर अभी इस दिशा में कोई तैयारी नहीं है। जबकि खड़खोड़ा के आसपास वन्य क्षेत्र का विस्तृत दायरा पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए मजबूत आधार बन सकता है।
सिद्धार्थनगर, लुंबिनी, सारनाथ और कुशीनगर बौद्ध सर्किट में शामिल प्रमुख जिले हैं। इनके बीच स्थित जनपद महराजगंज भी विशिष्टता समेटे हुए, लेकिन इस जनपद को बौद्ध सर्किट में शामिल अन्य जनपदों की तरह खास तवज्जो नहीं मिल सका, जबकि यह बुद्ध का ननिहाल माना जाता है। यहां चौक रेंज क्षेत्र में आने वाले रामग्राम स्तूप के बारे में लोगों की धारणा है कि बुद्ध के अस्थियों का कुछ भाग इस स्तूप में संरक्षित है। हालांकि मौजूदा समय में यहां कुछ पर्यटकीय सुविधाएं बढ़ रही हैं।
विज्ञापन
बृजमनगंज के खड़खोड़ा टीले की बात करें तो यह आद्रवन से सटे घोघी नदी व सिद्धार्थनगर के लोटन से सटा है। आद्रवन को पांडवों के अज्ञातवास से जुड़ा माना जाता। जवाहर लाल नेहरू पीजी कालेज के प्राचार्य प्रोफेसर अजय कुमार मिश्रा ने बताया कि पांडवों ने वनवास के दौरान का अज्ञातवास आद्रवर्षा वन में बिताया था। आद्रवन यही नेपाली हिमालय तलहटी का वन्य क्षेत्र है। ऐसे में यह वन्य क्षेत्र स्वत: ही पर्यटन के दृष्टिकोण से अपार संभावनाओं से भरा पड़ा है।
विज्ञापन
2025 में पुरातत्व विभाग ने कराया उत्खनन
बृजमनगंज ब्लॉक का खड़खोड़ा टीला सदियों से भीमकाय शिवलिंगों से आच्छादित था, लेकिन पहली बार प्रशासन की नजर इस टीले पर एसपी विजय कुमार के समय में गई। 2002-2003 के आसपास तैनात रहे पुलिस अधीक्षक विजय कुमार ने इस टीले का महत्व पहचाना और पुरातत्व विभाग को सूचना भेजी। अगले 20 वर्ष तक कभी-कभार अलग-अलग टीमों ने निरीक्षण किया। अगस्त 2025 में निदेशालय पुरातत्व टीम ने यहां पहुंचकर आसपास उत्खनन व शिवलिंग की कार्बन डेटिंग प्रक्रिया पूरी कराई जिससे शिवलिंग 11 वीं शताब्दी व मिला मृदभांड कुषाण काल का साबित करते हुए विभाग ने इस टीले को संरक्षण सूची का हिस्सा बनाने की कवायद शुरू की। टीले की इस विशिष्ट पहचान मिल जाने पर पर्यटन दृष्टिकोण से तमाम विकास कार्य कराए जा सकते, लेकिन फिलहाल अभी इस दिशा में कोई सार्थक कदम स्थानीय प्रशासन की तरफ से नहीं उठाया गया और न ही ऐसी कोई तैयारी ही है।
चीनी यात्री ह्वेनसांग ने अपनी किताब में किया है जिक्र
पीजी कॉलेज के प्राचार्य प्रोफेसर अजय कुमार मिश्रा के मुताबिक हर्षवर्धन के शासन काल में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भारत की यात्रा की। 630 ईस्वी में वह पैदल चलकर भारत आया और 645 ईस्वी में वापस लौटा। इसने अपनी यात्रा वृत्त किताब सी-यू-की जिसे पश्चिम का वृत्तांत कहा जाता उसमें इस आद्रवन का उल्लेख है। ऐसे में महराजगंज जनपद विविधताओं व ऐतिहासिकता को समेटे पर्यटन की अपार संभावना का जनपद है।
स्पीकअप
खड़खोड़ा टीला की जब विशिष्ट पहचान तय हो गई तो इसे संरक्षित कर पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन को प्रयास करना चाहिए। ऐसा करने से स्थानीय क्षेत्र में पर्यटकों की आवाजाही बढ़ेगी और स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर भी बढ़ेंगे।
-मंजेश कुमार सिंह, निवासी खड़खोड़ा।
खड़खोड़ा टीला आबादी से दूर है इसलिए यहां आवाजाही विशेष नहीं रहती है। दिन में कभी कभार चरवाहे ही जाते हैं। टीले के आसपास सांप इत्यादि दिखते रहते हैं। ऐसे में टीला जैसे पहले था उसी तरह आज भी बरकरार है। टीले के आसपास सिलापट्ट लगाकर पर्यटन बढ़ावा देने से युवाओं को रोजगार के अवसर मिलेंगे।
-सुनील सिंह, खड़खोड़ा।
खड़खोड़ा क्षेत्र में पर्यटन के लिहाज से क्या कुछ हो सकता इसकी रिपोर्ट तब तैयार होगी जब टीला पुरातत्व विभाग अपने संरक्षण में लेने की प्रक्रिया पूरी कर लेगा। अभी संरक्षित कराना ही प्राथमिकता है।
-महेन्द्र कुमार सिंह, सीडीओ, महराजगंज।
खड़खोड़ा टीला विभागीय संरक्षण में लिया जाएगा। शीघ्र ही स्थानीय प्रशासन से संपर्क करते हुए टीले का सीमांकन व बाउंड्री इत्यादि निर्मित कराकर सुरक्षा दायरा मजबूत किया जाएगा। पर्यटन विकास स्थानीय प्रशासन का विषय है।
-कृष्ण मोहन दुबे, सहायक क्षेत्रीय पुरातत्व अधिकारी गोरखपुर