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जिन पर है पोषण का जिम्मा, वे खुद कुपोषण का शिकार
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जिन पर है पोषण का जिम्मा, वे खुद कुपोषण का शिकार
कहीं टूटा है फर्श तो कहीं भवन हो चुका है जर्जर
बारिश में टपकता है छत, न शौचालय है न शुद्ध पेयजल की व्यवस्था
संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। सरकार ने भले ही आंगनबाड़ी केंद्रों को प्ले स्कूल के रूप में विकसित करने का निर्देश जारी कर दिया है, लेकिन जमीनी हकीकत इस बात की इजाजत नहीं देते। जिले के जिस क्षेत्र पर नजर डालें आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति बदहाल नजर आती है। कहीं केंद्र के पास अपना भवन नहीं है तो कहीं कार्यकर्ता अपने घर में केंद्र चलाती हैं। केंद्र में बच्चे जमीन पर बैठकर कुछ सीखने की कोशिश करते हैं पर कई जगह फर्श भी टूटे हैं। इन केंद्रों पर बच्चों को अक्षर ज्ञान देने के साथ ही उनके पोषण का भी जिम्मा है, लेकिन अधिकांश केंद्र खुद कुपोषित नजर आते हैं।
निचलौल क्षेत्र के आंगनबाड़ी केंद्रों पर नजर डालें तो कागजों में कुछ और तो धरातल पर कुछ और देखने को मिलता है। दुश्वारियां तमाम हैं और सुधार की उम्मीद कम। जिम्मेदारों की उदासीनता ने इन केंद्रों की कमर तोड़ रखी है और जब केंद्र बदहाल हों तो बच्चों की संख्या अधिक होना लाजमी नहीं लगता। क्षेत्र में जैसे-तैसे केंद्र का संचालन हो रहा है, लेकिन रजिस्टर में दर्ज बच्चों के सापेक्ष आने वाले बच्चों की संख्या काफी कम है। कहीं बारिश में छत टपकता है तो कहीं बोर्ड लगाकर छोड़ दिया गया है। विद्युत कनेक्शन कराने के लिए जिम्मेदार गंभीर नहीं है।
अरदौना गांव के प्रथम केंद्र पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कमला श्रीवास्तव तथा सहायिका शनिचरा की तैनाती है। शुक्रवार को दिन में 12 बजे केंद्र पर सहायिका मौजूद मिलीं। केंद्र पर महज चार बच्चे मौजूद थेे। सहायिका की सूचना पर कुछ देर बाद केंद्र पर पहुंची आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कमला ने बताया कि केंद्र पर कुल 56 बच्चों का रजिस्ट्रेशन है। कहा कि केंद्र पर थोड़ी दिक्कत है। बारिश में छत टपकता है। खिड़कियां टूट चुकी हैं। बच्चों को प्रत्येक माह विभाग से मिलने वाली दाल और तेल का वितरण किया जाता है। लेकिन गांव के लोगों ने जो कहानी बयां कि वह कार्यकर्ता की बातों में मेल नहीं खाते। अनिल, पंचू और इंद्रजीत ने कहा कि केंद्र पर बच्चे पहुंचते ही नहीं। कभी कभार दो-चार बच्चे दिख जाते हैं। दाल और तेल भी कभी कभार ही मिलता है। आंगनबाड़ी केेंद्र द्वितीय अरदौना का भवन जर्जर हो चुका है। यह भवन अब बस नाम का रह गया है। यहां के बच्चों को प्रथम केंद्र पर ही पढ़ाया जाता है।
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मोजरी : यहां भी सुब कुछ ठीक नहीं
मोजरी गांव के आंगनबाड़ी केंद्र पर दो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता शकुंतला और गीता की तैनाती है। इनके अलावा केंद्र पर एक सहायिका संगीता की भी तैनाती है। सुबह 11:30 बजे केंद्र पर मौजूद शकुंतला ने कहा कि केंद्र पर कुल 53 बच्चे पंजीकृत हैं। केंद्र पर कुछ बच्चे पढ़ते भी दिखे। हां, संख्या पूरी नहीं थी। शकुंतला ने बताया कि पहले प्राथमिक विद्यालय के एक कमरे में आंगनबाड़ी केंद्र का संचालन होता था, लेकिन इस वर्ष से नए आंगनबाड़ी भवन में केंद्र का संचालन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बच्चों को पोषण सामग्री दी जाती है। गांव के अनिल की बच्ची शिवांगी का नामांकन केंद्र पर है। उन्होंने कहा कि पोषण सामग्री नियमित नहीं मिलती। किसी महीने बच्चों को दाल, तेल मिलता है तो कभी केंद्र खुलता ही नहीं। केंद्र पर स्टाफ के लिए न तो शौचालय की व्यवस्था हैं और न ही स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है। बिजली का सिर्फ बोर्ड लगाकर छोड़ दिया गया है। कनेक्शन नहीं है।
केंद्रों की स्थिति एक नजर में
आंगनबाड़ी केंद्र- 296
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता-296
सहायिका-260
सुपरवाइजर-2
अतिकुपोषित बच्चे-865
कुपोषित बच्चे-3600
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आंगनबाड़ी केंद्रों पर पंजीकृत सभी बच्चों के लिए खाद्यान्न आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दिया जाता है। अगर गड़बड़ी हो रही है तो केंद्रों की जांच कर जवाब तलब किया जाएगा। बदहाल केंद्र को मरम्मत कराने के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र भेजा गया है। रकम मिलते ही केंद्रों का मरम्मत करा दिया जाएगा।
मनोज कुमार शुक्ला, सीडीपीओ, निचलौल
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आंगनबाड़ी केंद्र के लिए यह होता है मानक
सीडीपीओ मनोज कुमार शुक्ला ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना के लिए सामान्य दिशा-निर्देश जनसंख्या मानकों पर आधारित है। आमतौर पर ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में 400-800 जनसंख्या पर एक आंगनबाड़ी केंद्र खोला जाता है और उसके बाद जनसंख्या अधिक होने पर 800 के गुणांक में एक और केंद्र खोला जा सकता है। इसके अलावा दूरदराज और कम आबादी वाले क्षेत्रों में लघु आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना का भी प्रावधान है। इन केंद्रों के सुगम संचालन और देखरेख के लिए प्रत्येक केंद्र में एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति की जाती है।
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कहीं टूटा है फर्श तो कहीं भवन हो चुका है जर्जर
बारिश में टपकता है छत, न शौचालय है न शुद्ध पेयजल की व्यवस्था
संवाद न्यूज एजेंसी
महराजगंज। सरकार ने भले ही आंगनबाड़ी केंद्रों को प्ले स्कूल के रूप में विकसित करने का निर्देश जारी कर दिया है, लेकिन जमीनी हकीकत इस बात की इजाजत नहीं देते। जिले के जिस क्षेत्र पर नजर डालें आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थिति बदहाल नजर आती है। कहीं केंद्र के पास अपना भवन नहीं है तो कहीं कार्यकर्ता अपने घर में केंद्र चलाती हैं। केंद्र में बच्चे जमीन पर बैठकर कुछ सीखने की कोशिश करते हैं पर कई जगह फर्श भी टूटे हैं। इन केंद्रों पर बच्चों को अक्षर ज्ञान देने के साथ ही उनके पोषण का भी जिम्मा है, लेकिन अधिकांश केंद्र खुद कुपोषित नजर आते हैं।
निचलौल क्षेत्र के आंगनबाड़ी केंद्रों पर नजर डालें तो कागजों में कुछ और तो धरातल पर कुछ और देखने को मिलता है। दुश्वारियां तमाम हैं और सुधार की उम्मीद कम। जिम्मेदारों की उदासीनता ने इन केंद्रों की कमर तोड़ रखी है और जब केंद्र बदहाल हों तो बच्चों की संख्या अधिक होना लाजमी नहीं लगता। क्षेत्र में जैसे-तैसे केंद्र का संचालन हो रहा है, लेकिन रजिस्टर में दर्ज बच्चों के सापेक्ष आने वाले बच्चों की संख्या काफी कम है। कहीं बारिश में छत टपकता है तो कहीं बोर्ड लगाकर छोड़ दिया गया है। विद्युत कनेक्शन कराने के लिए जिम्मेदार गंभीर नहीं है।
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अरदौना गांव के प्रथम केंद्र पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कमला श्रीवास्तव तथा सहायिका शनिचरा की तैनाती है। शुक्रवार को दिन में 12 बजे केंद्र पर सहायिका मौजूद मिलीं। केंद्र पर महज चार बच्चे मौजूद थेे। सहायिका की सूचना पर कुछ देर बाद केंद्र पर पहुंची आंगनबाड़ी कार्यकर्ता कमला ने बताया कि केंद्र पर कुल 56 बच्चों का रजिस्ट्रेशन है। कहा कि केंद्र पर थोड़ी दिक्कत है। बारिश में छत टपकता है। खिड़कियां टूट चुकी हैं। बच्चों को प्रत्येक माह विभाग से मिलने वाली दाल और तेल का वितरण किया जाता है। लेकिन गांव के लोगों ने जो कहानी बयां कि वह कार्यकर्ता की बातों में मेल नहीं खाते। अनिल, पंचू और इंद्रजीत ने कहा कि केंद्र पर बच्चे पहुंचते ही नहीं। कभी कभार दो-चार बच्चे दिख जाते हैं। दाल और तेल भी कभी कभार ही मिलता है। आंगनबाड़ी केेंद्र द्वितीय अरदौना का भवन जर्जर हो चुका है। यह भवन अब बस नाम का रह गया है। यहां के बच्चों को प्रथम केंद्र पर ही पढ़ाया जाता है।
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मोजरी : यहां भी सुब कुछ ठीक नहीं
मोजरी गांव के आंगनबाड़ी केंद्र पर दो आंगनबाड़ी कार्यकर्ता शकुंतला और गीता की तैनाती है। इनके अलावा केंद्र पर एक सहायिका संगीता की भी तैनाती है। सुबह 11:30 बजे केंद्र पर मौजूद शकुंतला ने कहा कि केंद्र पर कुल 53 बच्चे पंजीकृत हैं। केंद्र पर कुछ बच्चे पढ़ते भी दिखे। हां, संख्या पूरी नहीं थी। शकुंतला ने बताया कि पहले प्राथमिक विद्यालय के एक कमरे में आंगनबाड़ी केंद्र का संचालन होता था, लेकिन इस वर्ष से नए आंगनबाड़ी भवन में केंद्र का संचालन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि बच्चों को पोषण सामग्री दी जाती है। गांव के अनिल की बच्ची शिवांगी का नामांकन केंद्र पर है। उन्होंने कहा कि पोषण सामग्री नियमित नहीं मिलती। किसी महीने बच्चों को दाल, तेल मिलता है तो कभी केंद्र खुलता ही नहीं। केंद्र पर स्टाफ के लिए न तो शौचालय की व्यवस्था हैं और न ही स्वच्छ पेयजल उपलब्ध है। बिजली का सिर्फ बोर्ड लगाकर छोड़ दिया गया है। कनेक्शन नहीं है।
केंद्रों की स्थिति एक नजर में
आंगनबाड़ी केंद्र- 296
आंगनबाड़ी कार्यकर्ता-296
सहायिका-260
सुपरवाइजर-2
अतिकुपोषित बच्चे-865
कुपोषित बच्चे-3600
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आंगनबाड़ी केंद्रों पर पंजीकृत सभी बच्चों के लिए खाद्यान्न आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को दिया जाता है। अगर गड़बड़ी हो रही है तो केंद्रों की जांच कर जवाब तलब किया जाएगा। बदहाल केंद्र को मरम्मत कराने के लिए उच्चाधिकारियों को पत्र भेजा गया है। रकम मिलते ही केंद्रों का मरम्मत करा दिया जाएगा।
मनोज कुमार शुक्ला, सीडीपीओ, निचलौल
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आंगनबाड़ी केंद्र के लिए यह होता है मानक
सीडीपीओ मनोज कुमार शुक्ला ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना के लिए सामान्य दिशा-निर्देश जनसंख्या मानकों पर आधारित है। आमतौर पर ग्रामीण-शहरी क्षेत्रों में 400-800 जनसंख्या पर एक आंगनबाड़ी केंद्र खोला जाता है और उसके बाद जनसंख्या अधिक होने पर 800 के गुणांक में एक और केंद्र खोला जा सकता है। इसके अलावा दूरदराज और कम आबादी वाले क्षेत्रों में लघु आंगनबाड़ी केंद्रों की स्थापना का भी प्रावधान है। इन केंद्रों के सुगम संचालन और देखरेख के लिए प्रत्येक केंद्र में एक आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति की जाती है।