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Maharajganj News: दुनिया में एकमात्र पवित्र और विशुद्ध भाषा है संस्कृत
Fri, 15 Mar 2024 08:56 PM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Fri, 15 Mar 2024 08:56 PM IST
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महराजगंज। दुनिया में एकमात्र पवित्र और विशुद्ध भाषा संस्कृत है। यह भाषा अपनी पीढ़ियों को निरंतर गौरव का बोध कर रहा है। संस्कृत का व्याकरण दुनिया का सबसे व्यापक व्याकरण है। इसमें 102 करोड़ शब्द हैं, इसको सरल और सहज बनाने का कार्य संस्कृत भारती से जुड़े लोग कर रहे हैं।
ये बातें जवाहरलाल नेहरू पीजी कॉलेज में संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित सरल मानक संस्कृत विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के संस्कृत के आचार्य प्रोफेसर कृष्ण मोहन पांडे ने कही। उन्होंने कहा कि अपनी पहचान बनाने के लिए अनेक भाषाओं का प्रचलन हुआ परंतु दसवीं शताब्दी के पूर्व केवल देव भाषा के रूप में संस्कृत ही विराजमान था। उन्होंने कहा कि संस्कृत के अंदर ज्ञान विज्ञान ज्योतिष आयुर्वेद योग और वास्तु शास्त्र सभी विद्यमान इसलिए संस्कृत की सहजता और सरलता को समझना होगा।
जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय नई दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. धनंजय मणि त्रिपाठी ने कहा कि विश्व में संस्कृत एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसमें शास्त्रीयता परिष्कृतता, प्राचीनता और निरंतरता की अप्रतिम और अविछिन्न परंपरा है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा उतनी ही प्राचीन है जितनी की सृष्टि, क्योंकि सृष्टि के समय सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मुख से ही संस्कृत का आविर्भाव हुआ था।
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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के सहायक आचार्य डॉ. शैलेंद्र कुमार साहू ने कहा कि संस्कृत से ही हमारी संस्कृति का विस्तृत रूप दिखाई देता है। विश्व के लिए आदर्श बहुत ही संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने के लिए संस्कृत के मानकों का सरलीकरण आदि अत्यंत आवश्यक है।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की सहायक आचार्य डॉ लक्ष्मी मिश्रा ने कहा कि भारत की सात भाषाओं में से प्रत्येक भाषा के लिए एक-एक भाषा विश्वविद्यालय की स्थापना है। यह सभी विश्वविद्यालय संस्कृत के उत्थान और विकास के लिए सतत प्रयत्नशील है।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की प्रभारी डॉ. आभा द्विवेदी ने कहा कि छोटे-छोटे प्रयासों के माध्यम से युवा पीढ़ी को संस्कृत भाषा से व्यवहार में जोड़ना है। प्रबंधक डॉ. बलराम भट्ट ने कहा कि अत्यंत मेघवन व्यक्ति ही संस्कृत भाषा को समझ पाता है। प्राचार्य डॉ. अजय कुमार मिश्रा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्कृत भाषा की महत्ता को रेखांकित किया। सदर विधायक जयमंगल कन्नौजिया ने भी राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित किया और संस्कृत की प्राचीनता को बताया।
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तकनीकी सत्र में 30 शोध पत्र पढ़े गए
राष्ट्रीय कार्यशाला में 30 शोध पत्रों का वाचन किया गया। संस्कृत भारती गोरक्ष प्रांत के प्रांत मंत्री डॉ जोखन पांडेय ने कहा कि संस्कृत भारती निरंतर संस्कृत के विकास और उत्थान के लिए प्रयत्नशील है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि संस्कृत भारत की एकता का आधारभूत स्तंभ है। नेशनल पीजी कॉलेज बड़हलगंज के सहायक आचार्य डॉ. योगेंद्र कुमार तिवारी ने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संस्कृत को भारत संघ की राजभाषा बनाना चाहते थे। जेएनयू दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. कृष्ण मोहन पांडेय, राजू शर्मा, डॉ. अंबरीश मिश्रा, डॉ. राकेश मिश्रा, प्रोफेसर उमेश प्रसाद यादव, दिवाकर सिंह, राहुल कुमार सिंह, डॉ. शांति शरण मिश्र मौजूद रहे।
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ये बातें जवाहरलाल नेहरू पीजी कॉलेज में संस्कृत विभाग की ओर से आयोजित सरल मानक संस्कृत विषय पर राष्ट्रीय कार्यशाला को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय नई दिल्ली के संस्कृत के आचार्य प्रोफेसर कृष्ण मोहन पांडे ने कही। उन्होंने कहा कि अपनी पहचान बनाने के लिए अनेक भाषाओं का प्रचलन हुआ परंतु दसवीं शताब्दी के पूर्व केवल देव भाषा के रूप में संस्कृत ही विराजमान था। उन्होंने कहा कि संस्कृत के अंदर ज्ञान विज्ञान ज्योतिष आयुर्वेद योग और वास्तु शास्त्र सभी विद्यमान इसलिए संस्कृत की सहजता और सरलता को समझना होगा।
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जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय नई दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. धनंजय मणि त्रिपाठी ने कहा कि विश्व में संस्कृत एकमात्र ऐसी भाषा है, जिसमें शास्त्रीयता परिष्कृतता, प्राचीनता और निरंतरता की अप्रतिम और अविछिन्न परंपरा है। उन्होंने कहा कि संस्कृत भाषा उतनी ही प्राचीन है जितनी की सृष्टि, क्योंकि सृष्टि के समय सृष्टिकर्ता ब्रह्मा के मुख से ही संस्कृत का आविर्भाव हुआ था।
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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय वाराणसी के सहायक आचार्य डॉ. शैलेंद्र कुमार साहू ने कहा कि संस्कृत से ही हमारी संस्कृति का विस्तृत रूप दिखाई देता है। विश्व के लिए आदर्श बहुत ही संस्कृति को जन-जन तक पहुंचाने के लिए संस्कृत के मानकों का सरलीकरण आदि अत्यंत आवश्यक है।
दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की सहायक आचार्य डॉ लक्ष्मी मिश्रा ने कहा कि भारत की सात भाषाओं में से प्रत्येक भाषा के लिए एक-एक भाषा विश्वविद्यालय की स्थापना है। यह सभी विश्वविद्यालय संस्कृत के उत्थान और विकास के लिए सतत प्रयत्नशील है।
सिद्धार्थ विश्वविद्यालय के संस्कृत विभाग की प्रभारी डॉ. आभा द्विवेदी ने कहा कि छोटे-छोटे प्रयासों के माध्यम से युवा पीढ़ी को संस्कृत भाषा से व्यवहार में जोड़ना है। प्रबंधक डॉ. बलराम भट्ट ने कहा कि अत्यंत मेघवन व्यक्ति ही संस्कृत भाषा को समझ पाता है। प्राचार्य डॉ. अजय कुमार मिश्रा ने सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए संस्कृत भाषा की महत्ता को रेखांकित किया। सदर विधायक जयमंगल कन्नौजिया ने भी राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित किया और संस्कृत की प्राचीनता को बताया।
तकनीकी सत्र में 30 शोध पत्र पढ़े गए
राष्ट्रीय कार्यशाला में 30 शोध पत्रों का वाचन किया गया। संस्कृत भारती गोरक्ष प्रांत के प्रांत मंत्री डॉ जोखन पांडेय ने कहा कि संस्कृत भारती निरंतर संस्कृत के विकास और उत्थान के लिए प्रयत्नशील है। दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ. धर्मेंद्र कुमार ने कहा कि संस्कृत भारत की एकता का आधारभूत स्तंभ है। नेशनल पीजी कॉलेज बड़हलगंज के सहायक आचार्य डॉ. योगेंद्र कुमार तिवारी ने कहा कि डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संस्कृत को भारत संघ की राजभाषा बनाना चाहते थे। जेएनयू दिल्ली के प्रोफेसर डॉ. कृष्ण मोहन पांडेय, राजू शर्मा, डॉ. अंबरीश मिश्रा, डॉ. राकेश मिश्रा, प्रोफेसर उमेश प्रसाद यादव, दिवाकर सिंह, राहुल कुमार सिंह, डॉ. शांति शरण मिश्र मौजूद रहे।