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Maharajganj News: संक्रमण ही नहीं समय से पहले जन्म लेना नवजात शिशु के लिए जानलेवा
Tue, 02 Jan 2024 12:52 AM IST
गोरखपुर ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
संवाद न्यूज एजेंसी, महाराजगंज
Updated Tue, 02 Jan 2024 12:52 AM IST
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एसएनसीयू वार्ड
महराजगंज। पैदा होने के बाद नहीं रोना, संक्रमण होना, समय से पहले जन्म लेना, नवजात शिशुओं के लिए प्राणघातक साबित हो रही है। अकुशल हाथों से प्रसव कराना भी प्रमुख कारण माना जा रहा है। बीते दो साल के आकड़े बयां कर रहे हैं कि अस्पतालों में जन्म लेने वाले शिशुओं की मौत का सबसे बड़ा कारण जन्म के बाद न रोना पाया गया। विशेषज्ञों के अनुसार प्रसव के दौरान प्रशिक्षित कर्मी का होना बेहद जरूरी है। दो साल में 260 नवजात शिशुओं ने दम तोड़ा है। जन्म के बाद बीमार होने वाले बच्चों को नवजात शिशु देखभाल इकाई में भर्ती किया जाता है।
जानकारी के अनुसार, जिला अस्पताल के नवजात शिशु देखभाल इकाई में उन बच्चों को भर्ती किया जाता है, जिनका जन्म के समय वजन कम है, अथवा पीलिया या सांस फूलने की समस्या से ग्रसित हैं। जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में 26 बेड हैं, वर्तमान में लगातार नवजात मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इस वार्ड में जन्म लेने के साथ सांस फूलने, जांडिस, दूध न पीने, निर्धारित वजन से कम, नौ माह के पहले जन्म लेने, अविकसित शिशुओं को भर्ती कर इलाज किया जाता है। इनमें कई ऐसे नवजात होते हैं, जिन्हें जन्म के बाद से लगभग आठ से 10 दिनों के लिए इसमें रखना पड़ता है।
नवजात शिशु देखभाल इकाई में 26 अत्याधुनिक सुसज्जित बेड हैं। इकाई पर 24 घंटे सेवा की सुविधा उपलब्ध है। प्रतिमाह इस व्यवस्था के बीच भी 100 से 1500 की संख्या में बच्चे स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। इकाई पूरी तरह वातानुकूलित भवन में संचालित है। 13 स्टाफ नर्स और सात बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती नवजात शिशु देखभाल इकाई में है। इस वार्ड में शिफ्टवार डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई जाती है। एक जनवरी 2021 से 31 दिसंबर 2022 तक 4,872 नवजात भर्ती हुए। इसमें स्वास्थ्य होने वालों की संख्या 3883 है। जबकि 166 नवजात की मौत हो गई थी। मरने वाले बच्चों में ज्यादातर संक्रमण व सांस फूलने की समस्या से पीड़ित रहे। इनमें न रोने वाले बच्चे भी शामिल हैं। इसी तरह से जनवरी 2023 में 20 दिसंबर 2023 तक की रिपोर्ट पर नजर डालें तो 4,602 बच्चे नवजात शिशु देखभाल इकाई में भर्ती हुए। इसमें 3599 स्वस्थ होकर घर चले गए। जबकि 60 बच्चों की मौत अब तक हुई है।
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मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डाॅ. एपी भार्गव ने बताया कि नवजात शिशु देखभाल इकाई में बच्चों का बेहतर ढंग से इलाज किया जाता है। शिफ्टवार डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई जाती है। भर्ती होने वाले सबसे ज्यादा बच्चे स्वस्थ होकर घर जाते हैं।
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प्रसव के दौरान कुशल प्रशिक्षित कर्मी का होना बेहद जरूरी होता है। इस वजह से समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है। जन्म के तुरंत बाद बच्चों का रोना बेहद जरूरी होता है। अगर अप्रशिक्षित कर्मी रहते हैं तो वे समझ नहीं पाते हैं, इस वजह से समस्या होती है।
-डॉ. विशाल चौधरी, बाल रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल
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जानकारी के अनुसार, जिला अस्पताल के नवजात शिशु देखभाल इकाई में उन बच्चों को भर्ती किया जाता है, जिनका जन्म के समय वजन कम है, अथवा पीलिया या सांस फूलने की समस्या से ग्रसित हैं। जिला अस्पताल के एसएनसीयू वार्ड में 26 बेड हैं, वर्तमान में लगातार नवजात मरीजों की संख्या में इजाफा हो रहा है। इस वार्ड में जन्म लेने के साथ सांस फूलने, जांडिस, दूध न पीने, निर्धारित वजन से कम, नौ माह के पहले जन्म लेने, अविकसित शिशुओं को भर्ती कर इलाज किया जाता है। इनमें कई ऐसे नवजात होते हैं, जिन्हें जन्म के बाद से लगभग आठ से 10 दिनों के लिए इसमें रखना पड़ता है।
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नवजात शिशु देखभाल इकाई में 26 अत्याधुनिक सुसज्जित बेड हैं। इकाई पर 24 घंटे सेवा की सुविधा उपलब्ध है। प्रतिमाह इस व्यवस्था के बीच भी 100 से 1500 की संख्या में बच्चे स्वास्थ्य लाभ ले रहे हैं। इकाई पूरी तरह वातानुकूलित भवन में संचालित है। 13 स्टाफ नर्स और सात बाल रोग विशेषज्ञ की तैनाती नवजात शिशु देखभाल इकाई में है। इस वार्ड में शिफ्टवार डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई जाती है। एक जनवरी 2021 से 31 दिसंबर 2022 तक 4,872 नवजात भर्ती हुए। इसमें स्वास्थ्य होने वालों की संख्या 3883 है। जबकि 166 नवजात की मौत हो गई थी। मरने वाले बच्चों में ज्यादातर संक्रमण व सांस फूलने की समस्या से पीड़ित रहे। इनमें न रोने वाले बच्चे भी शामिल हैं। इसी तरह से जनवरी 2023 में 20 दिसंबर 2023 तक की रिपोर्ट पर नजर डालें तो 4,602 बच्चे नवजात शिशु देखभाल इकाई में भर्ती हुए। इसमें 3599 स्वस्थ होकर घर चले गए। जबकि 60 बच्चों की मौत अब तक हुई है।
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मुख्य चिकित्सा अधीक्षक डाॅ. एपी भार्गव ने बताया कि नवजात शिशु देखभाल इकाई में बच्चों का बेहतर ढंग से इलाज किया जाता है। शिफ्टवार डॉक्टरों की ड्यूटी लगाई जाती है। भर्ती होने वाले सबसे ज्यादा बच्चे स्वस्थ होकर घर जाते हैं।
प्रसव के दौरान कुशल प्रशिक्षित कर्मी का होना बेहद जरूरी होता है। इस वजह से समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है। जन्म के तुरंत बाद बच्चों का रोना बेहद जरूरी होता है। अगर अप्रशिक्षित कर्मी रहते हैं तो वे समझ नहीं पाते हैं, इस वजह से समस्या होती है।
-डॉ. विशाल चौधरी, बाल रोग विशेषज्ञ, जिला अस्पताल