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मदर्स डे : जिनके पालन-पोषण में गुजार दिया जीवन...उन्होंने ही पहुंचा दिया वृद्धाश्रम

Sun, 10 May 2026 02:34 AM IST
Gorakhpur Bureau गोरखपुर ब्यूरो
Updated Sun, 10 May 2026 02:34 AM IST
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Mother's Day: The one in whose upbringing I spent my life...she herself sent me to an old age home.
आधार​शिला वृद्धाश्रम में रह रही माताएं। 
जिस उम्र में बेटों का सहारा चाहिए, उस उम्र में बिछड़ी माताएं, अपनों के इंतजार में काटती हैं रातें
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फरेंदा। आज मदर्स डे के अवसर पर एक तरफ लोग अपने जीवन में मां के त्याग और उसकी भूमिका को याद कर खुशियां मना रहे हैं। वहीं गनेशपुर में स्थित आधारशिला वृद्धाश्रम में रह रही महिलाएं अपने उन बच्चों के लिए तरस रही हैं जिनके पालन-पोषण में उन्होंने अपनी जिंदगी गुजार दी। अब जब जीवन के अंतिम दौर में उन्हें बच्चों की सर्वाधिक जरूरत है। तो वह वृद्धाश्रम में अपने अंतिम दिन गिन रही हैं।
फरेंदा के गनेशपुर में स्थित आधारशिला वृद्धाश्रम में रह रही वृद्धाओं की कहानी बेहद मार्मिक है। किसी को तो बेटों ने घर से निकाला है तो कोई पति की मौत के बाद बेसहारा हो चुकी हैं। कुछ मांएं तो अपनों के बेरुखी की वजह से वृद्धाश्रम में पड़ी हैं। घर पर पूरा परिवार है, फिर भी अपनों से दूर रहकर जीवन जीने को विवश हैं। अपनों की बेरुखी और लापरवाही से भले ही यह महिलाएं अंतिम दिन वृद्धाश्रम में काट रही हैं लेकिन सभी अपने बच्चों के सलामती की दुआ कर रही हैं।
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स्पीकअप
पति की मृत्यु के बाद घर में रहना दुश्वार हो रहा था। परिवार में एक बेटा है व दो बेटियां हैं। आए दिन परिवार में कलह होता रहता है। तीन वर्षों से वृद्धाश्रम रहकर जिंदगी काट रही हूं। परिवार के लोग मिलने तक नहीं आते हैं। फिर भी वह जहां हैं खुश रहें यही कामना है।
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- प्रभा देवी, सिद्धार्थनगर

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दो वर्ष से वृद्धाश्रम में रह रही हूं। एक बेटा व एक बेटी है। फिर भी घर में रहने के लिए जगह नहीं है। भोजन भी समय से नहीं मिल पाता था। घर में बुजुर्ग का कोई सम्मान न रहने के कारण यहां आकर जिंदगी काट रही हूं। यहां पर ठीक ढंग से पेट तो भर जाता है। औलाद का सुख अब तक नहीं मिला तो अब क्या मिलेगा।
-राजमती देवी, राजमंदिर

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करीब डेढ़ वर्ष से वृद्धाश्रम में जिंदगी काट रही हूं। पति की मौत के बाद बेसहारा हो गई हूं। परिवार में एक बेटा है। वह ठीक से देखभाल भी नहीं करता था। दिन में भोजन के भी लाले रहते थे। हमेशा परिवार में कलह होता रहता था। जिस बेटे को दुलार से पाला था, उसी ने ठुकरा दिया। अब वृद्धाश्रम में चैन से रहती हूं। बेटे को कभी मर्जी होता तो यहां आकर हाल-चाल ले लेता है।
-बच्ची देवी, परसा सोमाली

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पति की मृत्यु के बाद से करीब एक वर्ष से आश्रम में रहती हूं। दो बेटे हैं। उनको प्यार व दुलार से पाला लेकिन उनके पास मेरे रहने के लिए जगह नहीं है। घर पर देखभाल न होने से परेशानी होती थी। अब वृद्धाश्रम में रहती हूं। मेरे बेटे जो आज मेरे साथ कर रहे हैं, वही उनके साथ उनके बेटे भी करेंगे।

-बरसाती देवी, नौतनवा
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वृद्धाश्रम में रहने वाले बुजुर्गों का उचित देखभाल करना पहला दायित्व होता है। उनके रहने के साथ खान-पान के साथ स्वास्थ्य संबंधी देखभाल की जाती है। आश्रम में करीब 51 महिलाएं व 56 पुरुष बुजुर्ग रह रहे हैं। उनकी सेवा करना ईश्वर सेवा के समान है। शासन से मिलने वाली सारी सुविधाएं दी जाती हैं।
-प्रदीप कटियार, प्रबंधक, आधारशिला वृद्धाश्रम, फरेंदा
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