{"_id":"5c38e743bdec2273367cf623","slug":"41547233091-maharajganj-news","type":"story","status":"publish","title_hn":"नशा, शक व बेरोजगारी से दरक रहे सात जन्मों के रिस्ते","category":{"title":"Crime","title_hn":"क्राइम ","slug":"crime"}}
नशा, शक व बेरोजगारी से दरक रहे सात जन्मों के रिस्ते
विज्ञापन
नशा, शक, बेरोजगारी से दरक रहे सात जन्मों के रिश्ते
घर की दहलीज पार कर थाने एवं न्यायालय पहुंच रहे पारिवारिक मामले
अमर उजाला ब्यूरो
महराजगंज। कहीं पत्नी को पति पर भरोसा नहीं, कहीं सास-ससुर से दूर पति के साथ रहने की जिद, आपसी विवाद, बेरोजगारी, नशा, दहेज उत्पीड़न और शक की वजह से आए दिन दंपती में तकरार की शिकायतें आ रही हैं। इसके चलते सात जन्मों के बंधन चंद महीनों में ही दरकने लग रहे हैं। पुलिस के पास औसतन हर रोज इस तरह के चार से पांच मामले आ रहे हैं।
यह ऐसे मामले हैं जिनमें महज शादी के कुछ ही माह बाद ही तलाक जैसी नौबत आने लगती है। सात जन्मों के बंधन में बेरोजगारी, नशा और शक की भूमिका रिश्तों में दरार डाल रही है। औसतन चार से पांच मामले हर रोज घर की दहलीज पार कर पुलिस तक पहुंच रहे हैं। रिश्ते टूटने की अधिकतर शिकायतें महिला थाने में भी पहुंच रही है। ज्यादातर शिकायतें महिलाओं की तरफ से हैं। कुछ शिकायतें पुरुषों की तरफ से भी की गई हैं। एक जनवरी से एक नवंबर 2018 तक महिला थाने में कुल 369 मामले आए। जिसमें पुलिस ने सहयोग किया। इसमें से 119 मामलों में सुलह गए। तब जाकर पति पत्नी एक साथ जीवन व्यतीत करने पर राजी हो गए। इन मामलों में महिलाएं अपने पति और सास ससुर के खिलाफ शिकायतें कर चुकी हैं। ज्यादातर शिकायतें पति के काम न करने, नशा, शक करने, शराब पीकर मारपीट करने और दूसरी महिलाओं के साथ रिश्ते होने की होती हैं।
दीवानी न्यायालय के अधिवक्ता विनय कुमार पांडेय ने बताया कि न्यायालय में वर्ष 2018 में 762 भरण पोषण एवं 715 वैवाहिक वाद दाखिल हुए। यही नहीं नए साल 2019 में भरण पोषण के 20 एवं वैवाहिक वाद 28 मामले दाखिल हो चुके हैं। शांति पूर्ण तरीके से मामले को घर पर ही हल कर लिया जाए तो विवाद न्यायालय तक नहीं पहुंचेगा। पारिवारिक मामलों में समझदारी से काम लेकर परिवार को टूटने से बचाया जा सकता है। व्यक्ति को अहंकार का त्याग करना होगा।
विज्ञापन
समाजशास्त्री डॉक्टर धर्मेंद्र कुमार सोनकर का कहना है कि भौतिकवाद ने व्यक्तिवाद को बढ़ावा दिया है। इससे महत्वाकांक्षा भी बढ़ती है। परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार टूटने लगते हैं। सामाजिक तौर पर मुख्य कर्ता की निरंकुशता, स्त्रियों की दुर्दशा, गतिशीलता में बाधा भी संयुक्त परिवार में बिखराव के कारण है।
मनोविज्ञानी डॉक्टर प्रशांत कुमार पांडेय का कहना है कि नैतिक मूल्यों में गिरावट के कारण रिश्तों में दरार पैदा होती है। बदलते समय के साथ परिवार का स्वरूप भी बदल रहा है। आधुनिक परिवारों में पारस्परिक संबंधों की अपेक्षा आर्थिक महत्व बढ़ता जा रहा है। संबंधों में औपचारिकता बढ़ती जा रही है। व्यक्तिवाद बढ़ रहा है। दूसरे के प्रति भावनाएं कम हो रही हैं।
विज्ञापन
घर की दहलीज पार कर थाने एवं न्यायालय पहुंच रहे पारिवारिक मामले
अमर उजाला ब्यूरो
महराजगंज। कहीं पत्नी को पति पर भरोसा नहीं, कहीं सास-ससुर से दूर पति के साथ रहने की जिद, आपसी विवाद, बेरोजगारी, नशा, दहेज उत्पीड़न और शक की वजह से आए दिन दंपती में तकरार की शिकायतें आ रही हैं। इसके चलते सात जन्मों के बंधन चंद महीनों में ही दरकने लग रहे हैं। पुलिस के पास औसतन हर रोज इस तरह के चार से पांच मामले आ रहे हैं।
यह ऐसे मामले हैं जिनमें महज शादी के कुछ ही माह बाद ही तलाक जैसी नौबत आने लगती है। सात जन्मों के बंधन में बेरोजगारी, नशा और शक की भूमिका रिश्तों में दरार डाल रही है। औसतन चार से पांच मामले हर रोज घर की दहलीज पार कर पुलिस तक पहुंच रहे हैं। रिश्ते टूटने की अधिकतर शिकायतें महिला थाने में भी पहुंच रही है। ज्यादातर शिकायतें महिलाओं की तरफ से हैं। कुछ शिकायतें पुरुषों की तरफ से भी की गई हैं। एक जनवरी से एक नवंबर 2018 तक महिला थाने में कुल 369 मामले आए। जिसमें पुलिस ने सहयोग किया। इसमें से 119 मामलों में सुलह गए। तब जाकर पति पत्नी एक साथ जीवन व्यतीत करने पर राजी हो गए। इन मामलों में महिलाएं अपने पति और सास ससुर के खिलाफ शिकायतें कर चुकी हैं। ज्यादातर शिकायतें पति के काम न करने, नशा, शक करने, शराब पीकर मारपीट करने और दूसरी महिलाओं के साथ रिश्ते होने की होती हैं।
विज्ञापन
दीवानी न्यायालय के अधिवक्ता विनय कुमार पांडेय ने बताया कि न्यायालय में वर्ष 2018 में 762 भरण पोषण एवं 715 वैवाहिक वाद दाखिल हुए। यही नहीं नए साल 2019 में भरण पोषण के 20 एवं वैवाहिक वाद 28 मामले दाखिल हो चुके हैं। शांति पूर्ण तरीके से मामले को घर पर ही हल कर लिया जाए तो विवाद न्यायालय तक नहीं पहुंचेगा। पारिवारिक मामलों में समझदारी से काम लेकर परिवार को टूटने से बचाया जा सकता है। व्यक्ति को अहंकार का त्याग करना होगा।
विज्ञापन
समाजशास्त्री डॉक्टर धर्मेंद्र कुमार सोनकर का कहना है कि भौतिकवाद ने व्यक्तिवाद को बढ़ावा दिया है। इससे महत्वाकांक्षा भी बढ़ती है। परिणामस्वरूप संयुक्त परिवार टूटने लगते हैं। सामाजिक तौर पर मुख्य कर्ता की निरंकुशता, स्त्रियों की दुर्दशा, गतिशीलता में बाधा भी संयुक्त परिवार में बिखराव के कारण है।
मनोविज्ञानी डॉक्टर प्रशांत कुमार पांडेय का कहना है कि नैतिक मूल्यों में गिरावट के कारण रिश्तों में दरार पैदा होती है। बदलते समय के साथ परिवार का स्वरूप भी बदल रहा है। आधुनिक परिवारों में पारस्परिक संबंधों की अपेक्षा आर्थिक महत्व बढ़ता जा रहा है। संबंधों में औपचारिकता बढ़ती जा रही है। व्यक्तिवाद बढ़ रहा है। दूसरे के प्रति भावनाएं कम हो रही हैं।